राम्रा कुराको संग्रह
विसेण्ट वानगाग पिकासोभन्दा पनि ठूलो चित्रकार थियो । अनुहार ठेउलाले गर्दा छ्याके । एउटी केटीले उसलाई मन त पराई तर विहे गर्न भएन । काकाकी छोरी परी । पछि ऊ पेरिस गयो र एउटी वेश्या कहाँ बस्यो । एक दिन वेश्याले भनी- तिम्रो अनुहार जति नराम्रो छ, कान भने त्यसको उल्टो कति राम्रो हो - मलाई तिम्रो कान निकै मन पर्छ । वानगाग आफ्नो कोठामा गयो । र चक्कुले कान काटेर रुमालमा पोका पारी ल्याएर वेश्यालाई राख्न दियो । उसको विचार थियो, राम्रा चिज हमेशा सुरक्षित राख्नुपर्छ ।
हाम्रा सरकारहरु राम्रा अनुहारका छैनन् । कोही हत्यारा कोही तस्कर । ढाँट्नु छल्नु , फट्याइँ गर्नु त तिनको धर्मै भयो । भ्रष्टाचार, कदाचार, घुसखोरी, बेइमानी, बेइज्जती तिनका स्वाभाविक गुण भए । त्यसैले सरकारहरु राम्रा हुदैँनन् । तर तिनका कुरा, तिनका आश्वासन, तिनका चर्तिकला, तिनका आकाश-पाताल जोड्ने गफ भने विसेण्ट वानगागका कानजस्तै सुन्दर छन् । त्यसैले अव हामीले सरकारहरुलाई भन्नुपर्यो-तिम्रा ती राम्रा कुरा काटेर हामीलाई देऊ । हामी जतनसँग राख्छौं । किनकि राम्रा कुरा हमेशा संग्रहणीय हुन्छन् ।
–पं. बाबुराम भट्टरार्इ
स्थानिय पत्रकार तथा साहित्यप्रेमी नागेन्द्रकुमार कर्ण “मैथिल संदेश साप्ताहिक” का सम्पादक एवं प्रकाशक हुनुहुन्छ। समाज, संस्कृतिको संरक्षण र जनचेतनामूलक लेखनमार्फत निरन्तर सक्रिय रहनुहुन्छ। प्रकाशक तथा सम्पादक कर्ण गाेरखापत्र दैनिककाे महाेत्तरी समाचारदाताकाे रुपमा पनि विगत डेढ दशकभन्दा बढी समयदेखि कार्यरत हुनुहुन्छ ।
Wednesday, June 15, 2011
महात्मा गान्धीकहां
महात्मा गान्धीकहां एउटा गणितज्ञ गयो । गान्धीले भन्दा राम्रो चर्खा चलाउन थाल्यो । चर्खा राम्रो घुमाउने घिर्नी राम्रो र कपास राम्रो तैपनि वारम्वार धागो चुँडिइरहन्छ । कारण उसले बुझ्न सकेन । गान्धीसंग समस्या राख्यो । गान्धीले भने - धागो कात्ने बेलामा तिम्रो मन यताउता जान्छ होला र हात अनिश्चित हुँदा झड्का खाएर धागो चुडिन्छ होला । म त मन कहीं पनि लैजान्न । वस् धागो मात्र कात्छु । तिमी धागो कात्न बसेर मनमनै बजार जान्छौ होला । पत्नीसँग वात गर्र्छौं होला । जव धागो कात्न बस्छौ केवल धागो मात्र कात, धागो चुँडिन्न । गणितज्ञ शिष्यले त्यसै गर्यो, धागो चुंडिएन ।
हाम्रा प्रधानमन्त्रीहरु पनि लामो समय नटिक्ने र कतिखेर प्रधानमन्त्रीको पद चुँडिन्छ भनेर डर पैदा हुने कारण पनि यही हो । प्रधानमन्त्री भएपछि केवल प्रधानमन्त्री हुने र चानुमानु बस्ने गर्नुपर्छ । हाम्रा प्रधानमन्त्रीहरु प्रधानमन्त्री हुन पाँछैन, यो गर्छु त्यो गर्छु भन्न थाल्छन् । गरीवी निवारण, भ्रष्टाचार निवारण गर्छु भन्छन् । यति किलो मिटर बाटो बनाउँछु, यति मेगावाट बिजुली निकाल्छु, यति विद्यालय खोल्छु यति उद्योग स्थापना गर्छु त्या । अनि ध्यान अन्तै जान्छ । प्रधानमन्त्री पद स्वात्त चुँडिन्छ । अनि भएन सबैकुरा ठण्डा - त्यसैले वर्तमान र भावी प्रधानमन्त्री चूप लागेर प्रधानमन्त्री खाउन् । समस्यै हुँदैन ।
– पं. बाबुराम भट्टरार्इ
हाम्रा प्रधानमन्त्रीहरु पनि लामो समय नटिक्ने र कतिखेर प्रधानमन्त्रीको पद चुँडिन्छ भनेर डर पैदा हुने कारण पनि यही हो । प्रधानमन्त्री भएपछि केवल प्रधानमन्त्री हुने र चानुमानु बस्ने गर्नुपर्छ । हाम्रा प्रधानमन्त्रीहरु प्रधानमन्त्री हुन पाँछैन, यो गर्छु त्यो गर्छु भन्न थाल्छन् । गरीवी निवारण, भ्रष्टाचार निवारण गर्छु भन्छन् । यति किलो मिटर बाटो बनाउँछु, यति मेगावाट बिजुली निकाल्छु, यति विद्यालय खोल्छु यति उद्योग स्थापना गर्छु त्या । अनि ध्यान अन्तै जान्छ । प्रधानमन्त्री पद स्वात्त चुँडिन्छ । अनि भएन सबैकुरा ठण्डा - त्यसैले वर्तमान र भावी प्रधानमन्त्री चूप लागेर प्रधानमन्त्री खाउन् । समस्यै हुँदैन ।
– पं. बाबुराम भट्टरार्इ
Wednesday, June 1, 2011
मैथिली नाट्य-साहित्य : एकटा संक्षिप्त परिचय
मैथिली नाट्य-साहित्य : एकटा संक्षिप्त परिचय
काव्यक अन्तर्गत सर्वाधिक रमणीय रचना नाटक मानल गेल अछि - ‘काव्यषु नाटकं रम्यम् ।’ दृश्य एवं श्रव्य दुनू एकहि संग रहबाक कारणे काव्यक आन भेद सँ एकरा नीक मानल जाइछ । आचार्य भरत मुनिक ‘नाट्यवेदं तु पञ्चमम्’ सेहो बड़ प्रचलित अछि जकर तात्पर्य होइत अछि नाटक पांचम वेद थिक । संगहि भरत मुनि कहलनि जे ने तँ एहन कोनहुँ ज्ञान अछि ने शिल्प आ ने विद्या ओ कला एहन अछि आ ने तँ कोनहुँ योग वा कर्म एहन अछि जे नाटक मे नहि देखाओल जाय-
“न तज्जानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगौ न तत्कर्म नाट्ययेऽस्मिन्यत्र दृश्यते ॥"
भारतीय नाट्य शास्त्रानुसार नाट्य-साहित्य मूल रूप सँ दू कोटि मे विभक्त अछि -रूपक ओ उपरूपक । रूपकक दस गोट भेद अछि, जाहि मे नाटक रूपकक सभ भेद मे मुख्य अछि । उपरूपकक अठारह भेद अछि । वस्तुतः नाटक काव्यरत्नक मणिमय मुकुट थिक । प्रत्येक भाषा-साहित्य मे नाटकक प्राचूर्यक इएह कारण थिक, जे ओ सभ कें समान रूपेँ आह्लादित करैत आयल अछि ।
मैथिली नाटकक उत्पत्ति चौदहम शताब्दी मे भेल । संस्कृत संवाद ओ मैथिली गीत मिश्रित नाटकक परम्परा प्रारम्भ भेलैक । एहि प्रकारक पहिल मैथिली नाटक ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्त्तसमागम’ प्रहसन थिक, जे दू अंक मे विभाजित अछि । पछाति विद्यापति ‘गोरक्षविजय’ आ ‘मणिमंजरी’ नाटिका लिखलनि । एकर बाद उमापतिक पारिजात-हरणक नाम अबैत अछि, जे श्रीकृष्ण कोना मानिनी सत्यभामाक मानक रक्षार्थ इन्द्रक वाटिका सँ सम्पूर्ण पारिजात वृक्षक हरण कय अनैत छथि, ताहि सँ सम्बन्ध अछि । जहिना गीत-परम्परा मे अनेको शताब्दी धरि विद्यापति व्याप्त रहलाह, तहिना नाट्य परंपरा केँ उमापतिक ‘पारिजात-हरण’ प्रभावित कयने रहल । एकर अतिरिक्त उल्लेखनीय नाटक मे कवि गोविन्दक ‘नलचरित’, मुरारि मिश्रक ‘अनर्धराघव’, शंकर मिश्रक ‘गौरिदिगम्बर’, रामदासक ‘आनन्द-विजय’, लालकविक ‘गौरि स्वयंवर’, नन्दीपतिक ‘कृष्णकेलिमाला’, रमापतिक ‘रुक्मिणी-परिणय’, गोकुलानन्दक ‘मानचरित’, श्रीकृष्ण मिश्रक ‘प्रबोध चन्द्रोदय’, हर्षनाथ झाक ‘उषाहरण’ आदि उल्लेखनीय थिक । एहि मे भागवत, महाभारत, पुराण आदिक चर्चा विशेष रूपे भेल अछि तथा कृष्णलीला-सम्बन्धी कथा कथानकक रूप मे विशेष गृहीत भेल । यद्यपि ई परम्परा हर्षनाथ झाक संग समाप्त भ’ गेल तथापि चन्दा झाक ‘अहिल्याचरित’, विन्ध्यानाथ झाक ‘रमेश्वरचन्द्रिका’ तथा बलदेव मिश्रक ‘राज-राजेश्वरी’ ओ ‘रमेशोदय’ नाटक धरि एकर प्रभाव रहल । वास्तव मे उन्नैसम शताब्दीक अन्त धरि मैथिली नाटकक विकास सन्तोषप्रद नहिं रहल, मुदा एही त्रैभाषिक नाटकक गर्भसँ आधुनिक मैथिली नाटक निःसृत भेल अछि ।
आधुनिक मैथिली नाट्य साहित्यक जनक कविवर जीवन झा मानल जाइत छथि । विशुद्ध मैथिली भाषा मे सर्वप्रथम नाटक लिखबाक लेल इएह प्रेरित भेलाह आ शिल्प ओ शैलीक दृष्टिएँ नाटक मे परिवर्तनक आरोपन कयल । हिनक चारि गोट नाटक ‘सुन्दर संयोग’, ‘सामवती’, ‘पुनर्जन्म’, ‘नर्मदा सागर’ एवं खंडित अंश ‘मैथिली सट्टक’ उपलब्ध अछि, जकरा एकठाम एकत्रित कय ‘कविवर जीवन झा रचनावली’ नामेँ मैथिली अकादमी प्रकाशित कयलक । ‘सुन्दर संयोग’ चारि अंक मे विभाजित सामाजिक नाटक थिक, जाहि मे नव विवाहित दम्पति सुन्दर आ सरलाक प्रेम विरह ओ मिलनक कथा चित्रित अछि । ‘नर्मदा सागर’ मे परिणय सँ पूर्वक प्रेमकथा चित्रित अछि । ‘सामवती पुनर्जन्म’ सात अंक मे विभाजित पौराणिक कथानक पर आधारित एक उत्कृष्ट नाटक थिक ।
तत्पश्चात् लालदास पौराणिक कथावस्तुक आधार पर ‘सावित्री सत्यवान’ नाटक दस अंक मे लिखलनि, जे सावित्री ओ सत्यवानक प्रणय-सम्बन्ध पर आधारित छैक । पतिक प्रति निष्ठा ओ आसक्ति केँ प्रदर्शित करैत एहि नाटकक अनेक गीत लालदासक अलंकार प्रियताक सफल उदाहरण थिक । मुन्शी रघुनन्दन दास छओ अंकमे ‘मिथिला नाटक’ लिखलनि, जाहिमे विशुद्ध राष्ट्रीयताक भावना सन्निहित अछि । हिनक ‘सुदर्शन’ ओ ‘दूतांगद व्यायोग’ नाटकक चर्चा सेहो कयल गेल अछि ।
सरसकवि ईशनाथ झा सामाजिक नाटक ‘चीनीक लड्डू’ तीन अंक मे लिखलनि, जे आधुनिक कुत्सित समाजक मर्म केँ उद्घाटित करैत अछि । हिनक ‘उगना’ नाटक तँ मिथिलांचलक कोनो एहन गाम नहि अछि, जतय मंचित नहि भेल होइ । एकर कथा विद्यापतिक शिव भक्ति आ ओहि सँ आह्लादित भय उगनाक रूप मे महादेवक विद्यापतिक चाकरी करब थिक ।
शारदानन्द झाक ‘फेरार’ नाटक राजनीतिक कथावस्तुक श्री गणेश करैछ । एहि मे १९४२ ई.क क्रान्ति आ तकर बादक ब्रिटिश सरकारक दमन चक देखौने छथि । पं. जीवनान्द झा दू अंकमे ‘दूर्गा विजय’ नाटक लिखलनि जे दुर्गा सप्तशतीक पाँचम अध्याय सँ एगारहम अध्याय धरिक कयास लय लिखल गेल ।
मंचनक दृष्टिएँ पं. गोविन्द झाक ‘बसात’, ‘तिक प्रणाम’ ओ ‘रुक्मिणीहरण’ बड़ ख्याति पओलक । मैथिल समाज मे नारी शिक्षाक अभाव, पति पत्नी मे जे असमानता देखल जाइत अछि तथा एहि असमानताक जे दुष्परिणाम होइत छैक-तकर सुन्दर चित्रण ‘बसात’ मे भेटैछ । नाट्य लेखन केँ सुधांशु शेखर चौधरी एक नव दिशा देलनि । ‘भफाइत चाहक जिनगी’, ‘लेटाइत आँचर’, ‘पहिल साँझ’, ‘मनुक्ख आ मनुक्ख’ एवं ‘एकतारा’ हिनक चर्चित नाटक थिक । दहेज प्रथाक दुष्परिणाम केँ चित्रित कय समाज केँ तकर विरोध करबा मे प्रयत्नशील होयब ‘लेटाइत आँचर’क उद्देश्य थिक । महेन्द्र मलगिया आ डॉ. अरविन्द कुमार ‘अक्कु’ आधुनिक नाटककार मे सर्वाधिक ध्यान आकर्षित कयलनि । महेन्द्र मलंगियाक ‘लक्ष्मण रेखा : खण्डित’, जुआएल कनकनी, ‘एक कमल नोरमे’ ‘ओकरा आंगनक बारहमासा’, ‘लेभराएल आ सीता’ एवं ‘बिरजू, बिलटू आ बाबू’ नाटकक सफल मंचन भेल अछि । ‘लक्ष्मण रेखा : खंडित’ आदर्शवादी नाटक थिक, जाहि मे विधवा-विवाह केँ आ तकर समस्या केँ नव दृष्टिएँ प्रस्तुत कयल गेल । अरविन्द कुमार ‘अक्कु’क ‘ताल-मुट्ठी’, ‘आगि धधकि रहल छै’, ‘पातक मनुक्ख’, ‘अन्हार जंगल’, ‘एना कतेक दिन’ ‘आतंक’ एवं ‘रक्त’ मंचनक दृष्टिएँ पूर्ण सफल रहल अछि ।
एकर अतिरिक्त आओर महत्वपूर्ण नाटक सभ अछि । विस्तारक भय रहबाक कारणे प्रमुख नाटक सभक मात्र नाम गनायब सम्भव अछि । पं. आनन्द झाक ‘सीता स्वयंवर’, पं. दामोदर झाक ‘गांधर्व विवाह’, डॉ. कांचीनाथ झा ‘किरण’क ‘विजेता विद्यापति’, मणीपद्मक ‘कण्ठहार’, ‘झुमकी’ ओ ‘तेसर कनिञा’, काशीनाथ मिश्रक ‘दिग्विजय’ आ ‘अयाची’, विद्यानाथ रायक ‘विद्यापति’, डॉ. रामदेव झाक ‘परिझैत पाथर’, गंगेश गुंजनक ‘आइ भोर’, उगयकान्त मिश्रक ‘मालिनी’, ‘नचिकेताक ‘एक छल राजा, ‘नाटकक लेल’ एवं ‘नायकक नाम जीवनम्’, भाग्यनारायणक झाक ‘मनोरथ’, छत्रानन्द सिंह झाक ‘प्रायश्चित्त’, बाबू साहेब चौधरीक ‘कुहेस’, विभूति आनन्दक ‘समय संकेत’, ‘गौरीकान्त चौधरी ‘कान्त’क ‘वरदान’, प्रबोधनारायण सिंहक ‘प्रेमक रोग’, गुणनाथ झाक ‘मधुयामिनी’, ‘पाथेय’, कनिञा-पुतरा’ ओ ‘लाल बुझक्कर’, उषा किरण खानक ‘एकसरि ठाढ़ि’ ओ ‘फागुन’ , घननाथ झाक ‘भगवती भक्त’, रवीन्द्रनाथ ठाकुरक ‘टू लेक’, ‘एक राति’ आ ‘जखने कहल कक्का हौ’, डॉ. सदन मिश्र ‘राजनर्तकी’, लल्लन प्रसाद ठाकुरक ‘बड़का साहेब’, ‘बकलेल’, मि. लीलो काका’ ओ ‘लौंगिया मरचाइ’ आदि नाटक मैथिली नाट्य साहित्यक अन्तर्गत मुख्यतः विविध भावधाराक प्रतिनिधित्व करैछ ।
नाटकक एकटा प्रवृत्ति आन भाषा-साहित्यक नीक नाटक सभक मैथिली अनुवाद करब सेहो थिक । एहि मे संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला ओ फ्रेंच साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सँ मैथिली नाट्य साहित्यक श्रृंगार करबाक प्रयास भेल । रघुनन्दन दासक ‘उत्तर रामचरित’, प्रो. ईशनाथ झाक ‘मृच्छकटिक’ ओ ‘शकुन्तला’, डा. सुधाकर झा शास्त्रीक मुद्रा राक्षस पं गोविन्द झाक ‘स्वप्न-वासवदत्ता’ ओ ‘मालविकाग्निमित्र’, दामोदर झाक ‘भूतक छाया’, जीवनान्द ठाकुरक ‘अभिषेक’, प्रो. प्रबोध नारायण सिंहक ‘अन्हेर नगरी’ ओ ‘चोर’, डॉ. अणिमा सिंहक ‘पियासल धरती उताहुल नोर’, छत्रानन्द सिंह झाक ‘अन्तिम प्रश्न’ आ ‘गाछ’, परमानन्द झाक ‘पार्वती परिणय’, डॉ. इलारानी सिंहक ‘प्रेम:एक कविता’ ओ ‘सलोमा’, दीनानाथ झाक ‘आगन्तुक’, रामलोचन ठाकुरक ‘चारि पहर’ आ ‘जादूगर’, कुणालक ‘बाँकी इतिहास’ आदि अनूदित नाटक पढ़ि साहित्यिक आनन्द विशेष लेल जा सकैछ ।
मैथिली-साहित्यक अन्य विधा (कथा, उपन्यास, आदि) क कृत्तिकेँ नाट्य-रूपान्तरित करब एम्हर आबि प्रारम्भ भेल अछि, जे मंचनक दृष्टिएँ बड़ सफलता प्राप्त कयलक । ‘यात्री’क ‘नवतुरिया’ उपन्यास, श्रीमती उषा किरण खान द्वारा ‘ललित’क ‘पृथ्वी-पुत्र’ उपन्यास, अशोक द्वारा ‘धूमकेतु’क कथा ‘अगुरवान’, मनोज मनुज द्वारा ‘राजकमलक’क ‘भग्न स्तूपक एकटा अक्षत’ कुणाल द्वारा एवं विभूति आनन्दक ‘रिटायरमेंट’ कथा ‘एसगर-एसगर’ नामेँ ज्योत्सना चन्द्रम् द्वारा महत्वपूर्ण कार्य थिक ।
आकाशवाणीक आविष्कार नाटक केँ दृश्य काव्यक संग श्रव्य काव्य बनाय देलक अछि । २३ जनवरी १९४५ केँ पटना मे एवं २ फरवरी ‘७९ केँ दरभंगा मे आकाशवाणीक स्थापना सँ चौपाल भारती, गामधर ओ सिङरहार कार्यक्रम मे मैथिलीक रेडियो नाटकक प्रवेश शुरू भेल । यद्यपि एहि दिशा मे सन्तोषप्रद कार्य नहि भ’ रहल अछि आ अधिकांश रेडियो नाटक अप्रकाशित पड़ल अछि । कुमार गंगानन्द सिंह लिखित ‘जीवन-संघर्ष’ पहिल रेडियो नाटक थिक, जे पटना केन्द्र सँ प्रसारित भेल छल । ‘मंगरूपाठक’, ‘जय सोमनाथ’, ‘सीता’, ‘चाकरी’, ‘हमर स्वप्न सार्थक भेल’, ‘प्रायश्चित्त, ‘पियास’, ‘कोजगराक भरिया’, बाढ़ि बाटे’, ‘नानक पूरा’, ‘आदर्श वर’, ‘गुरु गूड़-चेला चीनी’, प्रेमक सिन्दूर’, विश्वामित्र’, ‘लोचन धाए फेधाएल हरि नहि आयल हे’, ‘साध्वी सीता’, ‘इनोरेमे भांग’, ‘बातक बतंगर’, ‘आलूक बोरिया’, ‘मामा सावधान’, ‘नसबन्दी’, ‘शंकर-पराभव’, ‘युवा संकल्प’, ‘सिकीक डाली: मलकोकाक फूल’ आदि रेडियो नाटक बहुचर्चित रहल ।
मैथिली नाट्य-साहित्यक विकास मिथिलाक अतिरिक्त नेपाल आ आसाम मे भेल । कहल जाइछ जे मैथिली नाटकक जन्म मिथिला मे भेल आ विकास नेपाल मे । नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्थापित भेल, तकर श्रेय मल्ल वंश केँ देल जायत । मल्ल राजा लोकनि द्वारा मैथिली नाट्य साहित्यक हेतु जे सत्प्रयास कयल गेल, तकर साम्राज्य भातगाँव, काठमांडू, ललितपुर एवं बनेपा मे भेल । चारू केन्द्र मिलाय लगभग एक सय मैथिलीक नाटक लिखल गेल । परन्तु मल्ल राजवंशक पतनक बाद मैथिली नाट्य-साहित्यक समक्ष जे एक अल्प विरामक स्थिति आबि गेलैक, तकरा एमहर आबि दूर कयलनि, पं. जीवनाथ झा, डॉ. ‘धीरेन्द्र’, महेन्द्र मलंगिया, स्व. वासुदेव ठाकुर, गुणनाथ, रामभद्र, शशिकान्त ठाकुर, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, कृष्णकान्त ठाकुर प्रभृति ।
आसाम मे वैष्णव धर्मक प्रचार-प्रसार लेल मैथिली नात्य-साहित्यक विकास सोलहम शताब्दी मे भेल, जकरा ‘अंकीया नाट’ कहल गेल आ एकर प्रवर्त्तक शंकरदेव छलाह । अंकीया नाटककार मे माधवदेव, गोपालदेव आ रामलोचन ठाकुरक नाम अग्रगण्य अछि ।
मैथिली नाट्य-साहित्य केँ दुतगतिएँ आगाँ बढ़यबाक श्रेय मैथिली नाट्य-रंग केँ सेहो छैक । मैथिली रंगमंच केँ ठाढ़ करबा मे पटनाक चेतना समितिक मुख्य भूमिका रहल, जे सभ साल विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर किछु नाटकक मंचन करैत आयल अछि । संगहि बहुतो एहन नाट्य संस्था अछि, जे अनेकानेक मौलिक, अनूदित ओ रूपान्तरित मैथिली नाटकक मंचन कयलक । एहि मे प्रमुख अछि-‘भंगिमा’ (पटना), ‘अरिपन’ (पटना), ‘चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र’ (कलकत्ता), ‘अखिल भारतीय मिथिला संघ’ (कलकत्ता), ‘मिथिपात्रिक (कलकत्ता), ‘श्यामा नाट्य कला-परिषद’ (चनौर), ‘मिथिला नाट्य कला-परिषद्’ (सरिसव-पाही), ‘मिथिलाक्षर’ (जमशेदपुर), ‘मैथिली कला-मंच’ (बोकारो), ‘भद्रकाली नाट्य-परिषद्’ (कोइलख), ‘नाट्य-परिषद्’ (पिण्डारूछ) आदि ।
वास्तव मे मैथिली नाट्य-साहित्य अपन विकासक पथ पर अग्रसर भ’ रहल अछि । ऐतिहासिक, पौराणिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि भावभूमि पर आधारित नाटक द्वारा मैथिली-साहित्य गौरवान्वित भेल अछि । नाटककार मंच-कौशल केँ ध्यान मे राखि एकर अभिवृद्धि मे लागल रहैत छथि ।
काव्यक अन्तर्गत सर्वाधिक रमणीय रचना नाटक मानल गेल अछि - ‘काव्यषु नाटकं रम्यम् ।’ दृश्य एवं श्रव्य दुनू एकहि संग रहबाक कारणे काव्यक आन भेद सँ एकरा नीक मानल जाइछ । आचार्य भरत मुनिक ‘नाट्यवेदं तु पञ्चमम्’ सेहो बड़ प्रचलित अछि जकर तात्पर्य होइत अछि नाटक पांचम वेद थिक । संगहि भरत मुनि कहलनि जे ने तँ एहन कोनहुँ ज्ञान अछि ने शिल्प आ ने विद्या ओ कला एहन अछि आ ने तँ कोनहुँ योग वा कर्म एहन अछि जे नाटक मे नहि देखाओल जाय-
“न तज्जानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगौ न तत्कर्म नाट्ययेऽस्मिन्यत्र दृश्यते ॥"
भारतीय नाट्य शास्त्रानुसार नाट्य-साहित्य मूल रूप सँ दू कोटि मे विभक्त अछि -रूपक ओ उपरूपक । रूपकक दस गोट भेद अछि, जाहि मे नाटक रूपकक सभ भेद मे मुख्य अछि । उपरूपकक अठारह भेद अछि । वस्तुतः नाटक काव्यरत्नक मणिमय मुकुट थिक । प्रत्येक भाषा-साहित्य मे नाटकक प्राचूर्यक इएह कारण थिक, जे ओ सभ कें समान रूपेँ आह्लादित करैत आयल अछि ।
मैथिली नाटकक उत्पत्ति चौदहम शताब्दी मे भेल । संस्कृत संवाद ओ मैथिली गीत मिश्रित नाटकक परम्परा प्रारम्भ भेलैक । एहि प्रकारक पहिल मैथिली नाटक ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्त्तसमागम’ प्रहसन थिक, जे दू अंक मे विभाजित अछि । पछाति विद्यापति ‘गोरक्षविजय’ आ ‘मणिमंजरी’ नाटिका लिखलनि । एकर बाद उमापतिक पारिजात-हरणक नाम अबैत अछि, जे श्रीकृष्ण कोना मानिनी सत्यभामाक मानक रक्षार्थ इन्द्रक वाटिका सँ सम्पूर्ण पारिजात वृक्षक हरण कय अनैत छथि, ताहि सँ सम्बन्ध अछि । जहिना गीत-परम्परा मे अनेको शताब्दी धरि विद्यापति व्याप्त रहलाह, तहिना नाट्य परंपरा केँ उमापतिक ‘पारिजात-हरण’ प्रभावित कयने रहल । एकर अतिरिक्त उल्लेखनीय नाटक मे कवि गोविन्दक ‘नलचरित’, मुरारि मिश्रक ‘अनर्धराघव’, शंकर मिश्रक ‘गौरिदिगम्बर’, रामदासक ‘आनन्द-विजय’, लालकविक ‘गौरि स्वयंवर’, नन्दीपतिक ‘कृष्णकेलिमाला’, रमापतिक ‘रुक्मिणी-परिणय’, गोकुलानन्दक ‘मानचरित’, श्रीकृष्ण मिश्रक ‘प्रबोध चन्द्रोदय’, हर्षनाथ झाक ‘उषाहरण’ आदि उल्लेखनीय थिक । एहि मे भागवत, महाभारत, पुराण आदिक चर्चा विशेष रूपे भेल अछि तथा कृष्णलीला-सम्बन्धी कथा कथानकक रूप मे विशेष गृहीत भेल । यद्यपि ई परम्परा हर्षनाथ झाक संग समाप्त भ’ गेल तथापि चन्दा झाक ‘अहिल्याचरित’, विन्ध्यानाथ झाक ‘रमेश्वरचन्द्रिका’ तथा बलदेव मिश्रक ‘राज-राजेश्वरी’ ओ ‘रमेशोदय’ नाटक धरि एकर प्रभाव रहल । वास्तव मे उन्नैसम शताब्दीक अन्त धरि मैथिली नाटकक विकास सन्तोषप्रद नहिं रहल, मुदा एही त्रैभाषिक नाटकक गर्भसँ आधुनिक मैथिली नाटक निःसृत भेल अछि ।
आधुनिक मैथिली नाट्य साहित्यक जनक कविवर जीवन झा मानल जाइत छथि । विशुद्ध मैथिली भाषा मे सर्वप्रथम नाटक लिखबाक लेल इएह प्रेरित भेलाह आ शिल्प ओ शैलीक दृष्टिएँ नाटक मे परिवर्तनक आरोपन कयल । हिनक चारि गोट नाटक ‘सुन्दर संयोग’, ‘सामवती’, ‘पुनर्जन्म’, ‘नर्मदा सागर’ एवं खंडित अंश ‘मैथिली सट्टक’ उपलब्ध अछि, जकरा एकठाम एकत्रित कय ‘कविवर जीवन झा रचनावली’ नामेँ मैथिली अकादमी प्रकाशित कयलक । ‘सुन्दर संयोग’ चारि अंक मे विभाजित सामाजिक नाटक थिक, जाहि मे नव विवाहित दम्पति सुन्दर आ सरलाक प्रेम विरह ओ मिलनक कथा चित्रित अछि । ‘नर्मदा सागर’ मे परिणय सँ पूर्वक प्रेमकथा चित्रित अछि । ‘सामवती पुनर्जन्म’ सात अंक मे विभाजित पौराणिक कथानक पर आधारित एक उत्कृष्ट नाटक थिक ।
तत्पश्चात् लालदास पौराणिक कथावस्तुक आधार पर ‘सावित्री सत्यवान’ नाटक दस अंक मे लिखलनि, जे सावित्री ओ सत्यवानक प्रणय-सम्बन्ध पर आधारित छैक । पतिक प्रति निष्ठा ओ आसक्ति केँ प्रदर्शित करैत एहि नाटकक अनेक गीत लालदासक अलंकार प्रियताक सफल उदाहरण थिक । मुन्शी रघुनन्दन दास छओ अंकमे ‘मिथिला नाटक’ लिखलनि, जाहिमे विशुद्ध राष्ट्रीयताक भावना सन्निहित अछि । हिनक ‘सुदर्शन’ ओ ‘दूतांगद व्यायोग’ नाटकक चर्चा सेहो कयल गेल अछि ।
सरसकवि ईशनाथ झा सामाजिक नाटक ‘चीनीक लड्डू’ तीन अंक मे लिखलनि, जे आधुनिक कुत्सित समाजक मर्म केँ उद्घाटित करैत अछि । हिनक ‘उगना’ नाटक तँ मिथिलांचलक कोनो एहन गाम नहि अछि, जतय मंचित नहि भेल होइ । एकर कथा विद्यापतिक शिव भक्ति आ ओहि सँ आह्लादित भय उगनाक रूप मे महादेवक विद्यापतिक चाकरी करब थिक ।
शारदानन्द झाक ‘फेरार’ नाटक राजनीतिक कथावस्तुक श्री गणेश करैछ । एहि मे १९४२ ई.क क्रान्ति आ तकर बादक ब्रिटिश सरकारक दमन चक देखौने छथि । पं. जीवनान्द झा दू अंकमे ‘दूर्गा विजय’ नाटक लिखलनि जे दुर्गा सप्तशतीक पाँचम अध्याय सँ एगारहम अध्याय धरिक कयास लय लिखल गेल ।
मंचनक दृष्टिएँ पं. गोविन्द झाक ‘बसात’, ‘तिक प्रणाम’ ओ ‘रुक्मिणीहरण’ बड़ ख्याति पओलक । मैथिल समाज मे नारी शिक्षाक अभाव, पति पत्नी मे जे असमानता देखल जाइत अछि तथा एहि असमानताक जे दुष्परिणाम होइत छैक-तकर सुन्दर चित्रण ‘बसात’ मे भेटैछ । नाट्य लेखन केँ सुधांशु शेखर चौधरी एक नव दिशा देलनि । ‘भफाइत चाहक जिनगी’, ‘लेटाइत आँचर’, ‘पहिल साँझ’, ‘मनुक्ख आ मनुक्ख’ एवं ‘एकतारा’ हिनक चर्चित नाटक थिक । दहेज प्रथाक दुष्परिणाम केँ चित्रित कय समाज केँ तकर विरोध करबा मे प्रयत्नशील होयब ‘लेटाइत आँचर’क उद्देश्य थिक । महेन्द्र मलगिया आ डॉ. अरविन्द कुमार ‘अक्कु’ आधुनिक नाटककार मे सर्वाधिक ध्यान आकर्षित कयलनि । महेन्द्र मलंगियाक ‘लक्ष्मण रेखा : खण्डित’, जुआएल कनकनी, ‘एक कमल नोरमे’ ‘ओकरा आंगनक बारहमासा’, ‘लेभराएल आ सीता’ एवं ‘बिरजू, बिलटू आ बाबू’ नाटकक सफल मंचन भेल अछि । ‘लक्ष्मण रेखा : खंडित’ आदर्शवादी नाटक थिक, जाहि मे विधवा-विवाह केँ आ तकर समस्या केँ नव दृष्टिएँ प्रस्तुत कयल गेल । अरविन्द कुमार ‘अक्कु’क ‘ताल-मुट्ठी’, ‘आगि धधकि रहल छै’, ‘पातक मनुक्ख’, ‘अन्हार जंगल’, ‘एना कतेक दिन’ ‘आतंक’ एवं ‘रक्त’ मंचनक दृष्टिएँ पूर्ण सफल रहल अछि ।
एकर अतिरिक्त आओर महत्वपूर्ण नाटक सभ अछि । विस्तारक भय रहबाक कारणे प्रमुख नाटक सभक मात्र नाम गनायब सम्भव अछि । पं. आनन्द झाक ‘सीता स्वयंवर’, पं. दामोदर झाक ‘गांधर्व विवाह’, डॉ. कांचीनाथ झा ‘किरण’क ‘विजेता विद्यापति’, मणीपद्मक ‘कण्ठहार’, ‘झुमकी’ ओ ‘तेसर कनिञा’, काशीनाथ मिश्रक ‘दिग्विजय’ आ ‘अयाची’, विद्यानाथ रायक ‘विद्यापति’, डॉ. रामदेव झाक ‘परिझैत पाथर’, गंगेश गुंजनक ‘आइ भोर’, उगयकान्त मिश्रक ‘मालिनी’, ‘नचिकेताक ‘एक छल राजा, ‘नाटकक लेल’ एवं ‘नायकक नाम जीवनम्’, भाग्यनारायणक झाक ‘मनोरथ’, छत्रानन्द सिंह झाक ‘प्रायश्चित्त’, बाबू साहेब चौधरीक ‘कुहेस’, विभूति आनन्दक ‘समय संकेत’, ‘गौरीकान्त चौधरी ‘कान्त’क ‘वरदान’, प्रबोधनारायण सिंहक ‘प्रेमक रोग’, गुणनाथ झाक ‘मधुयामिनी’, ‘पाथेय’, कनिञा-पुतरा’ ओ ‘लाल बुझक्कर’, उषा किरण खानक ‘एकसरि ठाढ़ि’ ओ ‘फागुन’ , घननाथ झाक ‘भगवती भक्त’, रवीन्द्रनाथ ठाकुरक ‘टू लेक’, ‘एक राति’ आ ‘जखने कहल कक्का हौ’, डॉ. सदन मिश्र ‘राजनर्तकी’, लल्लन प्रसाद ठाकुरक ‘बड़का साहेब’, ‘बकलेल’, मि. लीलो काका’ ओ ‘लौंगिया मरचाइ’ आदि नाटक मैथिली नाट्य साहित्यक अन्तर्गत मुख्यतः विविध भावधाराक प्रतिनिधित्व करैछ ।
नाटकक एकटा प्रवृत्ति आन भाषा-साहित्यक नीक नाटक सभक मैथिली अनुवाद करब सेहो थिक । एहि मे संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला ओ फ्रेंच साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सँ मैथिली नाट्य साहित्यक श्रृंगार करबाक प्रयास भेल । रघुनन्दन दासक ‘उत्तर रामचरित’, प्रो. ईशनाथ झाक ‘मृच्छकटिक’ ओ ‘शकुन्तला’, डा. सुधाकर झा शास्त्रीक मुद्रा राक्षस पं गोविन्द झाक ‘स्वप्न-वासवदत्ता’ ओ ‘मालविकाग्निमित्र’, दामोदर झाक ‘भूतक छाया’, जीवनान्द ठाकुरक ‘अभिषेक’, प्रो. प्रबोध नारायण सिंहक ‘अन्हेर नगरी’ ओ ‘चोर’, डॉ. अणिमा सिंहक ‘पियासल धरती उताहुल नोर’, छत्रानन्द सिंह झाक ‘अन्तिम प्रश्न’ आ ‘गाछ’, परमानन्द झाक ‘पार्वती परिणय’, डॉ. इलारानी सिंहक ‘प्रेम:एक कविता’ ओ ‘सलोमा’, दीनानाथ झाक ‘आगन्तुक’, रामलोचन ठाकुरक ‘चारि पहर’ आ ‘जादूगर’, कुणालक ‘बाँकी इतिहास’ आदि अनूदित नाटक पढ़ि साहित्यिक आनन्द विशेष लेल जा सकैछ ।
मैथिली-साहित्यक अन्य विधा (कथा, उपन्यास, आदि) क कृत्तिकेँ नाट्य-रूपान्तरित करब एम्हर आबि प्रारम्भ भेल अछि, जे मंचनक दृष्टिएँ बड़ सफलता प्राप्त कयलक । ‘यात्री’क ‘नवतुरिया’ उपन्यास, श्रीमती उषा किरण खान द्वारा ‘ललित’क ‘पृथ्वी-पुत्र’ उपन्यास, अशोक द्वारा ‘धूमकेतु’क कथा ‘अगुरवान’, मनोज मनुज द्वारा ‘राजकमलक’क ‘भग्न स्तूपक एकटा अक्षत’ कुणाल द्वारा एवं विभूति आनन्दक ‘रिटायरमेंट’ कथा ‘एसगर-एसगर’ नामेँ ज्योत्सना चन्द्रम् द्वारा महत्वपूर्ण कार्य थिक ।
आकाशवाणीक आविष्कार नाटक केँ दृश्य काव्यक संग श्रव्य काव्य बनाय देलक अछि । २३ जनवरी १९४५ केँ पटना मे एवं २ फरवरी ‘७९ केँ दरभंगा मे आकाशवाणीक स्थापना सँ चौपाल भारती, गामधर ओ सिङरहार कार्यक्रम मे मैथिलीक रेडियो नाटकक प्रवेश शुरू भेल । यद्यपि एहि दिशा मे सन्तोषप्रद कार्य नहि भ’ रहल अछि आ अधिकांश रेडियो नाटक अप्रकाशित पड़ल अछि । कुमार गंगानन्द सिंह लिखित ‘जीवन-संघर्ष’ पहिल रेडियो नाटक थिक, जे पटना केन्द्र सँ प्रसारित भेल छल । ‘मंगरूपाठक’, ‘जय सोमनाथ’, ‘सीता’, ‘चाकरी’, ‘हमर स्वप्न सार्थक भेल’, ‘प्रायश्चित्त, ‘पियास’, ‘कोजगराक भरिया’, बाढ़ि बाटे’, ‘नानक पूरा’, ‘आदर्श वर’, ‘गुरु गूड़-चेला चीनी’, प्रेमक सिन्दूर’, विश्वामित्र’, ‘लोचन धाए फेधाएल हरि नहि आयल हे’, ‘साध्वी सीता’, ‘इनोरेमे भांग’, ‘बातक बतंगर’, ‘आलूक बोरिया’, ‘मामा सावधान’, ‘नसबन्दी’, ‘शंकर-पराभव’, ‘युवा संकल्प’, ‘सिकीक डाली: मलकोकाक फूल’ आदि रेडियो नाटक बहुचर्चित रहल ।
मैथिली नाट्य-साहित्यक विकास मिथिलाक अतिरिक्त नेपाल आ आसाम मे भेल । कहल जाइछ जे मैथिली नाटकक जन्म मिथिला मे भेल आ विकास नेपाल मे । नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्थापित भेल, तकर श्रेय मल्ल वंश केँ देल जायत । मल्ल राजा लोकनि द्वारा मैथिली नाट्य साहित्यक हेतु जे सत्प्रयास कयल गेल, तकर साम्राज्य भातगाँव, काठमांडू, ललितपुर एवं बनेपा मे भेल । चारू केन्द्र मिलाय लगभग एक सय मैथिलीक नाटक लिखल गेल । परन्तु मल्ल राजवंशक पतनक बाद मैथिली नाट्य-साहित्यक समक्ष जे एक अल्प विरामक स्थिति आबि गेलैक, तकरा एमहर आबि दूर कयलनि, पं. जीवनाथ झा, डॉ. ‘धीरेन्द्र’, महेन्द्र मलंगिया, स्व. वासुदेव ठाकुर, गुणनाथ, रामभद्र, शशिकान्त ठाकुर, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, कृष्णकान्त ठाकुर प्रभृति ।
आसाम मे वैष्णव धर्मक प्रचार-प्रसार लेल मैथिली नात्य-साहित्यक विकास सोलहम शताब्दी मे भेल, जकरा ‘अंकीया नाट’ कहल गेल आ एकर प्रवर्त्तक शंकरदेव छलाह । अंकीया नाटककार मे माधवदेव, गोपालदेव आ रामलोचन ठाकुरक नाम अग्रगण्य अछि ।
मैथिली नाट्य-साहित्य केँ दुतगतिएँ आगाँ बढ़यबाक श्रेय मैथिली नाट्य-रंग केँ सेहो छैक । मैथिली रंगमंच केँ ठाढ़ करबा मे पटनाक चेतना समितिक मुख्य भूमिका रहल, जे सभ साल विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर किछु नाटकक मंचन करैत आयल अछि । संगहि बहुतो एहन नाट्य संस्था अछि, जे अनेकानेक मौलिक, अनूदित ओ रूपान्तरित मैथिली नाटकक मंचन कयलक । एहि मे प्रमुख अछि-‘भंगिमा’ (पटना), ‘अरिपन’ (पटना), ‘चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र’ (कलकत्ता), ‘अखिल भारतीय मिथिला संघ’ (कलकत्ता), ‘मिथिपात्रिक (कलकत्ता), ‘श्यामा नाट्य कला-परिषद’ (चनौर), ‘मिथिला नाट्य कला-परिषद्’ (सरिसव-पाही), ‘मिथिलाक्षर’ (जमशेदपुर), ‘मैथिली कला-मंच’ (बोकारो), ‘भद्रकाली नाट्य-परिषद्’ (कोइलख), ‘नाट्य-परिषद्’ (पिण्डारूछ) आदि ।
वास्तव मे मैथिली नाट्य-साहित्य अपन विकासक पथ पर अग्रसर भ’ रहल अछि । ऐतिहासिक, पौराणिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि भावभूमि पर आधारित नाटक द्वारा मैथिली-साहित्य गौरवान्वित भेल अछि । नाटककार मंच-कौशल केँ ध्यान मे राखि एकर अभिवृद्धि मे लागल रहैत छथि ।
मिथिलाक्षरक ऐतिहासिकता
मिथिलाक्षरक ऐतिहासिकता
ऐतिहासिक दृष्टिएँ मिथिलाक्षर लिपिक प्राचीनतम आओर प्रारम्भिक रूप चित्रात्मक छल । मैथिलीलिपि अर्थात् मिथि माथव सँ उत्पन्न विदेह जनकक राज्य मिथिला मे जाहि अक्षर सँ लिपिक रूप भाषाक रचना भेल, मिथिलाक्षर कहल जाइछ । मैथिली लिपिक प्राचीनतम उल्लेख, “ललित विस्तर" नामक बौद्ध ग्रंथ मे पाओल जाइछ, जतए ई “वैदेही-लिपि" कहल गेल अछि । ई पूर्वीय लिपि किंवा विदेह लिपि बंगला-आसामी ओ मैथिली-उड़िया वर्णमालाक जननी मानल जाइत अछि । मैथिलीक सभटा वर्ण-स्वरूप बंगालक प्राचीन पाण्डुलिपि मे भेटि जाइत अछि, तँ बंगाली पंडित सुविधा सँ मिथिलाक्षर पढ़ि लैत छथि । मगध तँ सहजहिं तत्कालीन वृहद विदेह मे अंगीभूत छल तें विक्रमशिला ओ नालन्दा मे लिखल मुसलमान आगमन सँ पूर्व एहन पाण्डुलिपि नेपाल मे सुरक्षित वर्णमालाक आलेख भेटैछ । परवर्त्तीकाल सातम शताब्दीक देवनागरी शैलीक वर्णमाला “कैथी"क प्रचार मगध, भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र होइत सरलता एवं संक्षिप्तताक कारणेँ मिथिला मे एकर पूर्ण प्रचार भेल । परञ्च मिथिलाक उच्च जातिक वर्ग मे प्राचीन लिपिक प्रयोग होइतहिं रहल । बाद मे मुद्रण कला विकसित भेलाक कारणें तिरहुता मे टाइपक निर्माण नहिं भऽ सकल, तखन हिन्दी साहित्यक प्रसारक संग ओकर लिपिक उपयोग मैथिलीक पोथी छपबा मे होमय लागल । ई स्थिति अद्यपर्यन्त अछि ।
मिथिलाक्षरक सभ सँ प्राचीन रूप “बौद्धगान" ओ “दोहा"क प्राचीन पाण्डुलिपि मे भेटैछ । एहि मध्य आलेखक तिथि नहिं भेटैछ । एहिना नेपालक पुस्तकालय सभ मे कतिपय अतिप्राचीन पाण्डुलिपि भेटैछ । राहुल सांकृत्यायन तिब्बत मे सुरक्षित कतोक पाण्डुलिपिक उल्लेख कएने छथि । “बिहार रिसर्च सोसाइटी" पटना मे सेहो मिथिलाक्षर मे लिखित संस्कृत ग्रन्थक पाण्डुलिपि सुरक्षित अछि ।
मिथिला मे लिपिक प्राचीनताक एकटा प्रमाण विदेह राज्यक स्थापना पहिने मिथिला मे व्रात्यनामक आदिवासीक प्रसंग संहित ओ ब्राह्मण-ग्रंथ सभ मे नीचवाचक शब्दक प्रयोग भेटैछ । व्रात्यलोकनिक सम्पूर्ण उत्तरी भारत मे प्रभावपूर्ण संस्कृति, साहित्य, भाषा, लिपि लौकिक छल, तेँ व्रात्य लोकनि ब्राह्मण ग्रंथ मे अनादरक पात्र छथि । महाभारत मे लिच्छवी केँ व्रात्य, क्षत्रिय तथा भगवान बुद्ध वज्जीक संज्ञा देने छथि, जकर अर्थ होइछ घुमक्कर । व्रात्यभाषा केँ बाटुला वर्त्तनी कहल जाइछ । मिथिला मे वर्णमाला केँ अद्यपर्यन्त वर्त्तनी कहल जाइछ, जे मिथिलाक्षर व्रात्य लोकनिक लिपिक संग घनिष्ठ सम्बन्धक सूचना दैछ । जाहि सँ मिथिलाक्षरक मूल अंश “ललित-विस्तर"क विदेह लिपि सँ बहुतो प्राचीन सिद्ध भए जाइछ ।
मिथिलाक्षरक उत्पत्ति कहिया ओ कोन रूपेँ भेल, निश्चित रूपेँ नहि कहल जा सकैछ, परंच प्रमाणस्वरूप “शतपथ ब्राह्मण"क अनुसार आर्यक एक दल माधव विदेह एवं हुनक पुरोहित रहुगणक नेतृत्व मे सरस्वती नदीक तट सँ सटले विदेह राजवंशक स्थापना कएल । संभव थीक जे ओ दल अपना संगे सिन्धु घाटीक सभ्यता, संस्कृत भाषा ओ लिपि सेहो अनने हो । “वृहदारण्य उपनिषद"क तेसर ओ चारिम अध्याय मे वर्णित याज्ञवल्क्य मैत्रेयी संवाद गर्भित तर्क प्रणाली सँ स्वभावतः अनुमान कएल जाइछ से शतपथ कालीन विदेह सर्वांग सम्पूर्ण विकसित राष्ट्र छल जकर स्वतंत्र वैदेही भाषा ओ स्वतंत्र वैदेही लिपि सेहो रहल होयतैक । एहि तथ्यक सम्पुष्टि बौद्ध धर्मक प्रसिद्ध ग्रंथ “ललित विस्तर" जकर चीनी अनुवाद ३०८ ई. मे भेल सँ प्रमाणित होइछ । एहि ग्रंथक ६६ गोट लिपिक सूची मे पूर्व-विदेह लिपिक चर्चा भेटैछ । विदेह लिपि सर्वांगीण पूर्वीय क्षेत्रक लिपिक विकास मैथिली, बंगला, आसामी ओ उड़िया लिपि सँ भेल । प्राचीन भारत मे दू गोट ब्राह्मी ओ खरोष्ठी लिपि प्रचलित छल । लिपिक प्राचीनतम प्रमाणेँ भारत मे पाँचम शताब्दी ई० पूर्वक पाणिनिक काल मे ब्राह्मीलिपि सँ मैथिलीक उद्भव ओ विकास भेल अछि । पूर्वी लिपि रूप सँ मैथिलीक, कैथी ओ बंगला विकसित भेल ।
मैथिलीक विकास रेखाचित्र निम्नवत् देखू :-
ब्राह्मीलिपि
उत्तरी शैली दक्षिणी शैली
गुप्तलिपि
कुटिललिपि
शारदालिपि नागरीलिपि
पूर्वीलिपि शैली पश्चिमी शैली
मैथिली, कैथी,
बंगला आदि । देवनागरी
डॉ० सुभद्र झा प्राच्य प्राकृत सँ निकलल भाषा सभ केँ निम्नरूपेँ दर्शौने छथि :-
प्राच्य प्राकृत
पश्चिमी पूर्वी
कौशल काशी मगध विदेह गौड़ ओड़ कामरूप
अवधी भोजपुरी मगही मैथिली बंगला ओड़िया आसामी
मैथिलीक विकास क्रमेँ प्राचीन मैथिली (दसम शताब्दी सँ अठारहम शताब्दी धरि) ओ नवीन मैथिली (अठारहम शताब्दी सँ अद्यपर्यन्त) दू गोट रूप मे मानल जाइछ ।
भारत भ्रमण कयनिहार तिब्बती यात्री धर्मस्वामी १२३४ ई० मे एहिठामक लिपिक चर्चा करैत ओकर नाम “बैवर्त्त-लिपि" कहलनि । ओ एहि सँ पूर्व विक्रमांकदेव चरित नामक ग्रंथ मे कुटिलाक्षर ओ कुटिल लिपिक चर्चा कएलनि अछि । सम्प्रति एकर नाम तिरहुता अछि । मुदा पढ़ल-लिखल लोक मे “मिथिलाक्षर" वा “मैथिली लिपि" रूप मे उद्धृत होइछ ।
म० म० हर प्रसाद शास्त्री “हाजार बछरेर पुरातन बौद्धगान ओ दोहा"क तालपत्रक आधार पर प्राचीनतम अभिलेख केँ “तिरहुता" कहि प्रकाशित कएलनि अछि । राहुल सांकृत्यायन “कुरुकुल्लासावन" नामक एक ग्रंथ तिब्बत मे प्राप्त कऽ ओहि लिपि के प्राचीनतम तिरहुता बतौलनि अछि । राजा नान्यदेवक मंत्री श्रीधर कायस्थक अंधराठाढ़ी (१०९७) ई० मे प्रायः सर्वप्रथम शुद्ध मिथिलाक्षरक दर्शन होइत अछि । तदन्तर नान्यदेवक बालक मलदेवक राजधानी भीठ भगवानपुरक लक्ष्मीनारायणक मूर्त्तिक नीचा शिलालेख मिथिलाक्षर मे अछि । एकर अतिरिक्त पनिचोभ ताम्रपत्र, आशी-शिलालेख, तिलकेश्वर गढ़ अभिलेख, खोजपुर अभिलेख, भागीरथपुरक शिलालेख, पोखराम गामक रामजानकी मन्दिर मे अवस्थित लक्ष्मीनारायणक मूर्त्तिक नीचाँ शिलालेख आदि मिथिलाक्षर मे देखल पाओल जाइत अछि ।
विद्यापतिक हाथ सँ (१४१८ ई०) लिखल भागवतक प्रतिलिपि मिथिलाक्षर मे कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मे सुरक्षित अछि । मैथिली लिपिक वर्ण-विन्यासक नियम “कामधेनु तंत्र" ओ “वर्णोद्धारतंत्र" मे प्रकाशित अछि । एकर प्रचार बंगाल ओ आसाम धरि अछि ।
प्राचीन ताम्रलिपि वा शिलालेख मिथिलाक्षर मे प्राप्त अछि । सम्प्रति मिथिलाक्षरक स्थान पर देवनागरी लिपिक प्रयोग होइत आबि रहल अछि ।
ऐतिहासिक दृष्टिएँ मिथिलाक्षर लिपिक प्राचीनतम आओर प्रारम्भिक रूप चित्रात्मक छल । मैथिलीलिपि अर्थात् मिथि माथव सँ उत्पन्न विदेह जनकक राज्य मिथिला मे जाहि अक्षर सँ लिपिक रूप भाषाक रचना भेल, मिथिलाक्षर कहल जाइछ । मैथिली लिपिक प्राचीनतम उल्लेख, “ललित विस्तर" नामक बौद्ध ग्रंथ मे पाओल जाइछ, जतए ई “वैदेही-लिपि" कहल गेल अछि । ई पूर्वीय लिपि किंवा विदेह लिपि बंगला-आसामी ओ मैथिली-उड़िया वर्णमालाक जननी मानल जाइत अछि । मैथिलीक सभटा वर्ण-स्वरूप बंगालक प्राचीन पाण्डुलिपि मे भेटि जाइत अछि, तँ बंगाली पंडित सुविधा सँ मिथिलाक्षर पढ़ि लैत छथि । मगध तँ सहजहिं तत्कालीन वृहद विदेह मे अंगीभूत छल तें विक्रमशिला ओ नालन्दा मे लिखल मुसलमान आगमन सँ पूर्व एहन पाण्डुलिपि नेपाल मे सुरक्षित वर्णमालाक आलेख भेटैछ । परवर्त्तीकाल सातम शताब्दीक देवनागरी शैलीक वर्णमाला “कैथी"क प्रचार मगध, भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र होइत सरलता एवं संक्षिप्तताक कारणेँ मिथिला मे एकर पूर्ण प्रचार भेल । परञ्च मिथिलाक उच्च जातिक वर्ग मे प्राचीन लिपिक प्रयोग होइतहिं रहल । बाद मे मुद्रण कला विकसित भेलाक कारणें तिरहुता मे टाइपक निर्माण नहिं भऽ सकल, तखन हिन्दी साहित्यक प्रसारक संग ओकर लिपिक उपयोग मैथिलीक पोथी छपबा मे होमय लागल । ई स्थिति अद्यपर्यन्त अछि ।
मिथिलाक्षरक सभ सँ प्राचीन रूप “बौद्धगान" ओ “दोहा"क प्राचीन पाण्डुलिपि मे भेटैछ । एहि मध्य आलेखक तिथि नहिं भेटैछ । एहिना नेपालक पुस्तकालय सभ मे कतिपय अतिप्राचीन पाण्डुलिपि भेटैछ । राहुल सांकृत्यायन तिब्बत मे सुरक्षित कतोक पाण्डुलिपिक उल्लेख कएने छथि । “बिहार रिसर्च सोसाइटी" पटना मे सेहो मिथिलाक्षर मे लिखित संस्कृत ग्रन्थक पाण्डुलिपि सुरक्षित अछि ।
मिथिला मे लिपिक प्राचीनताक एकटा प्रमाण विदेह राज्यक स्थापना पहिने मिथिला मे व्रात्यनामक आदिवासीक प्रसंग संहित ओ ब्राह्मण-ग्रंथ सभ मे नीचवाचक शब्दक प्रयोग भेटैछ । व्रात्यलोकनिक सम्पूर्ण उत्तरी भारत मे प्रभावपूर्ण संस्कृति, साहित्य, भाषा, लिपि लौकिक छल, तेँ व्रात्य लोकनि ब्राह्मण ग्रंथ मे अनादरक पात्र छथि । महाभारत मे लिच्छवी केँ व्रात्य, क्षत्रिय तथा भगवान बुद्ध वज्जीक संज्ञा देने छथि, जकर अर्थ होइछ घुमक्कर । व्रात्यभाषा केँ बाटुला वर्त्तनी कहल जाइछ । मिथिला मे वर्णमाला केँ अद्यपर्यन्त वर्त्तनी कहल जाइछ, जे मिथिलाक्षर व्रात्य लोकनिक लिपिक संग घनिष्ठ सम्बन्धक सूचना दैछ । जाहि सँ मिथिलाक्षरक मूल अंश “ललित-विस्तर"क विदेह लिपि सँ बहुतो प्राचीन सिद्ध भए जाइछ ।
मिथिलाक्षरक उत्पत्ति कहिया ओ कोन रूपेँ भेल, निश्चित रूपेँ नहि कहल जा सकैछ, परंच प्रमाणस्वरूप “शतपथ ब्राह्मण"क अनुसार आर्यक एक दल माधव विदेह एवं हुनक पुरोहित रहुगणक नेतृत्व मे सरस्वती नदीक तट सँ सटले विदेह राजवंशक स्थापना कएल । संभव थीक जे ओ दल अपना संगे सिन्धु घाटीक सभ्यता, संस्कृत भाषा ओ लिपि सेहो अनने हो । “वृहदारण्य उपनिषद"क तेसर ओ चारिम अध्याय मे वर्णित याज्ञवल्क्य मैत्रेयी संवाद गर्भित तर्क प्रणाली सँ स्वभावतः अनुमान कएल जाइछ से शतपथ कालीन विदेह सर्वांग सम्पूर्ण विकसित राष्ट्र छल जकर स्वतंत्र वैदेही भाषा ओ स्वतंत्र वैदेही लिपि सेहो रहल होयतैक । एहि तथ्यक सम्पुष्टि बौद्ध धर्मक प्रसिद्ध ग्रंथ “ललित विस्तर" जकर चीनी अनुवाद ३०८ ई. मे भेल सँ प्रमाणित होइछ । एहि ग्रंथक ६६ गोट लिपिक सूची मे पूर्व-विदेह लिपिक चर्चा भेटैछ । विदेह लिपि सर्वांगीण पूर्वीय क्षेत्रक लिपिक विकास मैथिली, बंगला, आसामी ओ उड़िया लिपि सँ भेल । प्राचीन भारत मे दू गोट ब्राह्मी ओ खरोष्ठी लिपि प्रचलित छल । लिपिक प्राचीनतम प्रमाणेँ भारत मे पाँचम शताब्दी ई० पूर्वक पाणिनिक काल मे ब्राह्मीलिपि सँ मैथिलीक उद्भव ओ विकास भेल अछि । पूर्वी लिपि रूप सँ मैथिलीक, कैथी ओ बंगला विकसित भेल ।
मैथिलीक विकास रेखाचित्र निम्नवत् देखू :-
ब्राह्मीलिपि
उत्तरी शैली दक्षिणी शैली
गुप्तलिपि
कुटिललिपि
शारदालिपि नागरीलिपि
पूर्वीलिपि शैली पश्चिमी शैली
मैथिली, कैथी,
बंगला आदि । देवनागरी
डॉ० सुभद्र झा प्राच्य प्राकृत सँ निकलल भाषा सभ केँ निम्नरूपेँ दर्शौने छथि :-
प्राच्य प्राकृत
पश्चिमी पूर्वी
कौशल काशी मगध विदेह गौड़ ओड़ कामरूप
अवधी भोजपुरी मगही मैथिली बंगला ओड़िया आसामी
मैथिलीक विकास क्रमेँ प्राचीन मैथिली (दसम शताब्दी सँ अठारहम शताब्दी धरि) ओ नवीन मैथिली (अठारहम शताब्दी सँ अद्यपर्यन्त) दू गोट रूप मे मानल जाइछ ।
भारत भ्रमण कयनिहार तिब्बती यात्री धर्मस्वामी १२३४ ई० मे एहिठामक लिपिक चर्चा करैत ओकर नाम “बैवर्त्त-लिपि" कहलनि । ओ एहि सँ पूर्व विक्रमांकदेव चरित नामक ग्रंथ मे कुटिलाक्षर ओ कुटिल लिपिक चर्चा कएलनि अछि । सम्प्रति एकर नाम तिरहुता अछि । मुदा पढ़ल-लिखल लोक मे “मिथिलाक्षर" वा “मैथिली लिपि" रूप मे उद्धृत होइछ ।
म० म० हर प्रसाद शास्त्री “हाजार बछरेर पुरातन बौद्धगान ओ दोहा"क तालपत्रक आधार पर प्राचीनतम अभिलेख केँ “तिरहुता" कहि प्रकाशित कएलनि अछि । राहुल सांकृत्यायन “कुरुकुल्लासावन" नामक एक ग्रंथ तिब्बत मे प्राप्त कऽ ओहि लिपि के प्राचीनतम तिरहुता बतौलनि अछि । राजा नान्यदेवक मंत्री श्रीधर कायस्थक अंधराठाढ़ी (१०९७) ई० मे प्रायः सर्वप्रथम शुद्ध मिथिलाक्षरक दर्शन होइत अछि । तदन्तर नान्यदेवक बालक मलदेवक राजधानी भीठ भगवानपुरक लक्ष्मीनारायणक मूर्त्तिक नीचा शिलालेख मिथिलाक्षर मे अछि । एकर अतिरिक्त पनिचोभ ताम्रपत्र, आशी-शिलालेख, तिलकेश्वर गढ़ अभिलेख, खोजपुर अभिलेख, भागीरथपुरक शिलालेख, पोखराम गामक रामजानकी मन्दिर मे अवस्थित लक्ष्मीनारायणक मूर्त्तिक नीचाँ शिलालेख आदि मिथिलाक्षर मे देखल पाओल जाइत अछि ।
विद्यापतिक हाथ सँ (१४१८ ई०) लिखल भागवतक प्रतिलिपि मिथिलाक्षर मे कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मे सुरक्षित अछि । मैथिली लिपिक वर्ण-विन्यासक नियम “कामधेनु तंत्र" ओ “वर्णोद्धारतंत्र" मे प्रकाशित अछि । एकर प्रचार बंगाल ओ आसाम धरि अछि ।
प्राचीन ताम्रलिपि वा शिलालेख मिथिलाक्षर मे प्राप्त अछि । सम्प्रति मिथिलाक्षरक स्थान पर देवनागरी लिपिक प्रयोग होइत आबि रहल अछि ।
मैथिलीक लोकगीत साहित्य
मैथिलीक लोकगीत साहित्य
(मैथिलीक लोक साहित्य समस्त भारतीय भाषा मे सर्वाधिक समृद्ध अछि । खास कऽ केँ लोक गीत मिथिलाक कण-कण मे रसल-बसल अछि । जीवनक समस्त संस्कार सँ लऽ कऽ खेती-पथारी, जाँत चलेयवाकाल आ खेत मे काज करऽ समय धरिक जीवनक हर्ष-विषाद, आरोह-अवरोह आदि लोकगीत मे लयबद्ध अछि । समय-समय पर अपन चारित्रिक विशिष्टता आ कर्तव्यनिष्ठता द्वारा अनेकानेक इतिहास पुरुष हमरा लोकनिक लेल प्रेरणास्रोत बनलाह । )
लोकविद्या समस्त विद्याक जननी ओ लोकजीवनक सांस्कृतिक आत्मा थिक, जे मानव जीवनक विकासयात्रा मे वेदविद्याके सारस्वते रूपे उद्गमित करबा मे समर्थ भेल । आइ ओ वेदविद्याक समानान्तर प्रवाहित होइत अवशिष्ट अछि । लोकक सम्बन्ध मूलतः निषाद, द्रविड़ ओ किरात मूलक ओ वेदक सम्बन्ध आर्यमूलक जाति-उपजाति सभ सँ रहल अछि । अहि तरहें वैदिक साहित्य मे आर्य एवं आर्येतर संस्कृति सभक समाहार देखना जाइछ । वस्तुतः लोकसाहित्य ओ वैदिक साहित्यक अन्तर सम्बन्ध ओ समानान्तरताक अनुशीलन आवश्यक अछि । मिथिलांचल लोकविद्या ओ वेदविद्या दुनूक जाग्रत भूमि थिक ।
लोकसंस्कृतिक सन्दर्भ मे लोकविद्याक विस्तार लोकधर्म, लोककला ओ लोकसाहित्य मे देखना जाइछ । भारतीय लोकधार्मिक उत्स मूलतः आर्येतर संस्कृति मे अन्तर्निहित अछि । अहि पृष्ठभूमि मे देवीक उपासना आयोजित अर्थात निषाद लोकनिक अवदान थिक मुदा देवोपासना आर्य लोकनिक । एकरा मे मातृमूलक सत्ता अर्थात पितृब्रम्हक । ब्रह्म एकटा अनादि शक्तिक केन्द्र बिन्दु थिक, जनिक पूजोपासना केओ माताक करुणा प्राप्त करबाक लेल करैत अछि तँ केओ पिताक स्नेहक लेल । अतः ब्रह्मक कोनो लिंग नहि होइछ । ब्रह्म मूलतः एकटा देव शक्ति थिक, तकर विस्तार सृजन, पोषण एवं संहार मे देखना जाइछ । हमरा लोकनिक जीवन चक्र लोकधर्मक धूरी पर आनुष्ठानिक आचार, कलात्मक विन्यास ओ सांस्कृतिक साहित्यिक गरिमा सँ मण्डित अछि । समस्त आनुष्ठानिक आचार, पूजा पाठ, गहवर, स्तुतिगान (भगैत), गाथाचक्र, वाद्य वादन, नृत्य संगीत आदि सँ मण्डित अछि । जकर शाब्दिक अभिव्यंजना लोकसाहित्यक विभिन्न विधा सभ मे भेल अछि ।
मिथिलाक ग्राम्य जीवनक मुक्त आकाश ओ धरतीक बीच गहन जीवनानुभूति सँ परिपूर्ण गीत, ऐतिहासिक ओ सांस्कृतिक गाथा, जीवन संदेशमे सरल कथा, अनुभवसिद्ध लोकोक्ति, बुद्धिमापक बुझौअलि, रहस्यमय मंत्र आदि सँ जे लोकसरस्वती अबतारित होइत अछि, तकरे प्रभावलीक नाम थिक लोकसंस्कृति । मैथिली लोकसाहित्य मिथिलांचलक लोकसंस्कृतिक सारस्वत स्वरूप थिक । अहि लोक, लोकसंस्कृति ओ लोकसाहित्यक तात्विक अभिज्ञान लोक केँ भले नहि होउक, मुदा ओकर उपेक्षा नृत्यवेत्ता, समाजशास्त्री, राजकीय प्रशासन संस्कृतिकर्मी ओ लोकसाहित्यविद नहि कऽ सकैछ, कियेक तँ लोके सँ राष्ट्रीय संस्कृति केँ चेतना प्राप्त होइत अछि । यैह कारण अछि, जे लोक केँ राष्ट्रक अमूल्य निधि मानल जाइछ, अमर स्वरूप मानल जाइछ जकर अनुभूति जे चेतनाक अभिव्यक्ति लोकसाहित्य मे भेल अछि । अतः मिथिलांचलक मैथिली लोकसाहित्य राष्ट्रक अमूल्य निधि थिक ।
जँ हिमालयक समस्त सौन्दर्य, कमला-कोसी-बलान, गंगा ओ गण्डकीक हिलोर, हरियर वन-प्रांतर एवं खेत-खरिहानक सुषमा ओ समृद्धि धीरोदात्त ओ धीरललित नायक-नायिका सभक शौर्य-पराक्रम एवं श्रृंगार ओ करुणाक अभिव्यक्ति, युग-युगान्तरसँ परम्परित अनुभूतिपूर्ण ओ प्रमाणसिद्ध उक्तिसभ, ज्ञानमापक पहेलिकासभक अलावा मुक्ताकाश मे तरुण मेघक मलार उत्तरांचलक हिम हवा ओ दक्षिणांचलक धान गेहूँ-गुलाब आदिक सुगंधिकेँ समेटि क लोककंठकेँ समर्पित कऽ देल जाय तँ ओहि कंठ सँ जे स्वर समवेत स्पंदित होयत, ओ होयत मैथिली लोकसाहित्य । अतः हमरा लोकनिक मैथिली लोकसाहित्य ओतबे नैसर्गिक अछि जतेक कोनो वनफूल, ओतवे उन्मुक्त अछि जतेक आकाशक चिड़ै, ओतवे सरल-तरल, पवित्र ओ प्रवाहमान अछि जतेक गंगा ओ कमलाक धार ।
भारतक सांस्कृतिक इतिहास मे मिथिला ओ मैथिलीक योगदान महत्वपूर्ण अछि । भारतक जनपदीय लोकसाहित्यक अध्ययन ओ अन्वेषणक परम्परामे मैथिली लोकसाहित्यक सारस्वत भूमिका के जार्ज ग्रियर्सन, राम इकबाल सिंह राकेश, ब्रजकिशोर बर्मा ‘मणिपद्म’, डा० जयकान्त मिश्र, पं० राजेश्बर झा, डा० पूर्णानन्द दास, डा० अणिमा सिंह, डा० प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’, डा० व्यथित आदि विद्वान लोकनि रेखांकित कयने छथि । तथापि मैथिली लोकसाहित्य महोदधिक मंथनक हेतु एकटा साधन सम्पन्न लोकसंस्कृति संस्थानक निर्माण अनिवार्य बुझना जाइछ, कियेक तँ दिन प्रतिदिन सुखाइत अहि लोकसाहित्य सागर केँ वैज्ञानिक ढंग सँ सर्वेक्षण, संकलन ओ अनुशीलनक अपेक्षा अछि । मैथिली गाथागीतक दृष्टिसँ मिथिला ओ मधेसक सीमावर्ती भूभाग बेस उर्वर अछि कियेक तँ सीमावर्ती क्षेत्र धरना बहुल होइत अछि, जकर अनुगायन मैथिली गाथा गीत साहित्य मे भेल अछि । आलोच्य सीमांत भूभाग सलहेस कुसमा, रेसमा-चूहर एवं काजरि-माजरिक रंगभूमि; लोरिक घुघली, धरमा, अमर सिंह, जयसिंह आदिक रणभूमि; दुलरा दयाल, नैका बनियारा, शंभु बनिया आदिक व्यापारिक अभियान क्षेत्र; बावन -बखतौर, कारू भुइयां आदिक गोजर भूमि अछि । ‘लबहरि-कुसहरि’ मिथिला ओ मैथिलीक अभिनव गाथा थिक , जाहिमे उत्तररामचरितक कथा भूमि, वर्णित अछि । गाथा मे सीता वनवास, लव कुशक जन्म, वाल्मीकि आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा, ओ रामक सेनाक संग लवकुशक युद्धक गाथा गायन भेल अछि । अहिमे आभिजात्य संस्कृति रुपांकित अछि । मुदा आभिजात्ये संस्कृतिक सलहेस मिथिला-मधेसक सीमांत क्षेत्रक मैथिलीक अपन गाथा थिक । मैथिली लोकसाहित्यक इतिहासक दृष्टिसँ सलहेस ओ गाथा थिक, जाहिमे वन्य संस्कृतिक अवसान ओ मैदानी संस्कृतिक आरंभ देखना जाइछ । अहिमे मिथिला, मगध, नेपाल ओ तिब्बतक सम्बन्ध सूत्र, किरात, मल्ल ओ राजन्य संस्कृति, शैवशाक्त ओ बौद्ध धर्म, मालिनी कष्ट, त्रिपुर साधना एवं चक्रपूजनक सांस्कृतिक परिवेश उद्घाटित भेल अछि । मैथिली लोकगाथाक चर्चित नायक सलहेस आइ हिमालयक पार प्रदेशसँ गंगा तीर धरिक जनपद मे लोक देवताक रूप मे पूजित छथि ।
मैथिलीक गाथा लोरिकाइन गाथानायक लोरिक यद्यपि लोक देवताक रूपमे पूजित नहि छथि तथापि लेरिकाइनक गाथा ओ लोकनाट्यक परम्पराक उल्लेख लोरिक, ज्योतिश्वरक ‘वर्णत्नाकर’ (चौदहम सदी) मे प्राप्त होइछ । आलोच्य गाथाक नायक लोरिक त्रिकोणात्मक प्रेमक कथाभूमि मे पत्नी मांजरी ओ प्रेयसी चनैनक बीच अवस्थित छथि । बनठा चमार लोरिकाइनक खलनायक थिक । सुपौल जिलाक हरदीगड़ मे लोरिकक आराध्य भगवती दुर्गा प्रतिष्ठित छथि जनिक प्रांगण मे युद्धरत लोरिक ओ बनठा चमारक मध्य पृष्ठभूमि मे चनैनक भव्य मूर्ति बनयवाक ओ लोरिक नाचक परम्परा अवशिष्ट अछि । अहि प्रेमगाथा सँ उत्प्रेरित भ’ मुल्ला दाउद ‘चन्दायन’क रचना कयने छलाह । ‘चन्दायन’ सूफी साहित्यक चर्चित काव्य थिक ।
मिथिला बनाम तीरभूक्ति हिमालय सँ निःसृत कोसी, कमला, बलान, जीवछ, तिलजुगा, गंगा आदि नदी सभक क्रीड़ा भूमि मानल जाइछ । कमला कें मिथिलांचलक गंगाक आस्पद प्राप्त छनि । ओ नदी देवीक रूपमे पूजित छथि । मैथिलीक अनेक गाथा सभ मे सूर्यक ज्योतिकें म्लान करयवाली दिव्यांगना कमलाक भूमिका सतत प्रवाहित अछि । ‘दुलरा दयाल’क गाथा नदी संस्कृतिक गाथा थिक । ‘दुलरादयाल’ मे कमलांचलक जनपदीय संस्कृति, हिमालय सँ गंगा पार धरिक व्यापारिक अभियान, कोयलावीर, तांत्रिक नृत्य, डाइन कल्ट आदिक नीक अभिव्यक्ति भेल अछि । गाथानायक दयाल सिंहक चरित प्रेमक उदारता, साहसिक अभियान, वणिक कौशल, निरभि मानिता आदिक गुण सँ गरिमा मण्डित अछि ।
नैका बनिजारा’ मैथिलीक गाथा मणि थिक । एहि मे राजा-बेपारी, डोम-चण्डाल, घांगड़-बांगड़ बेकाली डकैत आदिक चारित्रिक विशिष्टता सभक संगे पूर्वांचलक व्यापारिक मार्गक स्पष्ट निर्देश भेटैत अछि । ओहि समय नदी मार्ग द्वारा हिमालयक पाद प्रवेश सँ ताम्रलिपि धरि प्रचलित छल । अहिमे नदी मार्गीय व्यापारक राजकीय संरक्षण, जलद सँ संयुक्त आतंक, दास-दासीक कीन-बेच, बारह वर्षक दीर्घ अभियान, पारिवारिक ओझराहटि, मणि-माणिक्य ओ स्वर्ण-रत्न राशिक माध्यमे व्यापार, वणिक केन्द्र, पड़ाव, हाट-बाट-घाट आदिक संधान पाओल जाइछ । मिथिलांचलक प्रख्यात व्यापारिक संदर्भ मे नैका बनिजाराक अलावा शोभा ओ शंभु बनिजाराक मैथिली गाथा सेहो लोकप्रचलित अछि ।
मैथिली लोकसाहित्यक सर्वाधिक अहि पंचगाथा रत्नक अतिरिक्त दीना-भद्रीक गाथा मे शोषण-उत्पीड़नक विरुद्ध प्रतिकारक स्वर पहिल बेर मुखर देखना जाइछ । यैह प्रतिकार वसावनक गाथा मे सेहो उपलब्ध अछि । अहि तरहें लोकप्रचलित बखतौर, कारू, विजयमल, कारिख पंजियार, मलही सुलतान, फेकू-दयाराम, गनीनाथ-गोविन्द, रणपाल-धनपाल आदिक गाथा सभ मध्यकालीन मिथिलांचलक ऐतिहासिक अभिलेख बनल अछि ।
लोकगीत लोकसाहित्यक सर्वाधिक चर्चित विधा अछि, जकर विस्तार जन्म सँ ल’ क मृत्युधरि, पावनि-तिहार सँ ल’क धार्मिक अनुष्ठान धरि, घर आंगन सँ ल’ क खेत- खरिहान धरि एवं व्यक्तिगत अनुभूति सँ ल’ क’ सामूहिक लोकोत्सव धरि देखना जाइछ । अतः मैथिली लोकगीतक अनंत विस्तार कें अभिलेख बान्हल नहि जा सकैछ । भारतीय लोकगीत साहित्यक परिप्रेक्ष्य मे मैथिली लोकगीतक अनुशीलनसँ अनुरंजित अछि जँ कोनो भिन्नता देखना जाइछ तँ भाषा भेद, संस्कार भेद ओ भौगोलिक भेदक कारणें । आर यैह होइछ प्रत्येक जनपदक लोकगीतक विशिष्टता
। उदाहरणार्थ पर्वतांचल ओ हरितांचलक प्राकृतिक पृष्ठभूमि, भाषायी स्वरूप, गायन पद्धति, पूजा प्रक्रिया एवं सांस्कारिक विधान अवश्ये भिन्न होयत । राजस्थानक धरती मे जे उष्मा, पंजाब-हरियाणाक धरती मे जे उछाह ओ मस्ती एवं मिथिलांचल धरती मे जे सौकमार्य देखना जाइछ, ओ अन्यत्र दुर्लभ मानल जाइछ ।
मुदा मैथिली लोकगीत साहित्य सोहर ओ मंगलगीत मे जे करुणा, देवता-देवी विषयक गीतमे जे श्रद्धा ओ भक्ति, चैतीचांचर ओ मलार गीत मे जे ऋतुजन्य सौन्दर्य ओ सुषमा, गंगा-कमला ओ कोसीगीत मे जे प्रवाह, जँतसार, लगनी ओ बटगमनी गीत मे गार्हस्थ जीवनक उपराग ओ विराग, नेनागीत मे जे निश्छलता, मंत्रगीत मे जे रहस्यात्मक प्रतीक एवं समदाओन गीत मे जे करूणा अभिव्यंजित भेल अछि, ओ अनुपम अछि । मैथिली लोकगीत सभक भाषागत सौकुमार्य, नादगत सौन्दर्य ओ भावगत गरिमा विशिष्ट अछि । मिथिलांचलक सम्पूर्ण जीवन आचार ओ संस्कार मण्डित एवं प्रत्येक संस्कार गीत-नाद सँ अनुप्राणित अछि ।
(मैथिलीक लोक साहित्य समस्त भारतीय भाषा मे सर्वाधिक समृद्ध अछि । खास कऽ केँ लोक गीत मिथिलाक कण-कण मे रसल-बसल अछि । जीवनक समस्त संस्कार सँ लऽ कऽ खेती-पथारी, जाँत चलेयवाकाल आ खेत मे काज करऽ समय धरिक जीवनक हर्ष-विषाद, आरोह-अवरोह आदि लोकगीत मे लयबद्ध अछि । समय-समय पर अपन चारित्रिक विशिष्टता आ कर्तव्यनिष्ठता द्वारा अनेकानेक इतिहास पुरुष हमरा लोकनिक लेल प्रेरणास्रोत बनलाह । )
लोकविद्या समस्त विद्याक जननी ओ लोकजीवनक सांस्कृतिक आत्मा थिक, जे मानव जीवनक विकासयात्रा मे वेदविद्याके सारस्वते रूपे उद्गमित करबा मे समर्थ भेल । आइ ओ वेदविद्याक समानान्तर प्रवाहित होइत अवशिष्ट अछि । लोकक सम्बन्ध मूलतः निषाद, द्रविड़ ओ किरात मूलक ओ वेदक सम्बन्ध आर्यमूलक जाति-उपजाति सभ सँ रहल अछि । अहि तरहें वैदिक साहित्य मे आर्य एवं आर्येतर संस्कृति सभक समाहार देखना जाइछ । वस्तुतः लोकसाहित्य ओ वैदिक साहित्यक अन्तर सम्बन्ध ओ समानान्तरताक अनुशीलन आवश्यक अछि । मिथिलांचल लोकविद्या ओ वेदविद्या दुनूक जाग्रत भूमि थिक ।
लोकसंस्कृतिक सन्दर्भ मे लोकविद्याक विस्तार लोकधर्म, लोककला ओ लोकसाहित्य मे देखना जाइछ । भारतीय लोकधार्मिक उत्स मूलतः आर्येतर संस्कृति मे अन्तर्निहित अछि । अहि पृष्ठभूमि मे देवीक उपासना आयोजित अर्थात निषाद लोकनिक अवदान थिक मुदा देवोपासना आर्य लोकनिक । एकरा मे मातृमूलक सत्ता अर्थात पितृब्रम्हक । ब्रह्म एकटा अनादि शक्तिक केन्द्र बिन्दु थिक, जनिक पूजोपासना केओ माताक करुणा प्राप्त करबाक लेल करैत अछि तँ केओ पिताक स्नेहक लेल । अतः ब्रह्मक कोनो लिंग नहि होइछ । ब्रह्म मूलतः एकटा देव शक्ति थिक, तकर विस्तार सृजन, पोषण एवं संहार मे देखना जाइछ । हमरा लोकनिक जीवन चक्र लोकधर्मक धूरी पर आनुष्ठानिक आचार, कलात्मक विन्यास ओ सांस्कृतिक साहित्यिक गरिमा सँ मण्डित अछि । समस्त आनुष्ठानिक आचार, पूजा पाठ, गहवर, स्तुतिगान (भगैत), गाथाचक्र, वाद्य वादन, नृत्य संगीत आदि सँ मण्डित अछि । जकर शाब्दिक अभिव्यंजना लोकसाहित्यक विभिन्न विधा सभ मे भेल अछि ।
मिथिलाक ग्राम्य जीवनक मुक्त आकाश ओ धरतीक बीच गहन जीवनानुभूति सँ परिपूर्ण गीत, ऐतिहासिक ओ सांस्कृतिक गाथा, जीवन संदेशमे सरल कथा, अनुभवसिद्ध लोकोक्ति, बुद्धिमापक बुझौअलि, रहस्यमय मंत्र आदि सँ जे लोकसरस्वती अबतारित होइत अछि, तकरे प्रभावलीक नाम थिक लोकसंस्कृति । मैथिली लोकसाहित्य मिथिलांचलक लोकसंस्कृतिक सारस्वत स्वरूप थिक । अहि लोक, लोकसंस्कृति ओ लोकसाहित्यक तात्विक अभिज्ञान लोक केँ भले नहि होउक, मुदा ओकर उपेक्षा नृत्यवेत्ता, समाजशास्त्री, राजकीय प्रशासन संस्कृतिकर्मी ओ लोकसाहित्यविद नहि कऽ सकैछ, कियेक तँ लोके सँ राष्ट्रीय संस्कृति केँ चेतना प्राप्त होइत अछि । यैह कारण अछि, जे लोक केँ राष्ट्रक अमूल्य निधि मानल जाइछ, अमर स्वरूप मानल जाइछ जकर अनुभूति जे चेतनाक अभिव्यक्ति लोकसाहित्य मे भेल अछि । अतः मिथिलांचलक मैथिली लोकसाहित्य राष्ट्रक अमूल्य निधि थिक ।
जँ हिमालयक समस्त सौन्दर्य, कमला-कोसी-बलान, गंगा ओ गण्डकीक हिलोर, हरियर वन-प्रांतर एवं खेत-खरिहानक सुषमा ओ समृद्धि धीरोदात्त ओ धीरललित नायक-नायिका सभक शौर्य-पराक्रम एवं श्रृंगार ओ करुणाक अभिव्यक्ति, युग-युगान्तरसँ परम्परित अनुभूतिपूर्ण ओ प्रमाणसिद्ध उक्तिसभ, ज्ञानमापक पहेलिकासभक अलावा मुक्ताकाश मे तरुण मेघक मलार उत्तरांचलक हिम हवा ओ दक्षिणांचलक धान गेहूँ-गुलाब आदिक सुगंधिकेँ समेटि क लोककंठकेँ समर्पित कऽ देल जाय तँ ओहि कंठ सँ जे स्वर समवेत स्पंदित होयत, ओ होयत मैथिली लोकसाहित्य । अतः हमरा लोकनिक मैथिली लोकसाहित्य ओतबे नैसर्गिक अछि जतेक कोनो वनफूल, ओतवे उन्मुक्त अछि जतेक आकाशक चिड़ै, ओतवे सरल-तरल, पवित्र ओ प्रवाहमान अछि जतेक गंगा ओ कमलाक धार ।
भारतक सांस्कृतिक इतिहास मे मिथिला ओ मैथिलीक योगदान महत्वपूर्ण अछि । भारतक जनपदीय लोकसाहित्यक अध्ययन ओ अन्वेषणक परम्परामे मैथिली लोकसाहित्यक सारस्वत भूमिका के जार्ज ग्रियर्सन, राम इकबाल सिंह राकेश, ब्रजकिशोर बर्मा ‘मणिपद्म’, डा० जयकान्त मिश्र, पं० राजेश्बर झा, डा० पूर्णानन्द दास, डा० अणिमा सिंह, डा० प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’, डा० व्यथित आदि विद्वान लोकनि रेखांकित कयने छथि । तथापि मैथिली लोकसाहित्य महोदधिक मंथनक हेतु एकटा साधन सम्पन्न लोकसंस्कृति संस्थानक निर्माण अनिवार्य बुझना जाइछ, कियेक तँ दिन प्रतिदिन सुखाइत अहि लोकसाहित्य सागर केँ वैज्ञानिक ढंग सँ सर्वेक्षण, संकलन ओ अनुशीलनक अपेक्षा अछि । मैथिली गाथागीतक दृष्टिसँ मिथिला ओ मधेसक सीमावर्ती भूभाग बेस उर्वर अछि कियेक तँ सीमावर्ती क्षेत्र धरना बहुल होइत अछि, जकर अनुगायन मैथिली गाथा गीत साहित्य मे भेल अछि । आलोच्य सीमांत भूभाग सलहेस कुसमा, रेसमा-चूहर एवं काजरि-माजरिक रंगभूमि; लोरिक घुघली, धरमा, अमर सिंह, जयसिंह आदिक रणभूमि; दुलरा दयाल, नैका बनियारा, शंभु बनिया आदिक व्यापारिक अभियान क्षेत्र; बावन -बखतौर, कारू भुइयां आदिक गोजर भूमि अछि । ‘लबहरि-कुसहरि’ मिथिला ओ मैथिलीक अभिनव गाथा थिक , जाहिमे उत्तररामचरितक कथा भूमि, वर्णित अछि । गाथा मे सीता वनवास, लव कुशक जन्म, वाल्मीकि आश्रम मे शिक्षा-दीक्षा, ओ रामक सेनाक संग लवकुशक युद्धक गाथा गायन भेल अछि । अहिमे आभिजात्य संस्कृति रुपांकित अछि । मुदा आभिजात्ये संस्कृतिक सलहेस मिथिला-मधेसक सीमांत क्षेत्रक मैथिलीक अपन गाथा थिक । मैथिली लोकसाहित्यक इतिहासक दृष्टिसँ सलहेस ओ गाथा थिक, जाहिमे वन्य संस्कृतिक अवसान ओ मैदानी संस्कृतिक आरंभ देखना जाइछ । अहिमे मिथिला, मगध, नेपाल ओ तिब्बतक सम्बन्ध सूत्र, किरात, मल्ल ओ राजन्य संस्कृति, शैवशाक्त ओ बौद्ध धर्म, मालिनी कष्ट, त्रिपुर साधना एवं चक्रपूजनक सांस्कृतिक परिवेश उद्घाटित भेल अछि । मैथिली लोकगाथाक चर्चित नायक सलहेस आइ हिमालयक पार प्रदेशसँ गंगा तीर धरिक जनपद मे लोक देवताक रूप मे पूजित छथि ।
मैथिलीक गाथा लोरिकाइन गाथानायक लोरिक यद्यपि लोक देवताक रूपमे पूजित नहि छथि तथापि लेरिकाइनक गाथा ओ लोकनाट्यक परम्पराक उल्लेख लोरिक, ज्योतिश्वरक ‘वर्णत्नाकर’ (चौदहम सदी) मे प्राप्त होइछ । आलोच्य गाथाक नायक लोरिक त्रिकोणात्मक प्रेमक कथाभूमि मे पत्नी मांजरी ओ प्रेयसी चनैनक बीच अवस्थित छथि । बनठा चमार लोरिकाइनक खलनायक थिक । सुपौल जिलाक हरदीगड़ मे लोरिकक आराध्य भगवती दुर्गा प्रतिष्ठित छथि जनिक प्रांगण मे युद्धरत लोरिक ओ बनठा चमारक मध्य पृष्ठभूमि मे चनैनक भव्य मूर्ति बनयवाक ओ लोरिक नाचक परम्परा अवशिष्ट अछि । अहि प्रेमगाथा सँ उत्प्रेरित भ’ मुल्ला दाउद ‘चन्दायन’क रचना कयने छलाह । ‘चन्दायन’ सूफी साहित्यक चर्चित काव्य थिक ।
मिथिला बनाम तीरभूक्ति हिमालय सँ निःसृत कोसी, कमला, बलान, जीवछ, तिलजुगा, गंगा आदि नदी सभक क्रीड़ा भूमि मानल जाइछ । कमला कें मिथिलांचलक गंगाक आस्पद प्राप्त छनि । ओ नदी देवीक रूपमे पूजित छथि । मैथिलीक अनेक गाथा सभ मे सूर्यक ज्योतिकें म्लान करयवाली दिव्यांगना कमलाक भूमिका सतत प्रवाहित अछि । ‘दुलरा दयाल’क गाथा नदी संस्कृतिक गाथा थिक । ‘दुलरादयाल’ मे कमलांचलक जनपदीय संस्कृति, हिमालय सँ गंगा पार धरिक व्यापारिक अभियान, कोयलावीर, तांत्रिक नृत्य, डाइन कल्ट आदिक नीक अभिव्यक्ति भेल अछि । गाथानायक दयाल सिंहक चरित प्रेमक उदारता, साहसिक अभियान, वणिक कौशल, निरभि मानिता आदिक गुण सँ गरिमा मण्डित अछि ।
नैका बनिजारा’ मैथिलीक गाथा मणि थिक । एहि मे राजा-बेपारी, डोम-चण्डाल, घांगड़-बांगड़ बेकाली डकैत आदिक चारित्रिक विशिष्टता सभक संगे पूर्वांचलक व्यापारिक मार्गक स्पष्ट निर्देश भेटैत अछि । ओहि समय नदी मार्ग द्वारा हिमालयक पाद प्रवेश सँ ताम्रलिपि धरि प्रचलित छल । अहिमे नदी मार्गीय व्यापारक राजकीय संरक्षण, जलद सँ संयुक्त आतंक, दास-दासीक कीन-बेच, बारह वर्षक दीर्घ अभियान, पारिवारिक ओझराहटि, मणि-माणिक्य ओ स्वर्ण-रत्न राशिक माध्यमे व्यापार, वणिक केन्द्र, पड़ाव, हाट-बाट-घाट आदिक संधान पाओल जाइछ । मिथिलांचलक प्रख्यात व्यापारिक संदर्भ मे नैका बनिजाराक अलावा शोभा ओ शंभु बनिजाराक मैथिली गाथा सेहो लोकप्रचलित अछि ।
मैथिली लोकसाहित्यक सर्वाधिक अहि पंचगाथा रत्नक अतिरिक्त दीना-भद्रीक गाथा मे शोषण-उत्पीड़नक विरुद्ध प्रतिकारक स्वर पहिल बेर मुखर देखना जाइछ । यैह प्रतिकार वसावनक गाथा मे सेहो उपलब्ध अछि । अहि तरहें लोकप्रचलित बखतौर, कारू, विजयमल, कारिख पंजियार, मलही सुलतान, फेकू-दयाराम, गनीनाथ-गोविन्द, रणपाल-धनपाल आदिक गाथा सभ मध्यकालीन मिथिलांचलक ऐतिहासिक अभिलेख बनल अछि ।
लोकगीत लोकसाहित्यक सर्वाधिक चर्चित विधा अछि, जकर विस्तार जन्म सँ ल’ क मृत्युधरि, पावनि-तिहार सँ ल’क धार्मिक अनुष्ठान धरि, घर आंगन सँ ल’ क खेत- खरिहान धरि एवं व्यक्तिगत अनुभूति सँ ल’ क’ सामूहिक लोकोत्सव धरि देखना जाइछ । अतः मैथिली लोकगीतक अनंत विस्तार कें अभिलेख बान्हल नहि जा सकैछ । भारतीय लोकगीत साहित्यक परिप्रेक्ष्य मे मैथिली लोकगीतक अनुशीलनसँ अनुरंजित अछि जँ कोनो भिन्नता देखना जाइछ तँ भाषा भेद, संस्कार भेद ओ भौगोलिक भेदक कारणें । आर यैह होइछ प्रत्येक जनपदक लोकगीतक विशिष्टता
। उदाहरणार्थ पर्वतांचल ओ हरितांचलक प्राकृतिक पृष्ठभूमि, भाषायी स्वरूप, गायन पद्धति, पूजा प्रक्रिया एवं सांस्कारिक विधान अवश्ये भिन्न होयत । राजस्थानक धरती मे जे उष्मा, पंजाब-हरियाणाक धरती मे जे उछाह ओ मस्ती एवं मिथिलांचल धरती मे जे सौकमार्य देखना जाइछ, ओ अन्यत्र दुर्लभ मानल जाइछ ।
मुदा मैथिली लोकगीत साहित्य सोहर ओ मंगलगीत मे जे करुणा, देवता-देवी विषयक गीतमे जे श्रद्धा ओ भक्ति, चैतीचांचर ओ मलार गीत मे जे ऋतुजन्य सौन्दर्य ओ सुषमा, गंगा-कमला ओ कोसीगीत मे जे प्रवाह, जँतसार, लगनी ओ बटगमनी गीत मे गार्हस्थ जीवनक उपराग ओ विराग, नेनागीत मे जे निश्छलता, मंत्रगीत मे जे रहस्यात्मक प्रतीक एवं समदाओन गीत मे जे करूणा अभिव्यंजित भेल अछि, ओ अनुपम अछि । मैथिली लोकगीत सभक भाषागत सौकुमार्य, नादगत सौन्दर्य ओ भावगत गरिमा विशिष्ट अछि । मिथिलांचलक सम्पूर्ण जीवन आचार ओ संस्कार मण्डित एवं प्रत्येक संस्कार गीत-नाद सँ अनुप्राणित अछि ।
मिथिला : एक परिचय,
sabhar
मिथिला : एक परिचय
मिथिला प्राचीन भारत मे एकटा साम्राज्य छल । ई पूर्वी गंगा मैदान मे अवस्थित अछि, जे आब आधा सँ अधिक बिहार और ओकरा सँ जुड़ल नेपालक भाग अछि । रामायण महाकाव्यक अनुसार मिथिला विदेह साम्राज्यक राजधानी छल । एहि शहरक पहचान नेपालक धनुषा जिला मे आजुक जनकपुर सँ कएल गेल अछि । विदेहक देश कखनो-कखनो मिथिला कहल जाईत अछि, जहन कि ई राजधानी छल । ई ठीक ओहिना अछि जेना कि कोशल साम्राज्यक राजधानी अयोध्या छल, जे कोशलक तुलना मे बेसी प्रसिद्ध भेल ।
डी. डी. कोशाम्बीक अनुसार शतपथ ब्राह्मण कहैत अछि कि माधब विदेघ पर पुजारी गोतम राहुगण शासन केलनि, जे पहिल राजा छलाह, जे सदानीरा (संभवत: गंडक ) नदी कें पार कऽ साम्राज्यक स्थापना कयलनि । एतयक लोक शतपथ ब्राहमणक संकलनक समय मे विदेहक नाम सँ जानल जाईत छलाह । गोतम राहुगण एकटा वैदिक ऋषि छलाह जे ऋग्वेदक पहिल मंडलक कतेको श्लोकक रचना कयलनि । ई श्लोक ओ अछि, जाहि मे स्व- राज्यक प्रंशसा कयल गेल अछि, जे निर्विवाद रूप सँ विदेघ राज्य छल जे ध्वनि परिवर्तनक कारण बाद मे विदेह भऽ गेल । अत: माधव विदेघ निश्चित रूप सँ बहुत पहिने भऽ चुकल छलाह । ऋग्वेदक दशम मंडल मे काशिराज प्रातर्दन द्वारा रचित श्लोकक उल्लेख अछि । अत: मिथिला आ काशी ओहि भूभाग मे अवस्थित छल, जाहि मे ऋग्वेद कालक व्यक्ति रहैत छलाह । गोतम राहुगणक परवर्ती ऋषि लोकनि गौतम कहल गेलाह । एहने एकटा सन्यासी रामायण काल मे अहिल्या स्थानक नजदीक रहैत छलाह ।
मिथिलाक गाथा कतओक शताब्दी धरि पसरल अछि । ई कहल गेल अछि जे गौतम बुद्ध आ वर्धमान महावीर दुनू गोटे मिथिला मे रहल छलाह । ई प्रथम सहस्त्राब्दिक दौरान भारतीय इतिहासक केंद्र छल आ विभिन्न साहित्यिक आ धर्मग्रंथ संबंधी काज मे अपन योगदान देलक ।
मैथिली मिथिला मे बाजय जायवला भाषा थिक । भाषाविद मैथिली कें पूर्वी भारतीय भाषा मानलनि अछि आ एहि तरहें ई हिन्दी सँ भिन्न अछि । मैथिली कें पहिने हिन्दी आ बंगला दुनूक उप-भाषा मानल जाइत छल । वस्तुत: मैथिली आब भारतीय भाषा बनि चुकल अछि ।
मिथिलाक सभ सँ महत्वपूर्ण संदर्भ हिन्दू ग्रंथ रामायण मे अछि, जतए एहि भूमिक राजकुमारी सीता कें रामक पत्नी कहल गेल अछि । राजा जनक सीताक पिता छलाह, जे मिथिला पर जनकपुर सँ शासन केलनि । प्राचीन समय मे मिथिलाक अन्य प्रसिद्ध राजा भानुमठ, सतघुमन्य, सुचि, उर्जनामा, सतध्वज, कृत, अनजान, अरिस्नामी, श्रुतयू, सुपाश्यु, सुटयशु, श्रृनजय, शौरमाबि, एनेना, भीमरथ, सत्यरथ, उपांगु, उपगुप्त, स्वागत, स्नानंद, शुसुरथ, जय-विजय, क्रितु, सनी, विथ हस्या, द्ववाति, बहुलाश्व आदि भेलाह ।
’मिथिला, एहि क्षेत्र मे सृजित हिन्दू कलाक एक प्रकारक नाम सेहो थिक । ई विशेष कऽ वियाह सँ पूर्व महिला द्वारा घर के सजेबाक लेल घरक देबार आ सतह पर धार्मिक, ज्यामितीय आ चिहनांकित आकृति सँ शुरु भेल आ एहि क्षेत्र सँ बाहर एकरा नहि जानल जाइत छल । जहन एहि कलाक लेल कागजक शुरुआत भेल तँ महिला लोकनि अपन कलाकृति कें बेचय लगलीह आ कलाक विषय वस्तु कें लोकप्रिय आ स्थानीय देवताक संगहि प्रतिदिनक घटनाक चित्रांकन धरि विस्तृत केलीह । गंगा देवी संभवत: सब सँ प्रसिद्ध मिथिलाक कलाकार छथि । ओ परंपरागत धार्मिक मिथिला चित्रांकन, लोकप्रिय देवताक चित्रांकन, रामायण आ अपन जिनगीक घटना सँ दृश्यक चित्रांकन कयलनि ।
मिथिला
वशिष्ठ द्वारा शापित मृत्यु के प्राप्त करय वला राजा निमि केँ शरीर के गंगासागर पर मथल गेल, ओहि सँ निकलल बालक के नाम मिथि पड़ल, आ हुनक राज्यक नाम मिथिला पड़ल । शतपथ ब्राह्मण केँ अनुसार राजा विदेथ माधव द्वारा गंडक किनार एक यज्ञ स्थल बनाओल गेल, जकर नाम मिथिला पड़ल आ पाछू राज्यक नाम मिथिला भेल ।
मिथिलाभी भवः मैथिल ः “मिथिला मे जन्म लेनिहार मैथिल भेलाह, वा मैथिली भाषा बाजनिहार मैथिल छथि ।
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिकी धारा,
पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत् बल विस्तारा ।
मिथिलामे २५ जिला, ५० अनुमंडल १९९९ तक लगभग छल जाहि मे वृद्धि भेल हैत, ७२,३०० किमी० क्षेत्रफल, ४४ नदी, ६ हजार पोखड़ि, अनगिनत इनार । पाल० एस० व्रास लैगुएस, रिलीजन एण्ड पोलिटिकस इन नार्थ इंडिया, पृ० ६४ मे १९६१ मे जनसंख्या १६५६५,४७७ लिखने छथि, ग्रियर्सन १८९१ मे मैथिली भाषा-भाषी केँ जनसंख्या ९,३८९,३७६ निर्धारित कयलनि, तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर पत्रांक ३ आर १-१०-१९६६, दिनांक २२-१२-७७ केँ तत्कालीन केन्द्रीय सरकार के विधिमंत्री शान्तिभूषण केँ लिखलनि जे अपना देश मे २ करोड़ सँ अधिक आ नेपाल मे ३० लाख सँ अधिक मैथिली भाषा-भाषी छथि । तैं जनसंख्या निर्धारित करब कठिन, कारण जतय सँ प्रवजन भारी मात्रा मे भेल ।
मैथिली केँ क्षति जते अपन लोक कएलक ओते दोसर नहिं । १९१४ मे भागलपुर हिन्दी साहित्य सम्मेलन मे गिरीन्द्र मोहन मिश्र प्रस्ताव देलनि जे बिहार प्रान्तक मातृभाषा हिन्दी थीक, तैं प्राथमिक शिक्षाक माध्यम हिन्दी हो, जिनका मैथिली पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो भेटलनि । राष्ट्रीय आन्दोलनक समय मे अखिल भारतीय स्तर पर भावात्मक एकता बढ़यबाक दृष्टि सँ मैथिली भाषी सब मिथिलाक्षर वा तिरहुताक्षर कें स्थान मे देवनागरी स्वीकार कयलनि । बिहार मे विनोदानंद झा, भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, विन्देश्वरी प्रसाद मंडल, सतीश प्रसाद सिंह, डा० जगन्नाथ मिश्र मैथिली भाषा-भाषी मुख्यमंत्री भेलाह, किन्तु ओ सभ संविधानक आठम सूची मे मैथिली केँ स्थान नहिं दिया सकलाह । फलतः बिहार मे एतेक संख्या रहबाक बावजूद मातृभाषा नहि मानल गेल । तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव सेहो लिखलनि कि १९९०-९१ केँ जनगणना के अनुसार बिहार मे भोजपुरी, आदिवासी, मगही भाषा- साहित्य कें छोड़ि कऽ आयोगक परीक्षा मे मैथिली ऐच्छिक भाषाक रूप मे राखब उचित नहिं आ बिहार लोक सेवा आयोग सँ मैथिली जे ऐच्छिक विषय के रूप मे छल, से हटा देल गेल । (बिहार सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभागक ज्ञापांक १३४२, दिनांक २९ फरवरी, १९९२) ।
जखन एस० के० चटर्जी ओरिजिन एण्ड डेवलपमेन्ट ऑफ बंगाली लैंग्वेज नामक पोथी मे लिखलनि “मैथिली भारत की स्वतंत्र एवं समुन्नत भाषा है ।" ज्योतिरीश्वरक १२८०-१३४० ई० मे वर्णरत्नाकर एवं मैथिली धूर्त समागम उत्तर भारतक सब आधुनिक आर्यभाषाक सर्वप्रथम ग्रन्थ एवं नाट्य कृति मानल जाइछ । महाकवि विद्यापतिक (१३५०-१४४०) रचना कालजयी साहित्यिक रचना मानल जाइछ । महर्षि अरविन्द मैथिली गीतक अनुवाद कयलनि, युनेस्को हिनक गीतक अनुवाद प्रकाशित कयलक । विश्वप्रसिद्ध कुमार स्वामी हिनक गीतक भावचित्र बनाय गीत एवं चित्रक प्रकाशन कयलनि, गौरांगस्वामीक रचना हिनका सँ प्रभावित छल, नहिं जानि कतेक भाषा मे हिनक गीतक अनुवाद भेल । दिल्ली मे मैथिली पुस्तक एवं पांडुलिपि देखि तत्कालीन प्रधान मंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू विजिटर्स बुक मे लिखलनि “MaithilI has been for a long time and is today a living language among the people of the area. The language deserves encouragement ". अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार एवं बुद्धिजीविक संस्था P.E.N. (Play Wrights, Essayists, Editors, Nanvelists) में मैथिली साहित्यकार स्थान पवैत छथि । यू०जी०सी० द्वारा कनीय एवं वरिष्ठ अनुसंधान छात्रवृत्ति मैथिली मे देल जाइछ, व्याख्याता पदक अर्हताक लेल प्रतियोगिता परीक्षा मे एकर स्थान अछि, नेपालक द्वितीय भाषा मैथिली अछि, तथापि संविधानक अष्टम सूची मे ई स्थान एकरा बहुत समय बाद भेटलैक, ई दुःखक गप ।
हम सब मैथिल जतय कतहुँ होइ, आ समस्त मैथिलक संस्था केन्द्रीयभूत भय प्रयास करत, तखनहिं सफलता भेटि सकैछ । ताहि मे पंजी-व्यवस्था एवं सभा सहायक सिद्ध हैत, जतय विचार विमर्श कय समस्याक निराकरण कयल जा सकैछ ।
मिथिलाक विभूति न्यायसूत्र प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद्, मीमांसा प्रणेता जैमिनी, सांख्य दर्शनक संस्थापक कपिल, विदेह जनक, याज्ञवल्क्य, गंगेश उपाध्याय, वाचस्पति, विद्यापति, कालिदास, लक्ष्मीनाथ गोसाइं, शिवसिंह, नान्यदेव, उदयनाचार्य, गोविन्ददास, बहुरागोढ़िन, अयाची, चंदा झा, लालदास, बच्चा झा आदि प्रभृतिक आत्मा कचोटि रहल छनि जे ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल-जनकपुर धाम, वलिराजगढ़, परसाधाम, सखड़ा (नेपाल), सौराठ, कपिलेश्वर-स्थान, उच्चैठ, विस्फी, विदेश्वर-स्थान, उगना-स्थान, डोकहर, बाल्मीकि आश्रम, कलनेश्वर-स्थान, गिरिजा-स्थान, दक्षिणेश्वर हनुमान, पुनौरा, हलेश्वर-स्थान, गोरहौल शरीफ, महिष्मती (महिषी), सिंहेश्वर-स्थान, अहिल्या-स्थान, बोधायन, विद्यापति नगर, मंगलागढ़, नौलागढ़, सिमरिया घाट एवं अन्य अनेक प्राचीन गौरवमय स्थानक दर्शन कय मैथिल गौरवान्वित भय एकरा आगू बढ़यबाक प्रयास करथि, जाहि सँ मिथिला, मैथिल, मैथिलीक विकास होय ।
भौगोलिक सीमा आ जलवायु
मिथिला क्षेत्र गंगाक उत्तरी मैदान मे अछि । एहि क्षेत्रक मुख्य स्थान दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, मधेपुरा, बेगूसराय, सहरसा, सीतामढ़ी, जनकपुर आदि अछि । जनकपुर आब नेपालक क्षेत्र मे अछि । एहि क्षेत्रक जलवायु मुख्यत: शुष्क आ ठंढ़ा अछि । गर्मी मे तापमान ३५ सँ ४५ डिग्री सेल्सियस आ जाड़ मे ५ सँ १५ डिग्री सेल्सियस रहैत अछि । एतय घुमबाक लेल फ़रवरी - मार्च आ अक्तूबर- नवंबर सब सँ नीक अछि ।
एहिठामक माँटि खेतीक लेल उपयुक्त अछि, जे क्षेत्रक मुख्य आर्थिक आधार अछि । कृषिक लेल पर्याप्त वर्षा होइत अछि ।
एहि क्षेत्र मे प्रतिवर्ष बाढ़ि अबैत अछि, जाहि सँ एहिठामक लोकक जिनगी मे कठिन समस्या अबैत अछि आ करोड़ों रुपयाक नोकसान होइत अछि । एहिठामक लोकक लेल किछु व्यक्ति द्वारा विभिन्न नदी पर बाँधक जरुरतिक अनुभव कएल गेल अछि । किछु अन्य कें एहि बातक भय सेहो छनि जे भूकंप- प्रवण क्षेत्र मे वृहत बाँध वार्षिक बाढ़ि सँ बेसी खतरनाक होयत ।
अर्थव्यवस्था
खेती एहि क्षेत्रक मुख्य आर्थिक कार्यकलाप थिक । मुख्य फ़सल धान, गहूम, दालि, मकई, मुँग, उडद, राहड़ि आदि आ जूट (एकर उत्पादन मे कमी आयल अछि) अछि । आई- काल्हि देशक आन भागक तुलना मे खेती नीक नहि रहबाक कारणें, ई सब सँ अधिक पिछड़ल क्षेत्र भऽ गेल अछि । बाढि हर वर्ष फ़सलक पैघ भाग कें नाश कऽ दैत अछि । उद्योगक अनुपस्थिति, कमजोर शैक्षिक अवसंरचना आ राजनीतिक अपराधीकरणक कारणें अधिकांश युवक कें शिक्षा आ आमदनीक लेल स्थान परिवर्तन करय पड़ैत छनि । एहि परिवर्तनक उज्जवल पक्ष इ आछे जे ओ लोकनि भारतक प्रमुख क्षेत्र और स्थान मे महत्वपूर्ण भऽ गेलाह अछि ।
मिथिला पेंटिग आब बाजार मे हिस्सेदारी प्राप्त कयलक अछि । आब सरकार सेहो राष्ट्रीय धरोहरक रूप मे एकरा सहायता दऽ रहल अछि ।
और इ अछि अपनेक कला एवं कृति भाग | अई में अहाँ के विभिन्न प्रकार के कला एवं कृति के सम्बन्ध में जानकारी भेंट'त | जेना कि क'त केहन और के जलावनरण करैल खिन या |मधुबनी चित्रकला या मिथिला चित्रकला के उत्पति पुरानकाल में भैल छेलै | मिथिला चित्रकला के परम्परा रामायण के जमाना स छै, जखैन महाराजा "जनक जी" के पुत्री "सीता जी" के ब्याह भरह'ल छेलै भगवान "राम जी" स सब चित्रकार के महाराजा "जनक" सबके धन देने छैलखिन चित्रकारी करले'ल |
मधुबनी चित्रकारी, महिलाऐं जे सब मधुबनी शहर के आस-पास के गाम् में रहे छथिन्, हुनका सबके द्धारा बनाय'ल जाऐ छै, साथ मे औरों सब मिथिला के हिस्सा मे बनाव'ल जाए छै | मिथिला चित्रकला पारम्परिक तौर पर ताजा पलस्तर करल्, झोपड़ी के किचड़ के दिवार पर, कपड़ा पर, हाथ स बनल कागज पर और किरमिच पर बनाव'ल जाई'या |
मधुबनी चित्रकारी मे दुईटा परिमाण के इस्तेमाल होइ छै, और चित्रकारी ले'ल जे रंग के उपयोग होइ छै, पेड़-पौधा स बनाय'ल जाए छै | गेरू और काजल के इस्तेमाल कत्थी और काला रंग ले'ल होए छै |
मधुबनी चित्रकला प्रकृति और हिन्दु धर्म के मुल-भाव के चित्रित करे छै और चित्र के विषय-वस्तु हिन्दु धर्म के चारू तरफ घुमेत् रहे छै - उदाहरण के तौर पर - कृष्णा, राम, शिव जी, दुर्गा माँ, लक्ष्मी जी, और स्वरस्वती माँ, प्राकृतिक वस्तु जेना सुर्य,चन्द्रमा, पुज्यनीय पौधा "तुलसी" विशाल तौर पर बनाव'ल जाए छै | आमतौर पर कोनो स्थान खाली नय रहे छै, खाली स्थान के फुल, जानवर, पंछी के चित्र से भैर दे'ल जाए छै |
पारंपरिक तौर पर, ई चित्रकला एहन हुनर छै जे पिढ़ी दर पिढ़ी परिवार के सदस्य के देल जाए छै, खास कर महिला सदस्य के, महिला सदस्य के व्दारा |आमतौर पर मधुबनी चित्र दिवार पर बनाव'ल जाए छै त्योहार मे, धार्मिक कार्य मे और बहुत महत्वपुर्ण घटना मे, जेना बच्चा के जन्म, उपान्यनम और शादी में |
अखैन के प्रसिध्द मधुबनी चित्रकला के किछ चित्रकार के नाम मे शामिल छथिन् - सरिता देवी(बौआ देवि के पुत्री), पुष्पा कुमारी, करपुरी देवी, महासुन्दरी देवी, गौदावरी दत्ता, जमुना देवी और ललिता देवी |
सीता देवी जीत्वारपुर गाँव के, बौआ देवी और गंगा देवी हिनका सबके महारथ हासिल छेलै मिथिला पेंटिंग के गाँव के दिवार स कागज और किरमिच पर उतारे के | कला एवं कृति पर लेख
ई भाग में अहां के विभिन्न और अलग-अलग स्थान के सांस्कृतिक गतिविधि के सम्बन्ध में जानकारी मिलत और केना भाग ली | इ सामुदायिक र्पोटल अग्रह करे छै सब स के अपन सांस्कृतिक गतिविधि के जानकारी बांटू |
अहां ऐतिहासिक स्थान के जानकारी हमर इतिहास खण्ड स पा सके छि |
इन्टरनेट सँ लत भेल मैथिल यूवक केँ मैथिली साहित्यँ सँ परिचय करेबाक एकटा प्रयास. विचार अछि जे एहि मैथिल यूवक मे किओ एकटा पैघ लेखक, किओ एकटा पैघ कवि, किओ व्यँगकार आ किओ एकटा पैघ वेश्लेषक छथि. मौका भेटला पर सब लोकनि अपन प्रतिभाक परिचय द’ सकैत छथि.ई वेबसाईट आधूनिक मैथिल यूवक केँ अपन मैथिली साहित्य’क दक्षता केँ साबित करबा मे सहयोग करत आ हुनका अपन रचना प्रकाशित करबा मे मदद करत.
एहेन व्यक्ति केँ ई वेबसाईट मुफ्त मे औडियेन्स प्रदान सेहो करत. यदि अपने लोकनि सोचैत छी जे अहाँ मे कोनो लेखक वा कवि छुपल अछि, तेँ अपन भावना केँ कुँठित जूनि करू. हमरा लोकनि सँ सम्पर्क करू आ अपन लेख/कविता/कहानी इत्यादि केँ एहि पर प्रकाशित करू. एहि लेल अपने लोकनि हमरा लिखू : shashank.kumar@mumbairocks.in.
मिथिला : एक परिचय
मिथिला प्राचीन भारत मे एकटा साम्राज्य छल । ई पूर्वी गंगा मैदान मे अवस्थित अछि, जे आब आधा सँ अधिक बिहार और ओकरा सँ जुड़ल नेपालक भाग अछि । रामायण महाकाव्यक अनुसार मिथिला विदेह साम्राज्यक राजधानी छल । एहि शहरक पहचान नेपालक धनुषा जिला मे आजुक जनकपुर सँ कएल गेल अछि । विदेहक देश कखनो-कखनो मिथिला कहल जाईत अछि, जहन कि ई राजधानी छल । ई ठीक ओहिना अछि जेना कि कोशल साम्राज्यक राजधानी अयोध्या छल, जे कोशलक तुलना मे बेसी प्रसिद्ध भेल ।
डी. डी. कोशाम्बीक अनुसार शतपथ ब्राह्मण कहैत अछि कि माधब विदेघ पर पुजारी गोतम राहुगण शासन केलनि, जे पहिल राजा छलाह, जे सदानीरा (संभवत: गंडक ) नदी कें पार कऽ साम्राज्यक स्थापना कयलनि । एतयक लोक शतपथ ब्राहमणक संकलनक समय मे विदेहक नाम सँ जानल जाईत छलाह । गोतम राहुगण एकटा वैदिक ऋषि छलाह जे ऋग्वेदक पहिल मंडलक कतेको श्लोकक रचना कयलनि । ई श्लोक ओ अछि, जाहि मे स्व- राज्यक प्रंशसा कयल गेल अछि, जे निर्विवाद रूप सँ विदेघ राज्य छल जे ध्वनि परिवर्तनक कारण बाद मे विदेह भऽ गेल । अत: माधव विदेघ निश्चित रूप सँ बहुत पहिने भऽ चुकल छलाह । ऋग्वेदक दशम मंडल मे काशिराज प्रातर्दन द्वारा रचित श्लोकक उल्लेख अछि । अत: मिथिला आ काशी ओहि भूभाग मे अवस्थित छल, जाहि मे ऋग्वेद कालक व्यक्ति रहैत छलाह । गोतम राहुगणक परवर्ती ऋषि लोकनि गौतम कहल गेलाह । एहने एकटा सन्यासी रामायण काल मे अहिल्या स्थानक नजदीक रहैत छलाह ।
मिथिलाक गाथा कतओक शताब्दी धरि पसरल अछि । ई कहल गेल अछि जे गौतम बुद्ध आ वर्धमान महावीर दुनू गोटे मिथिला मे रहल छलाह । ई प्रथम सहस्त्राब्दिक दौरान भारतीय इतिहासक केंद्र छल आ विभिन्न साहित्यिक आ धर्मग्रंथ संबंधी काज मे अपन योगदान देलक ।
मैथिली मिथिला मे बाजय जायवला भाषा थिक । भाषाविद मैथिली कें पूर्वी भारतीय भाषा मानलनि अछि आ एहि तरहें ई हिन्दी सँ भिन्न अछि । मैथिली कें पहिने हिन्दी आ बंगला दुनूक उप-भाषा मानल जाइत छल । वस्तुत: मैथिली आब भारतीय भाषा बनि चुकल अछि ।
मिथिलाक सभ सँ महत्वपूर्ण संदर्भ हिन्दू ग्रंथ रामायण मे अछि, जतए एहि भूमिक राजकुमारी सीता कें रामक पत्नी कहल गेल अछि । राजा जनक सीताक पिता छलाह, जे मिथिला पर जनकपुर सँ शासन केलनि । प्राचीन समय मे मिथिलाक अन्य प्रसिद्ध राजा भानुमठ, सतघुमन्य, सुचि, उर्जनामा, सतध्वज, कृत, अनजान, अरिस्नामी, श्रुतयू, सुपाश्यु, सुटयशु, श्रृनजय, शौरमाबि, एनेना, भीमरथ, सत्यरथ, उपांगु, उपगुप्त, स्वागत, स्नानंद, शुसुरथ, जय-विजय, क्रितु, सनी, विथ हस्या, द्ववाति, बहुलाश्व आदि भेलाह ।
’मिथिला, एहि क्षेत्र मे सृजित हिन्दू कलाक एक प्रकारक नाम सेहो थिक । ई विशेष कऽ वियाह सँ पूर्व महिला द्वारा घर के सजेबाक लेल घरक देबार आ सतह पर धार्मिक, ज्यामितीय आ चिहनांकित आकृति सँ शुरु भेल आ एहि क्षेत्र सँ बाहर एकरा नहि जानल जाइत छल । जहन एहि कलाक लेल कागजक शुरुआत भेल तँ महिला लोकनि अपन कलाकृति कें बेचय लगलीह आ कलाक विषय वस्तु कें लोकप्रिय आ स्थानीय देवताक संगहि प्रतिदिनक घटनाक चित्रांकन धरि विस्तृत केलीह । गंगा देवी संभवत: सब सँ प्रसिद्ध मिथिलाक कलाकार छथि । ओ परंपरागत धार्मिक मिथिला चित्रांकन, लोकप्रिय देवताक चित्रांकन, रामायण आ अपन जिनगीक घटना सँ दृश्यक चित्रांकन कयलनि ।
मिथिला
वशिष्ठ द्वारा शापित मृत्यु के प्राप्त करय वला राजा निमि केँ शरीर के गंगासागर पर मथल गेल, ओहि सँ निकलल बालक के नाम मिथि पड़ल, आ हुनक राज्यक नाम मिथिला पड़ल । शतपथ ब्राह्मण केँ अनुसार राजा विदेथ माधव द्वारा गंडक किनार एक यज्ञ स्थल बनाओल गेल, जकर नाम मिथिला पड़ल आ पाछू राज्यक नाम मिथिला भेल ।
मिथिलाभी भवः मैथिल ः “मिथिला मे जन्म लेनिहार मैथिल भेलाह, वा मैथिली भाषा बाजनिहार मैथिल छथि ।
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिकी धारा,
पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत् बल विस्तारा ।
मिथिलामे २५ जिला, ५० अनुमंडल १९९९ तक लगभग छल जाहि मे वृद्धि भेल हैत, ७२,३०० किमी० क्षेत्रफल, ४४ नदी, ६ हजार पोखड़ि, अनगिनत इनार । पाल० एस० व्रास लैगुएस, रिलीजन एण्ड पोलिटिकस इन नार्थ इंडिया, पृ० ६४ मे १९६१ मे जनसंख्या १६५६५,४७७ लिखने छथि, ग्रियर्सन १८९१ मे मैथिली भाषा-भाषी केँ जनसंख्या ९,३८९,३७६ निर्धारित कयलनि, तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर पत्रांक ३ आर १-१०-१९६६, दिनांक २२-१२-७७ केँ तत्कालीन केन्द्रीय सरकार के विधिमंत्री शान्तिभूषण केँ लिखलनि जे अपना देश मे २ करोड़ सँ अधिक आ नेपाल मे ३० लाख सँ अधिक मैथिली भाषा-भाषी छथि । तैं जनसंख्या निर्धारित करब कठिन, कारण जतय सँ प्रवजन भारी मात्रा मे भेल ।
मैथिली केँ क्षति जते अपन लोक कएलक ओते दोसर नहिं । १९१४ मे भागलपुर हिन्दी साहित्य सम्मेलन मे गिरीन्द्र मोहन मिश्र प्रस्ताव देलनि जे बिहार प्रान्तक मातृभाषा हिन्दी थीक, तैं प्राथमिक शिक्षाक माध्यम हिन्दी हो, जिनका मैथिली पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो भेटलनि । राष्ट्रीय आन्दोलनक समय मे अखिल भारतीय स्तर पर भावात्मक एकता बढ़यबाक दृष्टि सँ मैथिली भाषी सब मिथिलाक्षर वा तिरहुताक्षर कें स्थान मे देवनागरी स्वीकार कयलनि । बिहार मे विनोदानंद झा, भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, विन्देश्वरी प्रसाद मंडल, सतीश प्रसाद सिंह, डा० जगन्नाथ मिश्र मैथिली भाषा-भाषी मुख्यमंत्री भेलाह, किन्तु ओ सभ संविधानक आठम सूची मे मैथिली केँ स्थान नहिं दिया सकलाह । फलतः बिहार मे एतेक संख्या रहबाक बावजूद मातृभाषा नहि मानल गेल । तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव सेहो लिखलनि कि १९९०-९१ केँ जनगणना के अनुसार बिहार मे भोजपुरी, आदिवासी, मगही भाषा- साहित्य कें छोड़ि कऽ आयोगक परीक्षा मे मैथिली ऐच्छिक भाषाक रूप मे राखब उचित नहिं आ बिहार लोक सेवा आयोग सँ मैथिली जे ऐच्छिक विषय के रूप मे छल, से हटा देल गेल । (बिहार सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभागक ज्ञापांक १३४२, दिनांक २९ फरवरी, १९९२) ।
जखन एस० के० चटर्जी ओरिजिन एण्ड डेवलपमेन्ट ऑफ बंगाली लैंग्वेज नामक पोथी मे लिखलनि “मैथिली भारत की स्वतंत्र एवं समुन्नत भाषा है ।" ज्योतिरीश्वरक १२८०-१३४० ई० मे वर्णरत्नाकर एवं मैथिली धूर्त समागम उत्तर भारतक सब आधुनिक आर्यभाषाक सर्वप्रथम ग्रन्थ एवं नाट्य कृति मानल जाइछ । महाकवि विद्यापतिक (१३५०-१४४०) रचना कालजयी साहित्यिक रचना मानल जाइछ । महर्षि अरविन्द मैथिली गीतक अनुवाद कयलनि, युनेस्को हिनक गीतक अनुवाद प्रकाशित कयलक । विश्वप्रसिद्ध कुमार स्वामी हिनक गीतक भावचित्र बनाय गीत एवं चित्रक प्रकाशन कयलनि, गौरांगस्वामीक रचना हिनका सँ प्रभावित छल, नहिं जानि कतेक भाषा मे हिनक गीतक अनुवाद भेल । दिल्ली मे मैथिली पुस्तक एवं पांडुलिपि देखि तत्कालीन प्रधान मंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू विजिटर्स बुक मे लिखलनि “MaithilI has been for a long time and is today a living language among the people of the area. The language deserves encouragement ". अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार एवं बुद्धिजीविक संस्था P.E.N. (Play Wrights, Essayists, Editors, Nanvelists) में मैथिली साहित्यकार स्थान पवैत छथि । यू०जी०सी० द्वारा कनीय एवं वरिष्ठ अनुसंधान छात्रवृत्ति मैथिली मे देल जाइछ, व्याख्याता पदक अर्हताक लेल प्रतियोगिता परीक्षा मे एकर स्थान अछि, नेपालक द्वितीय भाषा मैथिली अछि, तथापि संविधानक अष्टम सूची मे ई स्थान एकरा बहुत समय बाद भेटलैक, ई दुःखक गप ।
हम सब मैथिल जतय कतहुँ होइ, आ समस्त मैथिलक संस्था केन्द्रीयभूत भय प्रयास करत, तखनहिं सफलता भेटि सकैछ । ताहि मे पंजी-व्यवस्था एवं सभा सहायक सिद्ध हैत, जतय विचार विमर्श कय समस्याक निराकरण कयल जा सकैछ ।
मिथिलाक विभूति न्यायसूत्र प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद्, मीमांसा प्रणेता जैमिनी, सांख्य दर्शनक संस्थापक कपिल, विदेह जनक, याज्ञवल्क्य, गंगेश उपाध्याय, वाचस्पति, विद्यापति, कालिदास, लक्ष्मीनाथ गोसाइं, शिवसिंह, नान्यदेव, उदयनाचार्य, गोविन्ददास, बहुरागोढ़िन, अयाची, चंदा झा, लालदास, बच्चा झा आदि प्रभृतिक आत्मा कचोटि रहल छनि जे ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल-जनकपुर धाम, वलिराजगढ़, परसाधाम, सखड़ा (नेपाल), सौराठ, कपिलेश्वर-स्थान, उच्चैठ, विस्फी, विदेश्वर-स्थान, उगना-स्थान, डोकहर, बाल्मीकि आश्रम, कलनेश्वर-स्थान, गिरिजा-स्थान, दक्षिणेश्वर हनुमान, पुनौरा, हलेश्वर-स्थान, गोरहौल शरीफ, महिष्मती (महिषी), सिंहेश्वर-स्थान, अहिल्या-स्थान, बोधायन, विद्यापति नगर, मंगलागढ़, नौलागढ़, सिमरिया घाट एवं अन्य अनेक प्राचीन गौरवमय स्थानक दर्शन कय मैथिल गौरवान्वित भय एकरा आगू बढ़यबाक प्रयास करथि, जाहि सँ मिथिला, मैथिल, मैथिलीक विकास होय ।
भौगोलिक सीमा आ जलवायु
मिथिला क्षेत्र गंगाक उत्तरी मैदान मे अछि । एहि क्षेत्रक मुख्य स्थान दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, मधेपुरा, बेगूसराय, सहरसा, सीतामढ़ी, जनकपुर आदि अछि । जनकपुर आब नेपालक क्षेत्र मे अछि । एहि क्षेत्रक जलवायु मुख्यत: शुष्क आ ठंढ़ा अछि । गर्मी मे तापमान ३५ सँ ४५ डिग्री सेल्सियस आ जाड़ मे ५ सँ १५ डिग्री सेल्सियस रहैत अछि । एतय घुमबाक लेल फ़रवरी - मार्च आ अक्तूबर- नवंबर सब सँ नीक अछि ।
एहिठामक माँटि खेतीक लेल उपयुक्त अछि, जे क्षेत्रक मुख्य आर्थिक आधार अछि । कृषिक लेल पर्याप्त वर्षा होइत अछि ।
एहि क्षेत्र मे प्रतिवर्ष बाढ़ि अबैत अछि, जाहि सँ एहिठामक लोकक जिनगी मे कठिन समस्या अबैत अछि आ करोड़ों रुपयाक नोकसान होइत अछि । एहिठामक लोकक लेल किछु व्यक्ति द्वारा विभिन्न नदी पर बाँधक जरुरतिक अनुभव कएल गेल अछि । किछु अन्य कें एहि बातक भय सेहो छनि जे भूकंप- प्रवण क्षेत्र मे वृहत बाँध वार्षिक बाढ़ि सँ बेसी खतरनाक होयत ।
अर्थव्यवस्था
खेती एहि क्षेत्रक मुख्य आर्थिक कार्यकलाप थिक । मुख्य फ़सल धान, गहूम, दालि, मकई, मुँग, उडद, राहड़ि आदि आ जूट (एकर उत्पादन मे कमी आयल अछि) अछि । आई- काल्हि देशक आन भागक तुलना मे खेती नीक नहि रहबाक कारणें, ई सब सँ अधिक पिछड़ल क्षेत्र भऽ गेल अछि । बाढि हर वर्ष फ़सलक पैघ भाग कें नाश कऽ दैत अछि । उद्योगक अनुपस्थिति, कमजोर शैक्षिक अवसंरचना आ राजनीतिक अपराधीकरणक कारणें अधिकांश युवक कें शिक्षा आ आमदनीक लेल स्थान परिवर्तन करय पड़ैत छनि । एहि परिवर्तनक उज्जवल पक्ष इ आछे जे ओ लोकनि भारतक प्रमुख क्षेत्र और स्थान मे महत्वपूर्ण भऽ गेलाह अछि ।
मिथिला पेंटिग आब बाजार मे हिस्सेदारी प्राप्त कयलक अछि । आब सरकार सेहो राष्ट्रीय धरोहरक रूप मे एकरा सहायता दऽ रहल अछि ।
और इ अछि अपनेक कला एवं कृति भाग | अई में अहाँ के विभिन्न प्रकार के कला एवं कृति के सम्बन्ध में जानकारी भेंट'त | जेना कि क'त केहन और के जलावनरण करैल खिन या |मधुबनी चित्रकला या मिथिला चित्रकला के उत्पति पुरानकाल में भैल छेलै | मिथिला चित्रकला के परम्परा रामायण के जमाना स छै, जखैन महाराजा "जनक जी" के पुत्री "सीता जी" के ब्याह भरह'ल छेलै भगवान "राम जी" स सब चित्रकार के महाराजा "जनक" सबके धन देने छैलखिन चित्रकारी करले'ल |
मधुबनी चित्रकारी, महिलाऐं जे सब मधुबनी शहर के आस-पास के गाम् में रहे छथिन्, हुनका सबके द्धारा बनाय'ल जाऐ छै, साथ मे औरों सब मिथिला के हिस्सा मे बनाव'ल जाए छै | मिथिला चित्रकला पारम्परिक तौर पर ताजा पलस्तर करल्, झोपड़ी के किचड़ के दिवार पर, कपड़ा पर, हाथ स बनल कागज पर और किरमिच पर बनाव'ल जाई'या |
मधुबनी चित्रकारी मे दुईटा परिमाण के इस्तेमाल होइ छै, और चित्रकारी ले'ल जे रंग के उपयोग होइ छै, पेड़-पौधा स बनाय'ल जाए छै | गेरू और काजल के इस्तेमाल कत्थी और काला रंग ले'ल होए छै |
मधुबनी चित्रकला प्रकृति और हिन्दु धर्म के मुल-भाव के चित्रित करे छै और चित्र के विषय-वस्तु हिन्दु धर्म के चारू तरफ घुमेत् रहे छै - उदाहरण के तौर पर - कृष्णा, राम, शिव जी, दुर्गा माँ, लक्ष्मी जी, और स्वरस्वती माँ, प्राकृतिक वस्तु जेना सुर्य,चन्द्रमा, पुज्यनीय पौधा "तुलसी" विशाल तौर पर बनाव'ल जाए छै | आमतौर पर कोनो स्थान खाली नय रहे छै, खाली स्थान के फुल, जानवर, पंछी के चित्र से भैर दे'ल जाए छै |
पारंपरिक तौर पर, ई चित्रकला एहन हुनर छै जे पिढ़ी दर पिढ़ी परिवार के सदस्य के देल जाए छै, खास कर महिला सदस्य के, महिला सदस्य के व्दारा |आमतौर पर मधुबनी चित्र दिवार पर बनाव'ल जाए छै त्योहार मे, धार्मिक कार्य मे और बहुत महत्वपुर्ण घटना मे, जेना बच्चा के जन्म, उपान्यनम और शादी में |
अखैन के प्रसिध्द मधुबनी चित्रकला के किछ चित्रकार के नाम मे शामिल छथिन् - सरिता देवी(बौआ देवि के पुत्री), पुष्पा कुमारी, करपुरी देवी, महासुन्दरी देवी, गौदावरी दत्ता, जमुना देवी और ललिता देवी |
सीता देवी जीत्वारपुर गाँव के, बौआ देवी और गंगा देवी हिनका सबके महारथ हासिल छेलै मिथिला पेंटिंग के गाँव के दिवार स कागज और किरमिच पर उतारे के | कला एवं कृति पर लेख
ई भाग में अहां के विभिन्न और अलग-अलग स्थान के सांस्कृतिक गतिविधि के सम्बन्ध में जानकारी मिलत और केना भाग ली | इ सामुदायिक र्पोटल अग्रह करे छै सब स के अपन सांस्कृतिक गतिविधि के जानकारी बांटू |
अहां ऐतिहासिक स्थान के जानकारी हमर इतिहास खण्ड स पा सके छि |
इन्टरनेट सँ लत भेल मैथिल यूवक केँ मैथिली साहित्यँ सँ परिचय करेबाक एकटा प्रयास. विचार अछि जे एहि मैथिल यूवक मे किओ एकटा पैघ लेखक, किओ एकटा पैघ कवि, किओ व्यँगकार आ किओ एकटा पैघ वेश्लेषक छथि. मौका भेटला पर सब लोकनि अपन प्रतिभाक परिचय द’ सकैत छथि.ई वेबसाईट आधूनिक मैथिल यूवक केँ अपन मैथिली साहित्य’क दक्षता केँ साबित करबा मे सहयोग करत आ हुनका अपन रचना प्रकाशित करबा मे मदद करत.
एहेन व्यक्ति केँ ई वेबसाईट मुफ्त मे औडियेन्स प्रदान सेहो करत. यदि अपने लोकनि सोचैत छी जे अहाँ मे कोनो लेखक वा कवि छुपल अछि, तेँ अपन भावना केँ कुँठित जूनि करू. हमरा लोकनि सँ सम्पर्क करू आ अपन लेख/कविता/कहानी इत्यादि केँ एहि पर प्रकाशित करू. एहि लेल अपने लोकनि हमरा लिखू : shashank.kumar@mumbairocks.in.
Sunday, May 22, 2011
lagukatha, jitmohan jha,
maithili aaur mithila
एक आदमीक घर एक सन्यासी पाहुन बनि कs एलखिन। रातिमे गपशपक बीच ओऽ संन्यासी आदमीसँ कहलखिन की अहाँ एहि ठाम ई छोट-मोट खेतीमे की लागल छी ! साइबेरियामे किछु दिन पहिने हम यात्रा पर रही, ओइ ठाम जमीन एतेक सस्ता अछि मानू अहाँकेँ मँगनीम्वे भेट जाएत! अहाँ अपन ई जमींन बेचि कऽ साइबेरिया चलि जाऊ ! ओहिठाम हजारो एकड़ जमीन भेट जाएत एतबे जमीनमे ! ओइ ठामक जमीन बड उपजाऊ छइ, आर ओइ ठामक लोक एतेक सीधा-साधा की करीब-करीब जमींन मुफ्तेमे दऽ देत! ओइ आदमीकेँ वासना जगलनि! ओऽ दोसरे दिन अपन सभ जमीन बेचि कऽ साइबेरिया चलि देलथि! जखन ओऽ साइबेरिया पहुँचला तँ सन्यासीक गप हुनका सत्य लगलनि! ओ ओइ ठामक आदमीसँ पुछलखिन की हम जमीन कीनय लय चाहए छी ! तँ हुनका जबाब भेटलनि, जमीन कीनए हेतु अहाँ जतेक पाइ अनलहुँ यऽ ओकरा राखि दियौ ; आर जीवनक हमरा लग खाली इएह उपाय अछि की जमीन बेचि दी! काल्हि भोर सूरज उगइ पर अहाँ निकलब आर साँझ सूरज अस्त होएबा धरि जतेक जमीन अहाँ घेर सकी घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत!
बस चलैत रहब .........साँझ सूरज डूबए तक जतेक जमीन अहाँ घेर सकब घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत! बस शर्त ई अछि की जतएसँ अहाँ चलब शुरू करब साँझ सूरज डूबएसँ पहिने अहाँकेँ ओही ठाम वापस आबए पड़त !
ओऽ आदमी राति भरि सूति नञि सकलाह, सत्य पुछू तँ यदि हुनका जगह पर अहूँ रहितहुँ तँ ओहिना होइतए; एहेन क्षणमे कियो सुति सकैत छथि? ओऽ आदमी राति भरि योजना बनाबैत रहलाह की कोन तरहसँ कतेक जमीन घेरल जाय! भोर होइते पूरा गामक लोक जमा भऽ गेलखिन। जहिना सूरज उगलथि ओऽ आदमी चलब शुरू केलाह ! चलएसँ पहिने ओऽ रोटी आर पानि सभ संगमे लऽ लेलथि रहए ! रास्तामे भूख प्यास लागै पर सोचने रहथि चलिते-चलिते भोजनो कऽ लेताह! हुनकर खाली इएह सोचब रहनि की कुनू भी स्थितिमे रुकनाइ नञि छइ ! चलैत-चलैत आब ओऽ दौड़ब शुरू कऽ देलखिन सोचलथि बेसी जमीन घेर लेब ! ओऽ दौगैत रहलाह, सोचने रहथि ठीक बारह बजे घुरि जाएब , ताकि सूरज डूबैत-डूबैत वापस पहुँचि सकी ! बारह बाजि गेलनि, ओऽ मीलो चलि चुकलथि रहए, मुदा वासनाक कोनो अंत छइ ? ओऽ सोचऽ लगलाह, बारह तँ बाजि गेलए आब लौटबाक चाही ; मुदा सोझाँ बला जमीन बड़ उपजाऊ छइ कनी ओकरो घेर ली! लौटेत समय कनी तेजीँ स दौगए पड़त आर की एके दिनक तँ बात छइ तेजीसँ दौग लेब !
दौड़ए के चक्करमे ओऽ भूख-प्यास सभ बिसरए देलखिन, नञि ओऽ किछु खेलथि नञि पिलथि बस दौगेत रहलाह! रास्तामे ओऽ रोटी पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौगैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरऽ के मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर-सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटएक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलन्हि! हुनका डर सताबए लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सभ ताकति वापस दौगएमे लगा देलथि ; लेकिन तागति ख़तम होइक करीब रहनि ! सुबहेसँ दौगैत-दौगैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबऽ लगलाह की सूरज डूबए धरि घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौगएमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरीयो आब नञि बचलनि, ग्रामीण सभकेँ ओऽ देखऽ लगलाह ! सभ गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि, एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौगैत छथि! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह, तैयो दम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाइ छनि, किछ दूरी बाँकी देखि ओऽ घुसकैत- घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! सूरजक अन्तिम किरण विलिप्त होइसँ पहिने हुनकर हाथ ओहि जमीन पर पड़ि गेलनि जतएसँ ओऽ दौगब शुरू केलथि रहए ! एक तरफ सूरज डूबल दोसर तरफ हुनकर अंतिम साँस सेहो हुनकर साथ छोड़ि देलकनि। ओऽ मरि गेलाह, बहुत मेहनति केलखिन रहए ! शायद ह्रदयक दौरा पड़ि गेलनि ! ओइ ठाम जमा गामक सब सोझ-साझ कहाबए बला ओऽ दौगएक चक्करमे भूख-प्यास सभ बिसारि देलखिन नञि ओऽ किछ खेलथि नञि पिलथि बस दौगैत रहलाह ! रास्तामे ओऽ रोटी-पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौड़ैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरबाक मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर - सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटेबाक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलाह ! हुनका डर लागऽ लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सब ताकति वापस दौड़एमे लगाऽ देलथि ; लेकिन ताकत ख़त्म हेबाक करीब रहनि ! भोरेसँ दौड़ैत - दौड़ैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबए लगलाह की सूरज डूबए तक घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौड़ैमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरियो आब नञि बचलनि। ग्रामीण सबकेँ ओऽ देखए लगलाह ! सब गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि, की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि। एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौड़ैतत छथि ! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह तैयोदम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाए छनि। किछु दुरी बाँकी देख ओऽ घुसकैत-घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! हँसैत-हँसैत आपसमे बात करऽ लगलाह की अइ तरहक पागल आदमी आबिते जाइत रहैत छथि !ई कुनू नव घटना थोड़े अछि ! अक्सर लोग खबर सुनला पर आबैत रहथि आर अहिना मरैत रहथि ! ई कुनू अपवाद नञि, नियम रहए ओहि सब जमींदारक ! कियो ऐहन नञि भेलाह जे ओऽ जमीनकेँ घेरि कऽ ओकर मालिक बनलाह ! ई (लघु कथा) खाली कहानी मात्र न्ञि अछि ! ई घटना हमर, अहाँ आर सम्पूर्ण संसारक कहानी छी। हमर सभक जीवनक कहानी छी ! हुनके जेकाँ आइ हम सभ कऽ रहलहुँ-ए! हुनके जेकाँ जमीन घेरए के पाछाँ दौगि रहलहुँ-ए की कतेक जमीन घेर ली ! बारह बाजए-ए , दुफरिया होइ-ए, घुरए धरि समय भेलाक बाबजूद कनी आरक चक्करमे हम सब दौगि रहल छी ! ओकरा पाछाँ भूख प्यास सब बिसारि दए छी ! सत्य पुछू तँ हमरा अहाँक लग जीबए लेल समय नञि अछि ! हमसब चाहतक पीछाँ भागि रहलहुँ-ए! कहियो हमसब संतुष्ट नञि भऽ रहलहुँ-ए, हुनके जेकाँ हमर अहाँक सोच अछि, एहिसब चक्करमे गरीब - धनिक सब भूखे मरि रहलहुँ-ए कियो अपन जीनन जी नञि पबैत छ्थि ! जीबए हेतु कनी विश्रान्ति चाही ! जीबए लेल कनी समय चाही, जीवन मँगनी भेटए-ए बस ज्ञान भेनाय जरुरी अछि !!
एक आदमीक घर एक सन्यासी पाहुन बनि कs एलखिन। रातिमे गपशपक बीच ओऽ संन्यासी आदमीसँ कहलखिन की अहाँ एहि ठाम ई छोट-मोट खेतीमे की लागल छी ! साइबेरियामे किछु दिन पहिने हम यात्रा पर रही, ओइ ठाम जमीन एतेक सस्ता अछि मानू अहाँकेँ मँगनीम्वे भेट जाएत! अहाँ अपन ई जमींन बेचि कऽ साइबेरिया चलि जाऊ ! ओहिठाम हजारो एकड़ जमीन भेट जाएत एतबे जमीनमे ! ओइ ठामक जमीन बड उपजाऊ छइ, आर ओइ ठामक लोक एतेक सीधा-साधा की करीब-करीब जमींन मुफ्तेमे दऽ देत! ओइ आदमीकेँ वासना जगलनि! ओऽ दोसरे दिन अपन सभ जमीन बेचि कऽ साइबेरिया चलि देलथि! जखन ओऽ साइबेरिया पहुँचला तँ सन्यासीक गप हुनका सत्य लगलनि! ओ ओइ ठामक आदमीसँ पुछलखिन की हम जमीन कीनय लय चाहए छी ! तँ हुनका जबाब भेटलनि, जमीन कीनए हेतु अहाँ जतेक पाइ अनलहुँ यऽ ओकरा राखि दियौ ; आर जीवनक हमरा लग खाली इएह उपाय अछि की जमीन बेचि दी! काल्हि भोर सूरज उगइ पर अहाँ निकलब आर साँझ सूरज अस्त होएबा धरि जतेक जमीन अहाँ घेर सकी घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत!
बस चलैत रहब .........साँझ सूरज डूबए तक जतेक जमीन अहाँ घेर सकब घेर लेब ओऽ अहाँक भऽ जाएत! बस शर्त ई अछि की जतएसँ अहाँ चलब शुरू करब साँझ सूरज डूबएसँ पहिने अहाँकेँ ओही ठाम वापस आबए पड़त !
ओऽ आदमी राति भरि सूति नञि सकलाह, सत्य पुछू तँ यदि हुनका जगह पर अहूँ रहितहुँ तँ ओहिना होइतए; एहेन क्षणमे कियो सुति सकैत छथि? ओऽ आदमी राति भरि योजना बनाबैत रहलाह की कोन तरहसँ कतेक जमीन घेरल जाय! भोर होइते पूरा गामक लोक जमा भऽ गेलखिन। जहिना सूरज उगलथि ओऽ आदमी चलब शुरू केलाह ! चलएसँ पहिने ओऽ रोटी आर पानि सभ संगमे लऽ लेलथि रहए ! रास्तामे भूख प्यास लागै पर सोचने रहथि चलिते-चलिते भोजनो कऽ लेताह! हुनकर खाली इएह सोचब रहनि की कुनू भी स्थितिमे रुकनाइ नञि छइ ! चलैत-चलैत आब ओऽ दौड़ब शुरू कऽ देलखिन सोचलथि बेसी जमीन घेर लेब ! ओऽ दौगैत रहलाह, सोचने रहथि ठीक बारह बजे घुरि जाएब , ताकि सूरज डूबैत-डूबैत वापस पहुँचि सकी ! बारह बाजि गेलनि, ओऽ मीलो चलि चुकलथि रहए, मुदा वासनाक कोनो अंत छइ ? ओऽ सोचऽ लगलाह, बारह तँ बाजि गेलए आब लौटबाक चाही ; मुदा सोझाँ बला जमीन बड़ उपजाऊ छइ कनी ओकरो घेर ली! लौटेत समय कनी तेजीँ स दौगए पड़त आर की एके दिनक तँ बात छइ तेजीसँ दौग लेब !
दौड़ए के चक्करमे ओऽ भूख-प्यास सभ बिसरए देलखिन, नञि ओऽ किछु खेलथि नञि पिलथि बस दौगेत रहलाह! रास्तामे ओऽ रोटी पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौगैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरऽ के मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर-सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटएक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलन्हि! हुनका डर सताबए लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सभ ताकति वापस दौगएमे लगा देलथि ; लेकिन तागति ख़तम होइक करीब रहनि ! सुबहेसँ दौगैत-दौगैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबऽ लगलाह की सूरज डूबए धरि घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौगएमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरीयो आब नञि बचलनि, ग्रामीण सभकेँ ओऽ देखऽ लगलाह ! सभ गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि, एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौगैत छथि! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह, तैयो दम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाइ छनि, किछ दूरी बाँकी देखि ओऽ घुसकैत- घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! सूरजक अन्तिम किरण विलिप्त होइसँ पहिने हुनकर हाथ ओहि जमीन पर पड़ि गेलनि जतएसँ ओऽ दौगब शुरू केलथि रहए ! एक तरफ सूरज डूबल दोसर तरफ हुनकर अंतिम साँस सेहो हुनकर साथ छोड़ि देलकनि। ओऽ मरि गेलाह, बहुत मेहनति केलखिन रहए ! शायद ह्रदयक दौरा पड़ि गेलनि ! ओइ ठाम जमा गामक सब सोझ-साझ कहाबए बला ओऽ दौगएक चक्करमे भूख-प्यास सभ बिसारि देलखिन नञि ओऽ किछ खेलथि नञि पिलथि बस दौगैत रहलाह ! रास्तामे ओऽ रोटी-पानि सभ फेक देलखिन ! बस लगातार दौड़ैत रहलाह। एक बाजि गेलनि मुदा हुनका घुरबाक मोन नञि होइत रहनि, किएकी आगाँक जमीन आर सुन्दर - सुन्दर रहए ! मुदा आब ओऽ लौटेबाक प्लान बनेलथि; दु बजे ओऽ लौटब शुरू केलाह ! हुनका डर लागऽ लगलनि की घुरि सकब की नञि ! ओऽ अपन सब ताकति वापस दौड़एमे लगाऽ देलथि ; लेकिन ताकत ख़त्म हेबाक करीब रहनि ! भोरेसँ दौड़ैत - दौड़ैत हाँफऽ लगलाह, ओऽ घबराबए लगलाह की सूरज डूबए तक घुरि सकब की नञि ! दुबारा अपन सम्पूर्ण तागति दौड़ैमे लगाऽ देलथि मुदा आब सुरजो डूबए लगलाह .......! बेशी दूरियो आब नञि बचलनि। ग्रामीण सबकेँ ओऽ देखए लगलाह ! सब गामक लोक हुनका आवाज़ पर आवाज़ दैत रहनि, सब हुनका उत्साहित करैत रहथिन आबि जाऊ ......आबि जाऊ। ओऽ आदमी सोचए लगलथि, की अजीब आदमी एहिठामक छथि ! ओऽ अपन अंतिम दम लगाऽ देलथि। एम्हर सूरज डूबैत छथि आर ओम्हर ओ दौड़ैतत छथि ! सूरज डूबैत - डूबैत पाँच - सात गज पहिने ओऽ खसि पड़लाह तैयोदम नञि तोड़लथि। आब हुनकासँ उठल नञि जाए छनि। किछु दुरी बाँकी देख ओऽ घुसकैत-घुसकैत पहुँचए के प्रयास करए लगलाह! हँसैत-हँसैत आपसमे बात करऽ लगलाह की अइ तरहक पागल आदमी आबिते जाइत रहैत छथि !ई कुनू नव घटना थोड़े अछि ! अक्सर लोग खबर सुनला पर आबैत रहथि आर अहिना मरैत रहथि ! ई कुनू अपवाद नञि, नियम रहए ओहि सब जमींदारक ! कियो ऐहन नञि भेलाह जे ओऽ जमीनकेँ घेरि कऽ ओकर मालिक बनलाह ! ई (लघु कथा) खाली कहानी मात्र न्ञि अछि ! ई घटना हमर, अहाँ आर सम्पूर्ण संसारक कहानी छी। हमर सभक जीवनक कहानी छी ! हुनके जेकाँ आइ हम सभ कऽ रहलहुँ-ए! हुनके जेकाँ जमीन घेरए के पाछाँ दौगि रहलहुँ-ए की कतेक जमीन घेर ली ! बारह बाजए-ए , दुफरिया होइ-ए, घुरए धरि समय भेलाक बाबजूद कनी आरक चक्करमे हम सब दौगि रहल छी ! ओकरा पाछाँ भूख प्यास सब बिसारि दए छी ! सत्य पुछू तँ हमरा अहाँक लग जीबए लेल समय नञि अछि ! हमसब चाहतक पीछाँ भागि रहलहुँ-ए! कहियो हमसब संतुष्ट नञि भऽ रहलहुँ-ए, हुनके जेकाँ हमर अहाँक सोच अछि, एहिसब चक्करमे गरीब - धनिक सब भूखे मरि रहलहुँ-ए कियो अपन जीनन जी नञि पबैत छ्थि ! जीबए हेतु कनी विश्रान्ति चाही ! जीबए लेल कनी समय चाही, जीवन मँगनी भेटए-ए बस ज्ञान भेनाय जरुरी अछि !!
Saturday, May 21, 2011
कैदीहरू दोहोरो दुःख खेप्न बाध्य jaleshwor
कैदीहरू दोहोरो दुःख खेप्न बाध्य
कमलेश मण्डल–महोत्तरी ६ जेठ/परिबन्धमा परेर जेल जीवन बिताउनु परेको पीडा भोगिरहेका जलेश्वर कारागारका कैदीहरू वर्षा र हुरीबतासका कारण दोहोरो दुःख भोग्न बाध्य भएका छन् । वर्षासँगै आएको हावाहुरीका कारण महिला र पुरूष बन्दी तर्फको छतको कर्कट पत्ता (टिनको छाना) उडाएपछि खुलाआकाश मुनि बस्न बाध्य भएपछि कैदीहरू थप संकटमा परी दोहोरो दुःख भोग्न बाध्य भएका छन् । महिला बन्दी तर्फ दोस्रो तल्ला र पुरूष तर्फको तेस्रो तल्लाको टिनको छाना हावाहुरीले उडाएपछि विगत दुई साता देखि खुला आकाश मुनि सुत्न, बस्न, खाना पकाउन उनीहरू बाध्य भएको जेल प्रशासनले जनाएको छ । कर्कट पत्ता उडाउनाले दिन भरी तातो घाममा र रातको चीसोका कारण कैदीहरू विरामी पर्न थालेका छन् । कैदीहरू पालो पालो गरेर खाना बनाउन गरेका छन् । छानो उडाएपछि चर्काे घामका कारण बसिन नसक्नु भएको ज्यानमार्ने मुद्दा अन्तर्गत मुद्दा खेपीरहेका धनुषा रजौलका सुरेन्द्र मुखियाले गुनासो पोखे । सरकारले र जेल प्रशासनले ध्यान नदिँदा छाना छाएको छैन दुखेसो पोखदै अर्को कैदी ललन महतो भन्छन कैदीहरूलाई जहाँ पनि हेला भएको छ । छाना मर्मत तत्काल जेल प्रशासनले गर्नु पर्ने उनले भने । विगत दुई साता देखि पटक पटक आउने हावाहुरी सँगै वर्षाकाकारण कैदीहरूको ओढ्ने ओछयाउने लुगा पनि भिजेको उनीहरू बताउ“छन् । मर्मत अभावमा जीर्ण भवनको छतको छाना पनि उडाएका कारण वर्षा भएपछि पुरूष र महिला बन्दी गृहमा ओत लाग्न ठाउँ समेत छैन । ओढने ओछयाउने समेत भिजने गरेको घाम, चिसो र अनिदोले प्रायः कैदीहरू विरामी समेत पर्न थालेका छन् । कानुन र प्रकृतिको दोहोरो पीडामा परेका हाम्रो उद्धारका लागि सरकार कहाँ छ र ? कैदीहरू प्रश्न गर्छन् । हावाहुरी पानी आएपछि उडाउन लागेको छाप्रो स्याहार्नु कि नानीहरू स्याहार्नु दुबै समस्या यहाँका महिला बन्दीहरूको रहेको कुरा कर्तव्य ज्यान मुद्दामा कैद भुक्तान गरिरहेका राजविराजकी सरोजी सिंह भन्छन् । कैदी भएकै कारण न्यूनतम आवश्यकता तर्फ समेत कारागार प्रशासनले ध्यान नदिएकाले त्यस्तो आवश्यकता आएको हो उनी भन्छन् ।आफ्नो छाना र भ्mयालको हविगत बताउँदै अर्का महिला बन्दी उषा झा भन्छन् छाना भ्mयाल मर्मत गर्न तत्काल जलेश्वर प्रशासनसँग माग गर्नु भयो । राणा कालमै बनेको नेपालकै पुरानो मध्ये जलेश्वर कारागार भित्र जम्मा ३ सय ४२ जना बन्दी रहेको मा २८ महिला र आश्रित ९ जना बालबालिका रहेको छ । १ सय ३५ कैदी क्षमता राख्ने प्राचिन जेल जीर्णशीर्ण अवस्थामा रहेको र जुनसुकै बेला भत्कने संभावना समेत रहेको छ । अभिभावकका कारण जेल जीवन विताउँदै आएका ९ बालबालिका पढनबाट समेत बन्चित भएका छन् । कर्कट पत्ता छाउन तथा जेल मर्मत सम्भारका लागि कारागार व्यवस्था विभाग केन्द्रीय कार्यालयमा पटकपटक बजेट माग गर्दा पनि कुनै सुनवाई हुन नभएको जलेश्वर कारागारका जेलर डा.सोमेन्द्र ठाकुर भन्छन् । यस तर्फ सवैको ध्यान र सहयोग हुनु पर्ने तर्क राख्नु भयो ।
कमलेश मण्डल–महोत्तरी ६ जेठ/परिबन्धमा परेर जेल जीवन बिताउनु परेको पीडा भोगिरहेका जलेश्वर कारागारका कैदीहरू वर्षा र हुरीबतासका कारण दोहोरो दुःख भोग्न बाध्य भएका छन् । वर्षासँगै आएको हावाहुरीका कारण महिला र पुरूष बन्दी तर्फको छतको कर्कट पत्ता (टिनको छाना) उडाएपछि खुलाआकाश मुनि बस्न बाध्य भएपछि कैदीहरू थप संकटमा परी दोहोरो दुःख भोग्न बाध्य भएका छन् । महिला बन्दी तर्फ दोस्रो तल्ला र पुरूष तर्फको तेस्रो तल्लाको टिनको छाना हावाहुरीले उडाएपछि विगत दुई साता देखि खुला आकाश मुनि सुत्न, बस्न, खाना पकाउन उनीहरू बाध्य भएको जेल प्रशासनले जनाएको छ । कर्कट पत्ता उडाउनाले दिन भरी तातो घाममा र रातको चीसोका कारण कैदीहरू विरामी पर्न थालेका छन् । कैदीहरू पालो पालो गरेर खाना बनाउन गरेका छन् । छानो उडाएपछि चर्काे घामका कारण बसिन नसक्नु भएको ज्यानमार्ने मुद्दा अन्तर्गत मुद्दा खेपीरहेका धनुषा रजौलका सुरेन्द्र मुखियाले गुनासो पोखे । सरकारले र जेल प्रशासनले ध्यान नदिँदा छाना छाएको छैन दुखेसो पोखदै अर्को कैदी ललन महतो भन्छन कैदीहरूलाई जहाँ पनि हेला भएको छ । छाना मर्मत तत्काल जेल प्रशासनले गर्नु पर्ने उनले भने । विगत दुई साता देखि पटक पटक आउने हावाहुरी सँगै वर्षाकाकारण कैदीहरूको ओढ्ने ओछयाउने लुगा पनि भिजेको उनीहरू बताउ“छन् । मर्मत अभावमा जीर्ण भवनको छतको छाना पनि उडाएका कारण वर्षा भएपछि पुरूष र महिला बन्दी गृहमा ओत लाग्न ठाउँ समेत छैन । ओढने ओछयाउने समेत भिजने गरेको घाम, चिसो र अनिदोले प्रायः कैदीहरू विरामी समेत पर्न थालेका छन् । कानुन र प्रकृतिको दोहोरो पीडामा परेका हाम्रो उद्धारका लागि सरकार कहाँ छ र ? कैदीहरू प्रश्न गर्छन् । हावाहुरी पानी आएपछि उडाउन लागेको छाप्रो स्याहार्नु कि नानीहरू स्याहार्नु दुबै समस्या यहाँका महिला बन्दीहरूको रहेको कुरा कर्तव्य ज्यान मुद्दामा कैद भुक्तान गरिरहेका राजविराजकी सरोजी सिंह भन्छन् । कैदी भएकै कारण न्यूनतम आवश्यकता तर्फ समेत कारागार प्रशासनले ध्यान नदिएकाले त्यस्तो आवश्यकता आएको हो उनी भन्छन् ।आफ्नो छाना र भ्mयालको हविगत बताउँदै अर्का महिला बन्दी उषा झा भन्छन् छाना भ्mयाल मर्मत गर्न तत्काल जलेश्वर प्रशासनसँग माग गर्नु भयो । राणा कालमै बनेको नेपालकै पुरानो मध्ये जलेश्वर कारागार भित्र जम्मा ३ सय ४२ जना बन्दी रहेको मा २८ महिला र आश्रित ९ जना बालबालिका रहेको छ । १ सय ३५ कैदी क्षमता राख्ने प्राचिन जेल जीर्णशीर्ण अवस्थामा रहेको र जुनसुकै बेला भत्कने संभावना समेत रहेको छ । अभिभावकका कारण जेल जीवन विताउँदै आएका ९ बालबालिका पढनबाट समेत बन्चित भएका छन् । कर्कट पत्ता छाउन तथा जेल मर्मत सम्भारका लागि कारागार व्यवस्था विभाग केन्द्रीय कार्यालयमा पटकपटक बजेट माग गर्दा पनि कुनै सुनवाई हुन नभएको जलेश्वर कारागारका जेलर डा.सोमेन्द्र ठाकुर भन्छन् । यस तर्फ सवैको ध्यान र सहयोग हुनु पर्ने तर्क राख्नु भयो ।
तराई मरुभूमिमा परिणत हुदै
MADHESHVANI WEEKLY
बी.पी. साह (काठमाडौं)/लक्ष्मण यादव (जनकपुर)/चन्दन यादव (सप्तरी)/कमलेश मण्डल (महोत्तरी)/ओमनारायण साह (रौतहट)/मो. इमरान खान (कपिलवस्तु)
तराई राजनीतिक रूपले अशान्त छँदैछ, विभिन्न सशस्त्र गतिविधि चल्दैछ र हत्या हिंसा कायमै छ । तराईवासीको अवस्था राजनीतिक रूपमा र शासकीय पद्धतिमा न्यून छन् । अहिले सबै शोषक, शासक र अपराधीको नजर तराईको वनजंगलमाथि परेको छ । हरियो वन तराईको धनलाई सखाप पार्ने विभिन्न प्रपञ्च रचिएको छ । सरकारी निकायबाट वन फडानी कार्य हुँदैछ भने विभिन्न क्षेत्रका मानिसहरू तराईको वन मास्दै बसोबास गर्न थालेकाछन् । तराईलाई मरूभूमि बनाउन सरकारी निकायबाट विभिन्न क्रियाकलाप भएकै हो, चाहे त्यो गिट्टी बालुवा निकासी देखि काठ दाउराको निकारीसम्म । तराईका जंगलहरूलाई सामुदायिक जंगल बनाइएको कुरा विभिन्न सञ्चार माध्यमहरूमा आइरहेको हुन्छ तर वास्तविकता बेग्लै छ । तराईका जंगललाई सामुदायिकको नाममा केही सीमित व्यक्तिको अधिनमा राखिएको छ । उनीहरू आफ्नो ढंगले वन फडानी गर्दै जिल्ला वन कार्यालयलाई भाग वन्डा दिँदै तराईलाई मरूभूमिकरण गर्नमा लागेका छन् । नेपाल रेन्जर संघले तयार पारेको एक रिपोर्ट अनुसार — कूल ३९ प्रतिशत वनमध्ये २० प्रतिशत तराईको वन सखाप भइसकेको छ । अब मात्र १९ प्रतिशत वन बाँकी छ । उक्त तथ्यांक अनुसार तराईमा प्रतिवर्ष ११ सय हेक्टरको दरले तराईको वन विनास हुँदैछ । सरदरमा प्रतिदिन ३ हेक्टर वन विनास हुँदैछ । तथ्यांकले देखाएअनुसार सरदर प्रतिदिन २ हजार साईकल काठ दाउरा निकासी हुँदैछ । भित्री तराईमा हालसम्ममा लगभग २ लाख ५० हजार देखि ३ लाखको हाराहारीमा वन मासेर घर टहरा निर्माण भएको छ । जसमा बारा जिल्लामै लगभग १ लाख घर टहरा निर्माण भएको छ । नेपाल रेन्जर संघको तथ्याङ्क अनुसार यसै दरले तराईको वन विनास हुँदै जाने हो भने अबको २० वर्षमा तराई मरूभूमिमा परिणत हुनेछ । यसको कारण समग्र वातावरणको सन्तुलन बिग्रिदै गएको देखिन्छ । वनजंगल विनासको कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टिको र तापक्रमको शिकार तराईका किसान हुँदैछन् ।
जनकपुरबाट लक्ष्मण यादवले जनाएअनुसार धनुषाको कूल वनमध्ये लगभग ६० प्रतिशत वन विनास भइसकेको छ । वन फडानीमा स्थानीय सरकारी निकायका कर्मचारीहरुको पनि संलग्नता छ । उनका अनुसार धनुषा जिल्लामा लगभग वन मासेर ८ सय घर टहरा निर्माण भएको छ । हालै चिसापानी–धारापानी वन क्षेत्रमा रहेको ३ सय घर टहरालाई जिल्ला प्रशासन धनुषा र अन्य निकायहरूको सहयोगमा जलाइएको थियो । पुनः ती स्थानहरूमा टहराहरू निर्माण हुन थालेको छ । यादवका अनुसार यस्तै तरिकाले वन मासिदै जाने हो भने धनुषाको वन लगभग १०–१२ वर्षसम्ममा वन सखाप हुन्छ । सप्तरीबाट चन्दन यादव लेख्छन् सप्तरी जिल्लाको महेन्द्र राजमार्गको छेउछाउमा पर्ने सम्पूर्ण वनहरू विनास भइसकेको छ अब भित्री तराईको वन सखाप हुने क्रममा छ । उनका अनुसार विभिन्न नाका हुँदै काठ दाउरा र गिट्टी बालुवाहरू भारत निकासी हुँदैछ । सप्तरीमा वनको काठ दाउरामा आश्रित परिवारको संख्या पनि निकै छ ।
महोत्तरीबाट कमलेश मण्डल लेख्छन् सरकारी कर्मचारीको संलग्नतामा काठ तस्करले महोत्तरीको उत्तरी क्षेत्रबाट लाखौं मूल्य बराबरको सालको जंगल फडानी गरी भारत निकासी गर्दै आएका छन् । महोत्तरीको माइस्थान, खयरमारा, पाटु, गौरीवास लक्ष्मीनिया गाविस क्षेत्रमा पर्ने सालको सरकारी जंगल फडानी गर्दै आएका काठ तस्करले अहिलेसम्म हजारौं रूख कटान गरिसकेका छन् । सदरमुकाम जलेश्वर देखि ४०÷५० किलोमिटर उत्तरमा पर्ने सो क्षेत्रमा भइरहेको जंगल फडानीको सूचना सम्बन्धित निकायले पाएको छ । सूत्र भन्छ भइरहेको काठ तस्करी र जंगली फडानी नियन्त्रण गरी संलग्न व्यक्ति पक्राउ गर्नु जिल्ला वन कार्यालयले कुनै प्रयास गरेको छैन । सदरमुकामसित सम्बन्धित कार्यालयको निगरानी सो क्षेत्रमा नपर्ने हुँदा काठ तस्करले लगातार जंगल फडानी गर्दै आएका छन् ।
वनको बढ्दो विनासका कारण त्यस क्षेत्रका स्थानीय हरूले जंगल फडानीको जानकारी जिल्ला वन कार्यालय बर्दिवासलाई दिने गरेतापनि वन अधिकारीले बेवास्ता गरेका छैन् ।
अहिले सो क्षेत्रको जंगल १ हजार भन्दा बढी सालका रूखहरू काटिएका छन् । सो क्षेत्रमा सालको जंगल फडानी गर्ने गराउने माथि वन कार्यालयले कारवाही नगरेपछि काठ तस्करी एवं वन फडानीमा कर्मचारीको मिलोमतो र संलग्नताको पुष्टि भएको छ ।
सरकारले वन विनास भएको भन्दै काठ कटान र निकासीमा रोक लगाएपनि महोत्तरीमा वन फडानी बढेको छ । दुई महिना यता बाँके मरहा, खयरमारा, गौरीवास, लक्ष्मीनिया जंगलको अवैध कटानी बढेको वन अधिकृत बताउँछन् तर वनको अवैध कटानी रोक्ने तर्फ वन कार्यालयले चासो देखाएको छैन । सरकारले केही महिला पहिले काठ कटान र निकासीमा रोक लगाएको थियो । सिमा सशस्त्र प्रहरी बल जलेश्वरबाट खटिगएको गस्ती टोलीले दुई महिना (माघ फागुन) को अवधिमा ९ लाख ७५ हजार मूल्य बराबर ६ सय ६१ क्यूफीट अवैध काठ सहित केही मान्छे, गाडा गोरू पक्राउ गर्नुले पनि काठ तस्करी र वन फडानी बढेको पुष्टि गर्छ । जंगल फडानी र तस्करी नियन्त्रण गर्ने मातहतका सवै सुरक्षा बेस क्याम्पलाई निर्देशन दिइएको कुरा सिमा सशस्त्र प्रहरी बल जलेश्वरका सशस्त्र प्रहरी उपरीक्षक जनक बहादुर बोहराले बताएका थिए । त्यस्तै खिम्ती ढल्केवर २ सय २० केमी परियोजनाको प्रसारण लाइनका लागि जंगल बीचबाट दुई तिर १५÷१५ मिटर रूख काटनु पर्ने हुन्छ महोत्तरीमा ३ हजार ६ सय ३३ वटा रूख काटनु पर्ने छ तर त्यसको नाममा पनि बढी जंगल फडानी गरिएको छ ।
सामुदायिक वनका पदाधिकारीहरू समेत काठ निकासीमा लगाएको रोकले वन तस्करलाई प्रोत्साहन गरिरहेको बताउँछ । सामुदायिक वन उपभोक्ता महासंघका जिल्ला अध्यक्ष विनोद घिमिरेले प्रतिबन्धबाट सामुदायिक वनहरूको कारोबार ठप्प भएको र तस्करहरूले रातारात र दिनमा पनि जंगलमा पसेर जंगल विनास गरिरहेका बताए । सरकारले वन जोगाउनको लागि काठ कटान र निकासीमा रोक लगाए यसले काठ तस्करी झन बढाएको छ त्यस्तै हो भने यसरी निकासीमा रोक लगाउनुको कुने अर्थ छैन । तर मन्त्रालयबाट सरूवा भई आउनु भएका जिल्ला वन कार्यालय बार्दिवासका प्रमुख वन अधिकृत विन्दु मिश्र विगत एक महिना देखि अनुपस्थिति भएका कारण सम्पर्क हुन सकेन ।
यसैगरी रौतहटबाट ओमनारायण साह भन्छन् अन्य जिल्ला जस्तै रौतहटमा पनि वन विनास भएको छ, र हुने क्रम जारी छ । यहाँ केही सामुदायिक वनहरूको नाममा विभिन्न निकायको मिलेमतोमा वन विनास गरिदैछ । प्रशासनले गाँजा खेतिमा लागेका किसानलाई दुःख दिन थालेपछि उनीहरू अब गाँजा खेति छोडेर वन पैदावरमा आश्रित हुँदैछन् र दिनहुँ लाखौं मूल्य बराबरको काठ दाउरा बेचबिखन गर्छन् ।
त्यस्तै कपिलवस्तु जिल्लाबाट मो. इमरान खान लेख्छन् कपिलवस्तु जिल्लाको विभिन्न स्थानमा सुकुम्वासीको नाममा हजारौं घर टहरा निर्माण गरिएको छ । उनीहरूले कयौं हेक्टर वन जंगल विनास गरिसकेका छन् र तीव्र रूपले वन फडानी हुँदैछ । ती सुकुम्वासीहरू वन पैदावरमा आश्रित भएकोले वन कटानी उनीहरूको पहिलो प्राथमिकतामा छ । यसै क्रममा तराईको वन विनास हुँदै जाने हो भने अब आउने पीढिले तराईलाई मरुभूमि देख्नेछन् र तराईवासीलाई काठ दाउरा अन्यत्रबाट ल्याउनेपर्ने हुन्छ ।
बी.पी. साह (काठमाडौं)/लक्ष्मण यादव (जनकपुर)/चन्दन यादव (सप्तरी)/कमलेश मण्डल (महोत्तरी)/ओमनारायण साह (रौतहट)/मो. इमरान खान (कपिलवस्तु)
तराई राजनीतिक रूपले अशान्त छँदैछ, विभिन्न सशस्त्र गतिविधि चल्दैछ र हत्या हिंसा कायमै छ । तराईवासीको अवस्था राजनीतिक रूपमा र शासकीय पद्धतिमा न्यून छन् । अहिले सबै शोषक, शासक र अपराधीको नजर तराईको वनजंगलमाथि परेको छ । हरियो वन तराईको धनलाई सखाप पार्ने विभिन्न प्रपञ्च रचिएको छ । सरकारी निकायबाट वन फडानी कार्य हुँदैछ भने विभिन्न क्षेत्रका मानिसहरू तराईको वन मास्दै बसोबास गर्न थालेकाछन् । तराईलाई मरूभूमि बनाउन सरकारी निकायबाट विभिन्न क्रियाकलाप भएकै हो, चाहे त्यो गिट्टी बालुवा निकासी देखि काठ दाउराको निकारीसम्म । तराईका जंगलहरूलाई सामुदायिक जंगल बनाइएको कुरा विभिन्न सञ्चार माध्यमहरूमा आइरहेको हुन्छ तर वास्तविकता बेग्लै छ । तराईका जंगललाई सामुदायिकको नाममा केही सीमित व्यक्तिको अधिनमा राखिएको छ । उनीहरू आफ्नो ढंगले वन फडानी गर्दै जिल्ला वन कार्यालयलाई भाग वन्डा दिँदै तराईलाई मरूभूमिकरण गर्नमा लागेका छन् । नेपाल रेन्जर संघले तयार पारेको एक रिपोर्ट अनुसार — कूल ३९ प्रतिशत वनमध्ये २० प्रतिशत तराईको वन सखाप भइसकेको छ । अब मात्र १९ प्रतिशत वन बाँकी छ । उक्त तथ्यांक अनुसार तराईमा प्रतिवर्ष ११ सय हेक्टरको दरले तराईको वन विनास हुँदैछ । सरदरमा प्रतिदिन ३ हेक्टर वन विनास हुँदैछ । तथ्यांकले देखाएअनुसार सरदर प्रतिदिन २ हजार साईकल काठ दाउरा निकासी हुँदैछ । भित्री तराईमा हालसम्ममा लगभग २ लाख ५० हजार देखि ३ लाखको हाराहारीमा वन मासेर घर टहरा निर्माण भएको छ । जसमा बारा जिल्लामै लगभग १ लाख घर टहरा निर्माण भएको छ । नेपाल रेन्जर संघको तथ्याङ्क अनुसार यसै दरले तराईको वन विनास हुँदै जाने हो भने अबको २० वर्षमा तराई मरूभूमिमा परिणत हुनेछ । यसको कारण समग्र वातावरणको सन्तुलन बिग्रिदै गएको देखिन्छ । वनजंगल विनासको कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टिको र तापक्रमको शिकार तराईका किसान हुँदैछन् ।
जनकपुरबाट लक्ष्मण यादवले जनाएअनुसार धनुषाको कूल वनमध्ये लगभग ६० प्रतिशत वन विनास भइसकेको छ । वन फडानीमा स्थानीय सरकारी निकायका कर्मचारीहरुको पनि संलग्नता छ । उनका अनुसार धनुषा जिल्लामा लगभग वन मासेर ८ सय घर टहरा निर्माण भएको छ । हालै चिसापानी–धारापानी वन क्षेत्रमा रहेको ३ सय घर टहरालाई जिल्ला प्रशासन धनुषा र अन्य निकायहरूको सहयोगमा जलाइएको थियो । पुनः ती स्थानहरूमा टहराहरू निर्माण हुन थालेको छ । यादवका अनुसार यस्तै तरिकाले वन मासिदै जाने हो भने धनुषाको वन लगभग १०–१२ वर्षसम्ममा वन सखाप हुन्छ । सप्तरीबाट चन्दन यादव लेख्छन् सप्तरी जिल्लाको महेन्द्र राजमार्गको छेउछाउमा पर्ने सम्पूर्ण वनहरू विनास भइसकेको छ अब भित्री तराईको वन सखाप हुने क्रममा छ । उनका अनुसार विभिन्न नाका हुँदै काठ दाउरा र गिट्टी बालुवाहरू भारत निकासी हुँदैछ । सप्तरीमा वनको काठ दाउरामा आश्रित परिवारको संख्या पनि निकै छ ।
महोत्तरीबाट कमलेश मण्डल लेख्छन् सरकारी कर्मचारीको संलग्नतामा काठ तस्करले महोत्तरीको उत्तरी क्षेत्रबाट लाखौं मूल्य बराबरको सालको जंगल फडानी गरी भारत निकासी गर्दै आएका छन् । महोत्तरीको माइस्थान, खयरमारा, पाटु, गौरीवास लक्ष्मीनिया गाविस क्षेत्रमा पर्ने सालको सरकारी जंगल फडानी गर्दै आएका काठ तस्करले अहिलेसम्म हजारौं रूख कटान गरिसकेका छन् । सदरमुकाम जलेश्वर देखि ४०÷५० किलोमिटर उत्तरमा पर्ने सो क्षेत्रमा भइरहेको जंगल फडानीको सूचना सम्बन्धित निकायले पाएको छ । सूत्र भन्छ भइरहेको काठ तस्करी र जंगली फडानी नियन्त्रण गरी संलग्न व्यक्ति पक्राउ गर्नु जिल्ला वन कार्यालयले कुनै प्रयास गरेको छैन । सदरमुकामसित सम्बन्धित कार्यालयको निगरानी सो क्षेत्रमा नपर्ने हुँदा काठ तस्करले लगातार जंगल फडानी गर्दै आएका छन् ।
वनको बढ्दो विनासका कारण त्यस क्षेत्रका स्थानीय हरूले जंगल फडानीको जानकारी जिल्ला वन कार्यालय बर्दिवासलाई दिने गरेतापनि वन अधिकारीले बेवास्ता गरेका छैन् ।
अहिले सो क्षेत्रको जंगल १ हजार भन्दा बढी सालका रूखहरू काटिएका छन् । सो क्षेत्रमा सालको जंगल फडानी गर्ने गराउने माथि वन कार्यालयले कारवाही नगरेपछि काठ तस्करी एवं वन फडानीमा कर्मचारीको मिलोमतो र संलग्नताको पुष्टि भएको छ ।
सरकारले वन विनास भएको भन्दै काठ कटान र निकासीमा रोक लगाएपनि महोत्तरीमा वन फडानी बढेको छ । दुई महिना यता बाँके मरहा, खयरमारा, गौरीवास, लक्ष्मीनिया जंगलको अवैध कटानी बढेको वन अधिकृत बताउँछन् तर वनको अवैध कटानी रोक्ने तर्फ वन कार्यालयले चासो देखाएको छैन । सरकारले केही महिला पहिले काठ कटान र निकासीमा रोक लगाएको थियो । सिमा सशस्त्र प्रहरी बल जलेश्वरबाट खटिगएको गस्ती टोलीले दुई महिना (माघ फागुन) को अवधिमा ९ लाख ७५ हजार मूल्य बराबर ६ सय ६१ क्यूफीट अवैध काठ सहित केही मान्छे, गाडा गोरू पक्राउ गर्नुले पनि काठ तस्करी र वन फडानी बढेको पुष्टि गर्छ । जंगल फडानी र तस्करी नियन्त्रण गर्ने मातहतका सवै सुरक्षा बेस क्याम्पलाई निर्देशन दिइएको कुरा सिमा सशस्त्र प्रहरी बल जलेश्वरका सशस्त्र प्रहरी उपरीक्षक जनक बहादुर बोहराले बताएका थिए । त्यस्तै खिम्ती ढल्केवर २ सय २० केमी परियोजनाको प्रसारण लाइनका लागि जंगल बीचबाट दुई तिर १५÷१५ मिटर रूख काटनु पर्ने हुन्छ महोत्तरीमा ३ हजार ६ सय ३३ वटा रूख काटनु पर्ने छ तर त्यसको नाममा पनि बढी जंगल फडानी गरिएको छ ।
सामुदायिक वनका पदाधिकारीहरू समेत काठ निकासीमा लगाएको रोकले वन तस्करलाई प्रोत्साहन गरिरहेको बताउँछ । सामुदायिक वन उपभोक्ता महासंघका जिल्ला अध्यक्ष विनोद घिमिरेले प्रतिबन्धबाट सामुदायिक वनहरूको कारोबार ठप्प भएको र तस्करहरूले रातारात र दिनमा पनि जंगलमा पसेर जंगल विनास गरिरहेका बताए । सरकारले वन जोगाउनको लागि काठ कटान र निकासीमा रोक लगाए यसले काठ तस्करी झन बढाएको छ त्यस्तै हो भने यसरी निकासीमा रोक लगाउनुको कुने अर्थ छैन । तर मन्त्रालयबाट सरूवा भई आउनु भएका जिल्ला वन कार्यालय बार्दिवासका प्रमुख वन अधिकृत विन्दु मिश्र विगत एक महिना देखि अनुपस्थिति भएका कारण सम्पर्क हुन सकेन ।
यसैगरी रौतहटबाट ओमनारायण साह भन्छन् अन्य जिल्ला जस्तै रौतहटमा पनि वन विनास भएको छ, र हुने क्रम जारी छ । यहाँ केही सामुदायिक वनहरूको नाममा विभिन्न निकायको मिलेमतोमा वन विनास गरिदैछ । प्रशासनले गाँजा खेतिमा लागेका किसानलाई दुःख दिन थालेपछि उनीहरू अब गाँजा खेति छोडेर वन पैदावरमा आश्रित हुँदैछन् र दिनहुँ लाखौं मूल्य बराबरको काठ दाउरा बेचबिखन गर्छन् ।
त्यस्तै कपिलवस्तु जिल्लाबाट मो. इमरान खान लेख्छन् कपिलवस्तु जिल्लाको विभिन्न स्थानमा सुकुम्वासीको नाममा हजारौं घर टहरा निर्माण गरिएको छ । उनीहरूले कयौं हेक्टर वन जंगल विनास गरिसकेका छन् र तीव्र रूपले वन फडानी हुँदैछ । ती सुकुम्वासीहरू वन पैदावरमा आश्रित भएकोले वन कटानी उनीहरूको पहिलो प्राथमिकतामा छ । यसै क्रममा तराईको वन विनास हुँदै जाने हो भने अब आउने पीढिले तराईलाई मरुभूमि देख्नेछन् र तराईवासीलाई काठ दाउरा अन्यत्रबाट ल्याउनेपर्ने हुन्छ ।
Wednesday, April 27, 2011
satya sai baba

सत्य सांईं बाबा ने अपने भक्तों से कहा था कि वे 96 साल की उम्र में देह त्याग देंगे। बाबा का 24 अप्रैल, रविवार को सुबह 7.40 बजे निधन हो गया। वर्तमान में प्रचलित अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार उस समय उनकी आयु 85 साल थी।
हालाँकि बाबा के भक्तों का दावा है कि लूनर कैलेंडर के अनुसार बाबा का जब निधन हुआ तो उनकी उम्र 85 नहीं 96 साल थी। गौरतलब है कि दक्षिण भारत में लूनर केलेंडर को भी मान्यता दी जाती है।
एक भक्त ने बताया कि बाबा का जन्म 23 नवंबर 1926 को हुआ था और उन्होंने 24 अप्रैल 2011 को शरीर छोड़ा इस तरह वे 30834 दिन जिंदा रहे। लूनर कैलेंडर में एक माह में 27 दिन होते हैं और इस तरह उनकी उम्र 95 साल और 54 दिन थी। दक्षिण भारत में इस कैलेंडर को प्राचीन काल से ही मान्यता प्राप्त है।
सत्य सांईं के एक भक्त ने चार साल पहले की एक घटना को याद करते हुए कहा कि बाबा ने भक्तों से कहा था कि वे चांद पर दर्शन देंगे। हालांकि उस समय बादलों ने चांद को ढक लिया था और भक्त उस दृश्य को देखने से वंचित रह गए थे।
बाबा के एक भक्त का मानना है कि शिर्डी वाले सांईं बाबा ने सत्य साईं के जन्म समय की घोषणा की थी और सत्य सांईं बाबा उसी समय पैदा हुए थे। इसी प्रकार सत्य सांईं बाबा ने भी घोषणा की कि वे 2023 में मध्य कर्नाटक में कस्तूरी के गर्भ से प्रेम सांईं के नाम से फिर अवतार लेंगे। और अब हमें उनके उसी अवतार की प्रतीक्षा है। (वेबदुनिया न्यूज)
lokseba janakpur photos and news




लोकसेवा कार्यालयमा जानु कर्मचारीलाई सजाय
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, वैशाख ५ गते । लोकसेवा आयोग जनकपुर अंचल कार्यालय जलेश्वरको हाताभित्र निर्माण गरिएको नवनिर्मित परिक्षा भवनको उदघाटन सोमबार एक समारोहका बीच आयोगका कार्यवाहक अध्यक्ष डा.कयो देवी यमीले गर्नुभएको छ ।
सदरमुकाम जलेश्वरमा रहेको सो कार्यालयको हाताभित्र एक कोठे परिक्षाभवन निर्माण गरिएको छ । जसको लागत १० लाख ४७ हजार ६३ रुपैया रहेको लोसेआ जनकपुरअंचल कार्यालयका निमित्त प्रमुख दिनेशचन्द्र साहले जानकारी दिनुभयो ।
उदघाटन कार्यक्रममा प्रमुख अतिथीको आसनबाट बोल्नु हुदै कार्यवाहक अध्यक्ष यमीले नेताहरु प्रति व्यंग्य गर्नुहुदै नेता बन्न पनि लोकसेवाले परिक्षा लिए राम्रो हुने धारणा राख्नुभयो । उहाँले नेपालमा एउटा थिती बसाउन लोकसेवा आयोगले महत्वपूर्ण भुमिका खेलेको स्मरण गर्नुहुदै देशको वर्तमान अवस्थाले चिन्ता बढाएको बताउनुभयो । उहाँले अप्रत्यक्ष रुपमा देशको थिती नेताहरुले विगारेको बताउनुहुदै भन्नुभयो, ‘ अब नेता बन्न लोकसेवा पास गर्नुपर्छ’ ।
उहाँले समावेशी, प्रवृद्धिहरुको प्रयोगहरुका कारण लोकसेवा प्रति सर्वसाधारणको आकर्षण बढदै गएको वताउनुहुदै भन्नुभयो, लोकसेवा अहिले सम्म निष्पक्ष भई निरन्तर कार्य गरेको कारण सर्वसाधारणको आकर्षण बढेको हो ।
सोही कार्यक्रममा आयोगका सदस्य राजेन्द्र प्रसाद शाहले कर्मचारीहरुको प्रवृति राम्रै ठाउँमा जाने, राम्रै मन्त्रालय रोज्ने रहेको वताउनुहुदै लोकसेवा आयोगमा जानु कर्मचारीहरुको लागि सजाय जस्तो भएको धारणा राख्नुभयो । उहाँले यस कार्यालयमा काम गर्नु बाहेक कहि कतैबाट आम्दानी नआउने भएकोले कर्मचारीहरुलाई यस कार्यालयमा आउनु सजाय जस्तै भएको दावी गर्नुभयो । उहाँले तराई क्षेत्रमा अहिले पनि लोकसेवा हाम्रो लागि होइन भन्ने मानसिकता रहेको वताउनुहुदै त्यो मानसिकतालाई हटाउन लोकसेवा आयोगले विशेष कार्यक्रम गर्नुपर्नेमा जोड दिनुभयो ।
जनकपुर अंचल कार्यालय जलेश्वरका निमित्त प्रमुख दिनेश प्रसाद साहको अध्यक्षतामा भएको कार्यक्रममा लोकसेवा आयोगका प्रशासन शाखा प्रमुख उपसचिव टिकाराम ज्ञवाली, प्रमुख जिल्ला अधिकारी तेजप्रसाद पौडेल, लगायतका वक्ताहरुले आ–आफ्नो मन्तव्य राख्नुभएको थियो ।
Sunday, April 17, 2011
लोक मानवियता विर्सेर रहल
नागेन्द्रकुमार कर्ण MAHOTTARI
२०६८÷१÷४
सभहक दलान कार्यक्रमके लेल
वैशाख महिनाक असिनपसिन करबाला गर्मी, ओहीमे पश्चिम दिस सऽ उडबाला गरम बालु आ क्षण क्षणमे बदलैत मौसम, ककरो निक नै लगैत अछि । ओहुमे यदि नुकायबाला कोनो घर नै रहैय त कि दशा हायत अनुमान करनाई कठिन अछि । मुदा विधिके विधान एहन मौसम रहितो सम्बन्धित निकायके उदासिनताके कारणे महोत्तरीक हतिसर्वाके दलित बस्तीके दु दर्जन स वेशी परिवारके एहने अवस्था स अखैन ग्रुजरपडि रहल अछि । ओ सभ एखनुक समयमे मानविय संवेदना प्रकट करबाला कोनो निकाय नै रहल वतोवैत लोक सभ मानविय संवेदना विर्सेर गेल आरोप लगोने अछि ।
महोत्तरी जिल्लाक हतिसर्वा–९ झपौल टोलमे एक महिना आगा लागल आगलगीके कारण वेघर भेल ३२ परिवार अखैन धरि कोनो राहत नै पाबऽ सकल अछि । ओ सभ एक महिना स खुल्ला आकाशके निचा रहबाक लेल वाध्य अछि । रेडक्रस आ दैविक प्रकोप उद्धार समिति आगलगीके वाद तुरत राहत प्रदान करितो ओ पिडित सभके लेल उटके मुहँमे जिराके फोरैन सावित भ गेल अछि । फागुन ३० गते सोम दिन बेरियाके समयमे आगि लगला स महरा बस्तीके ३२ टा घर जरि गेल छल । पिडित सभके यथेष्ट राहत नै भेटला स ओकरा सभके जिवन अखैन नरकमय बनल अछि । कखनो बिहाडी अवैत अछि त ओही संगै पथ्थर सेहो बरसैत अछि । दिनमे तऽ गर्मीके बाते नहि ओहुमे जखैन नदीके धिप्पल वालु उडैत अवैत अछि त ओकरा सभके देह सिहरा दैत अछि । मुदा करब त कि, नहि दुध पिले स सुख नै माछ खयले स ’ जकाँ भगेल अछि जीवन ।
ओकरा सभके अखैन धरि नेपाल रेडक्रस सोसाइटी महोत्तरी शाखा एक एक टा त्रिपाल, बाल्टिन, किछ वर्तन भाडा, किछ कपडा वितरण कयने अछि त दैवी प्रकोप उद्धार समिति महोत्तरी १० क्विन्टल चाउर, २ क्विन्टल चुरा, १० किलो चिनी, १ क्विन्टल दाइल, स्वावीन, करुतेल आ एक बोरा आयोनुन मात्रै राहत स्वरुप वितरण कयने अछि ।
आगलागी स वेघर भेल स्थानीय विरजु महराके श्रीमती घटनास्थल पहुचल किछ पत्रकार आ मानवअधिकारकर्मी देख कऽ सब जरि गेल, किछ नै बाकी अछि, कोना क रहब बतोलैनि । विरजु घर बनेबाक लेल साउदी अरब स पठोने दु लाख रुपैया से हो आगिमे स्वाहा भगेल ओ बतोलैनि । ओ आब केनाकऽ घर बनायब आ रहब एकरे चिन्ता लागल बतोलैथि ।
ओही टोलमे रहल ४२ घर मे सऽ ३२ गोटेके खाद्यान्न, लत्ताकपडा, सब जरिगेल अछि । ओकरा सभके अखैन अपने लगोने कपडा आ रेडक्रस देने एकथान कपडा बाहेक किछ नै बाँकी अछि ।
ओही टोलमे रहि रहल एकल महिला मरनीदेवी आगलगी स चार दिन पहिने मात्रे घर बनोने वतोवैत ओ घर जरला स एखैन हम सभ वेसहारा बनल वतोलैनि । आँखी स नोर झारैत ओ घरमे कमाई बाला कोही नहि अछि, सात टा धियापुता अछि केना कऽ रहब आ केना क खायब इहे सोचिऽ सोचिऽ क विमार पडलागल बतौली । ओ कतेक दिन भुकले सुत परल बतोवैत अपने त उपवासो कलेव मुदा हमर छोट छोट धियापुता कहाँ जाइत, ओकरा सभके केना उपवास रखबै ? प्रश्न कयलि । ओ अखैन माँगि कऽ गुजारा कर परबाक अवस्था आयल बतौली ।
मरनी मात्रे टा नहि घर जरि कऽ वेसहारा भेल फेकन महराके श्रीमती रामवती देवी घरवाला कोनो काम नै करिरहल कहैत घर जरलावाद भुकले सुतऽ पडिरहल बतौली । ओ हमरा सभके देलगेल राहत दुईये दिनमे सकिगेल कहैत ओहीके वाद कोई नै देखऽ आयल वतोलैनि ।
फागुन ३० गते सोमदिन बेरियामे हतिसर्वा–९ झपौल टोलमे रहनिहार मदिकरण महराके घर स लागल आगलागि पुरे दलित वस्तीमे पसरल छल । मदिकरणके घरमे खाना बना रहल समयमे चुल्हा स आगि लागल छल । आगलगी स ३ लाख रुपैया नगद, एक दर्जन चौपाया, फर्निचर, अन्नपात, लत्ताकपडा क करिब एक करोड मोल बराबरके क्षति भेल छल ।
आगलगी स हतिसर्वा ९ रहनिहार महीकरण महरा, छठु महरा, रामप्रकाश महरा, रामअयोध्या महरा, श्रीप्रसाद महरा, रामअवतार महरा, असु महरा, महेन्द्र महरा ठुलो, दुखरा महरा, उपेन्द्र महरा, राहदेव महरा, सुकदेव महरा, विश्वम्भर महरा, राजन महरा, रामदेव महरा, सरोज महरा, विजु महरा, जय कुमार महरा, घवीद महरा, राज विशेर महरा, ताराचन महरा, हरीनारायण महरा, मालती देवी महरा, अशोक महरा, वासुदेव महरा, शिव महरा, महेन्द्रमहरा सानो, घुरन महरा, रामविलास महरा, अनुरोध महरा लगायतक घर जरल छल ।
सदरमुकाम जलेश्वर स करिब ४० किलोमिटर दुरीमे रहल ओही टोलमे अखैन खयबाक र रहबाक समस्या उत्पन्न भेल अछि । आगलगी स पिडित बनल जागेश्वर महरा रेडक्रस एउटा पाल देने अछि मुदा राति मे आयल बिहाडी, पानि आ पथ्थर स ओ नै थेग सकैत अछि ।
अग्नीपिडित स्थानीय सभ हमरा सभके सम्बन्धित निकाय रहबाक लेल मात्रे घर बनादेवाक माँग कयने अछि । पिडत स्थानीय युवा जागेश्वर महरा कहलैनि, ‘ हमरा सभके किछ नहि , घर मात्रै देत त भजाइत , हम सभ कमाइ के लेल सक्षम छी’ ।
आगलगी स खयबाक, रहबाक समस्या मात्रे टा नहि ओकरा सभके पहिचानके लेल रहल कागजात स सेहो जरि गेल अछि । नागरिकता बनेबाक लेल खटल टोलीमे नागरिकता बनौने ओ सभ अखैन ओ कागजात सभ के बनादेत एहिके सेहो खोजी क रहल अछि ।
एम्हर जिल्ला प्रशासन कार्यालय महोत्तरीक प्रशासकिय अधिकृत नागेन्द्र चौधरी ओकरा सभके दैवी प्रकोप उद्धार समितिद्वारा राहत देल गेल वतोलैनि । ओ एखैन सिडिओ साहब नै रहलाक कारणे ओ अओता त एहिके निर्णय कायल जायत जनतव देलैनि ।
दुःख लोकके स्वभावतः आक्रोशित बनादैत अछि । एहुमे दैविक प्रकोपमे परि वेघर भेल, दुःख पिडामे परल सभके राज्य संचालन करबाला निकाय नै देखैत अछि त वेश दुःख, आक्रोश आ पिडा होइत अछि । आ ओ आक्रोश आ पिडा जखैन माथ स उपर आबि जाइत अछि त ओ कोनो बाढीके रुप ललैत अछि आ एहि स कतेक तहस नहस होइत अछि तकर अनुमान करनाई कठिन भ जाइत अछि । ताईद्वारे सम्बन्धित निकायके एहि प्रति गम्भिर होनाई बड जरुरी भ गेल अछि । सम्बन्धित निकाय आ महोत्तरीमे रहि रहल संघसंस्था सभके तत्काले एहि प्रति सोचनाई बहुत जरुरी भ गेल अछि । आ राजनीतिकदल सभके सेहो एखुनक अवस्थामे ओकरा सभ प्रति ध्यान देनाई जरुरी अछि । ओही ठामक दृश्य देखला पर सम्बन्धित निकाय मानव प्रतिके सदाशयता विर्सेर गेल जकाँ महसुस होइत अछि । एक महिना भ चुकलाक वादो राज्य आ राज्य संचालन करबाला निकाय ओकरा सभ प्रति चाख नै रखने अछि । इ चाख नै रखनाई आ ओकरा सभके क्षतिपूर्ति नै देनाई मानवअधिकारके उल्लंघन अछि ।
२०६८÷१÷४
सभहक दलान कार्यक्रमके लेल
वैशाख महिनाक असिनपसिन करबाला गर्मी, ओहीमे पश्चिम दिस सऽ उडबाला गरम बालु आ क्षण क्षणमे बदलैत मौसम, ककरो निक नै लगैत अछि । ओहुमे यदि नुकायबाला कोनो घर नै रहैय त कि दशा हायत अनुमान करनाई कठिन अछि । मुदा विधिके विधान एहन मौसम रहितो सम्बन्धित निकायके उदासिनताके कारणे महोत्तरीक हतिसर्वाके दलित बस्तीके दु दर्जन स वेशी परिवारके एहने अवस्था स अखैन ग्रुजरपडि रहल अछि । ओ सभ एखनुक समयमे मानविय संवेदना प्रकट करबाला कोनो निकाय नै रहल वतोवैत लोक सभ मानविय संवेदना विर्सेर गेल आरोप लगोने अछि ।
महोत्तरी जिल्लाक हतिसर्वा–९ झपौल टोलमे एक महिना आगा लागल आगलगीके कारण वेघर भेल ३२ परिवार अखैन धरि कोनो राहत नै पाबऽ सकल अछि । ओ सभ एक महिना स खुल्ला आकाशके निचा रहबाक लेल वाध्य अछि । रेडक्रस आ दैविक प्रकोप उद्धार समिति आगलगीके वाद तुरत राहत प्रदान करितो ओ पिडित सभके लेल उटके मुहँमे जिराके फोरैन सावित भ गेल अछि । फागुन ३० गते सोम दिन बेरियाके समयमे आगि लगला स महरा बस्तीके ३२ टा घर जरि गेल छल । पिडित सभके यथेष्ट राहत नै भेटला स ओकरा सभके जिवन अखैन नरकमय बनल अछि । कखनो बिहाडी अवैत अछि त ओही संगै पथ्थर सेहो बरसैत अछि । दिनमे तऽ गर्मीके बाते नहि ओहुमे जखैन नदीके धिप्पल वालु उडैत अवैत अछि त ओकरा सभके देह सिहरा दैत अछि । मुदा करब त कि, नहि दुध पिले स सुख नै माछ खयले स ’ जकाँ भगेल अछि जीवन ।
ओकरा सभके अखैन धरि नेपाल रेडक्रस सोसाइटी महोत्तरी शाखा एक एक टा त्रिपाल, बाल्टिन, किछ वर्तन भाडा, किछ कपडा वितरण कयने अछि त दैवी प्रकोप उद्धार समिति महोत्तरी १० क्विन्टल चाउर, २ क्विन्टल चुरा, १० किलो चिनी, १ क्विन्टल दाइल, स्वावीन, करुतेल आ एक बोरा आयोनुन मात्रै राहत स्वरुप वितरण कयने अछि ।
आगलागी स वेघर भेल स्थानीय विरजु महराके श्रीमती घटनास्थल पहुचल किछ पत्रकार आ मानवअधिकारकर्मी देख कऽ सब जरि गेल, किछ नै बाकी अछि, कोना क रहब बतोलैनि । विरजु घर बनेबाक लेल साउदी अरब स पठोने दु लाख रुपैया से हो आगिमे स्वाहा भगेल ओ बतोलैनि । ओ आब केनाकऽ घर बनायब आ रहब एकरे चिन्ता लागल बतोलैथि ।
ओही टोलमे रहल ४२ घर मे सऽ ३२ गोटेके खाद्यान्न, लत्ताकपडा, सब जरिगेल अछि । ओकरा सभके अखैन अपने लगोने कपडा आ रेडक्रस देने एकथान कपडा बाहेक किछ नै बाँकी अछि ।
ओही टोलमे रहि रहल एकल महिला मरनीदेवी आगलगी स चार दिन पहिने मात्रे घर बनोने वतोवैत ओ घर जरला स एखैन हम सभ वेसहारा बनल वतोलैनि । आँखी स नोर झारैत ओ घरमे कमाई बाला कोही नहि अछि, सात टा धियापुता अछि केना कऽ रहब आ केना क खायब इहे सोचिऽ सोचिऽ क विमार पडलागल बतौली । ओ कतेक दिन भुकले सुत परल बतोवैत अपने त उपवासो कलेव मुदा हमर छोट छोट धियापुता कहाँ जाइत, ओकरा सभके केना उपवास रखबै ? प्रश्न कयलि । ओ अखैन माँगि कऽ गुजारा कर परबाक अवस्था आयल बतौली ।
मरनी मात्रे टा नहि घर जरि कऽ वेसहारा भेल फेकन महराके श्रीमती रामवती देवी घरवाला कोनो काम नै करिरहल कहैत घर जरलावाद भुकले सुतऽ पडिरहल बतौली । ओ हमरा सभके देलगेल राहत दुईये दिनमे सकिगेल कहैत ओहीके वाद कोई नै देखऽ आयल वतोलैनि ।
फागुन ३० गते सोमदिन बेरियामे हतिसर्वा–९ झपौल टोलमे रहनिहार मदिकरण महराके घर स लागल आगलागि पुरे दलित वस्तीमे पसरल छल । मदिकरणके घरमे खाना बना रहल समयमे चुल्हा स आगि लागल छल । आगलगी स ३ लाख रुपैया नगद, एक दर्जन चौपाया, फर्निचर, अन्नपात, लत्ताकपडा क करिब एक करोड मोल बराबरके क्षति भेल छल ।
आगलगी स हतिसर्वा ९ रहनिहार महीकरण महरा, छठु महरा, रामप्रकाश महरा, रामअयोध्या महरा, श्रीप्रसाद महरा, रामअवतार महरा, असु महरा, महेन्द्र महरा ठुलो, दुखरा महरा, उपेन्द्र महरा, राहदेव महरा, सुकदेव महरा, विश्वम्भर महरा, राजन महरा, रामदेव महरा, सरोज महरा, विजु महरा, जय कुमार महरा, घवीद महरा, राज विशेर महरा, ताराचन महरा, हरीनारायण महरा, मालती देवी महरा, अशोक महरा, वासुदेव महरा, शिव महरा, महेन्द्रमहरा सानो, घुरन महरा, रामविलास महरा, अनुरोध महरा लगायतक घर जरल छल ।
सदरमुकाम जलेश्वर स करिब ४० किलोमिटर दुरीमे रहल ओही टोलमे अखैन खयबाक र रहबाक समस्या उत्पन्न भेल अछि । आगलगी स पिडित बनल जागेश्वर महरा रेडक्रस एउटा पाल देने अछि मुदा राति मे आयल बिहाडी, पानि आ पथ्थर स ओ नै थेग सकैत अछि ।
अग्नीपिडित स्थानीय सभ हमरा सभके सम्बन्धित निकाय रहबाक लेल मात्रे घर बनादेवाक माँग कयने अछि । पिडत स्थानीय युवा जागेश्वर महरा कहलैनि, ‘ हमरा सभके किछ नहि , घर मात्रै देत त भजाइत , हम सभ कमाइ के लेल सक्षम छी’ ।
आगलगी स खयबाक, रहबाक समस्या मात्रे टा नहि ओकरा सभके पहिचानके लेल रहल कागजात स सेहो जरि गेल अछि । नागरिकता बनेबाक लेल खटल टोलीमे नागरिकता बनौने ओ सभ अखैन ओ कागजात सभ के बनादेत एहिके सेहो खोजी क रहल अछि ।
एम्हर जिल्ला प्रशासन कार्यालय महोत्तरीक प्रशासकिय अधिकृत नागेन्द्र चौधरी ओकरा सभके दैवी प्रकोप उद्धार समितिद्वारा राहत देल गेल वतोलैनि । ओ एखैन सिडिओ साहब नै रहलाक कारणे ओ अओता त एहिके निर्णय कायल जायत जनतव देलैनि ।
दुःख लोकके स्वभावतः आक्रोशित बनादैत अछि । एहुमे दैविक प्रकोपमे परि वेघर भेल, दुःख पिडामे परल सभके राज्य संचालन करबाला निकाय नै देखैत अछि त वेश दुःख, आक्रोश आ पिडा होइत अछि । आ ओ आक्रोश आ पिडा जखैन माथ स उपर आबि जाइत अछि त ओ कोनो बाढीके रुप ललैत अछि आ एहि स कतेक तहस नहस होइत अछि तकर अनुमान करनाई कठिन भ जाइत अछि । ताईद्वारे सम्बन्धित निकायके एहि प्रति गम्भिर होनाई बड जरुरी भ गेल अछि । सम्बन्धित निकाय आ महोत्तरीमे रहि रहल संघसंस्था सभके तत्काले एहि प्रति सोचनाई बहुत जरुरी भ गेल अछि । आ राजनीतिकदल सभके सेहो एखुनक अवस्थामे ओकरा सभ प्रति ध्यान देनाई जरुरी अछि । ओही ठामक दृश्य देखला पर सम्बन्धित निकाय मानव प्रतिके सदाशयता विर्सेर गेल जकाँ महसुस होइत अछि । एक महिना भ चुकलाक वादो राज्य आ राज्य संचालन करबाला निकाय ओकरा सभ प्रति चाख नै रखने अछि । इ चाख नै रखनाई आ ओकरा सभके क्षतिपूर्ति नै देनाई मानवअधिकारके उल्लंघन अछि ।
Saturday, April 16, 2011
लागु औषधसहित दुई पक्राउ
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, बैशाख २ गते । लागु औषधसहित शुक्रवार महोत्तरीको बर्दिवासमा दुई जनालाई पक्राउ गरिएको छ ।
पक्राउ पर्नेमा बर्दिवास –१ का कमलराज न्यौपाने र गुञ्जनारायण श्रेष्ठ रहेका छन् । उनीहरुको साथबाट प्रहरीले ५२ वोतल कोरेक्स र ४ सय ३६ ओटा स्पास्मो प्रोक्सिम ट्याबलेट वरामद गरिएको कुरा इलाकाप्रहरी कार्यालय बर्दिवासका प्रही निरीक्षक लालगोबिन्द श्रेष्ठले वताए ।
उनीहरुले बर्दिवास क्षेत्रमा लागुऔषध विक्रि वितरण गर्ने गरेको सुराकीका आधारमा घरमा छापा मारी उनीहरुलाई प्रहरीले पक्राउ गरेको हो । पक्राउ परेकाहरुलाई शुक्रवारनै आगुऔषध विक्रि वितरण गरेको कसुरमा म्याद थपका लागि जिल्ला अदालत महोत्तरीमा पेश गरिने प्रहरीले जनाएको छ ।
न्यौपानेलाई यसअघि पनि लागु औषध सहित पक्राउ परी जिल्ला अदालत महोत्तरीले धरौटीमा रिहा गरेका थिए ।
जलेश्वर, बैशाख २ गते । लागु औषधसहित शुक्रवार महोत्तरीको बर्दिवासमा दुई जनालाई पक्राउ गरिएको छ ।
पक्राउ पर्नेमा बर्दिवास –१ का कमलराज न्यौपाने र गुञ्जनारायण श्रेष्ठ रहेका छन् । उनीहरुको साथबाट प्रहरीले ५२ वोतल कोरेक्स र ४ सय ३६ ओटा स्पास्मो प्रोक्सिम ट्याबलेट वरामद गरिएको कुरा इलाकाप्रहरी कार्यालय बर्दिवासका प्रही निरीक्षक लालगोबिन्द श्रेष्ठले वताए ।
उनीहरुले बर्दिवास क्षेत्रमा लागुऔषध विक्रि वितरण गर्ने गरेको सुराकीका आधारमा घरमा छापा मारी उनीहरुलाई प्रहरीले पक्राउ गरेको हो । पक्राउ परेकाहरुलाई शुक्रवारनै आगुऔषध विक्रि वितरण गरेको कसुरमा म्याद थपका लागि जिल्ला अदालत महोत्तरीमा पेश गरिने प्रहरीले जनाएको छ ।
न्यौपानेलाई यसअघि पनि लागु औषध सहित पक्राउ परी जिल्ला अदालत महोत्तरीले धरौटीमा रिहा गरेका थिए ।
पोखरीमा डुवेर एकै साथ ५ वालिकाको मृत्यु
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, वैशाख २ गते । सिमावर्ती मधवापुरमा एकै टोलका ५ बालिकाको मृत्यु भएपछि सिंगै गाउँ नै शोकमग्न हुन पुगेको छ । महोत्तरी जिल्लाको सिमावर्ति नाका मटिहानी नजिकै रहेको भारतीय गाउँ मधवापुरमा शुक्रबार दिउँसो पोखरीमा नुहाउन गएको ५ बालिकाको डुवेर मृत्यु भए पछि शोकमा सिंगै गाउँ नै डुबेको छ ।
शुक्रबार सिमावर्ती मधवापुर स्थित एक पोखरीमा नुहाउन गएका बेला बालिकाहरुको डुबेर मृत्यु भएको हो ।
मृत्यु हुनेमा भारत विहारको मधवापुर प्रखण्ड अन्तर्गत पर्ने रामपुर गाउका इस्लामटोल घर भएका मोहम्मद हैदर राईनको छोरीद्वय वर्ष १८ कि इसरत खातुन र १३ वर्षिया नसीमा खातुन ,सोहि ठाउँका हनिफ राईनको छोरीद्वय १३ वर्षिया गुलनाज खातुन र ११ वर्षिया सहनाज खातुन र जनिफ राईनको ९ वर्षिया छोरी हसिना खातुन रहेका छन ।
शुक्रबार दिउँसो मधवापुर स्थित सशस्त्र प्रहरी वेश क्याम्पको नजिकै रहेको पोखरीमा नुहाइ रहेको बखत ति बालिकाहरुको डुवेर मृत्यु भएको स्थानियवासीहरुले बताएका छन ।
पौडी खेल्न नजान्ने ती बालिकाहरु पोखरीमा रहेको पानिको गहिराई थाहा नपाई नुहाउन खोजे पछि डुवेर उनीहरुको ज्यान गएको हुन सक्ने प्रहरीको अनुमान रहेको छ । बढदो गर्मीसंगै व्याकुल भएका बालिकाहरु नुहाउनका लागि पोखरीमा पसेका थिए ।
उनीहरुको शव पोष्टमार्टमाका लागि मधवापुर स्थित अस्पतालमा राखिएको भारतीय प्रहरीले जनाएको छ ।
एक साथै ५ जना बालिकाको मृत्यु भए पश्चात सो इस्लामटोल मात्रै होइन नेपाली मटिहानीका स्थानीय पनि शोकाकुल बनेका छन् । मृतकका वुवा आमा र आफन्तहरु रुदाँरुदैं मुर्छा पर्ने गरेको स्थानियहरुले बताए ।
जलेश्वर, वैशाख २ गते । सिमावर्ती मधवापुरमा एकै टोलका ५ बालिकाको मृत्यु भएपछि सिंगै गाउँ नै शोकमग्न हुन पुगेको छ । महोत्तरी जिल्लाको सिमावर्ति नाका मटिहानी नजिकै रहेको भारतीय गाउँ मधवापुरमा शुक्रबार दिउँसो पोखरीमा नुहाउन गएको ५ बालिकाको डुवेर मृत्यु भए पछि शोकमा सिंगै गाउँ नै डुबेको छ ।
शुक्रबार सिमावर्ती मधवापुर स्थित एक पोखरीमा नुहाउन गएका बेला बालिकाहरुको डुबेर मृत्यु भएको हो ।
मृत्यु हुनेमा भारत विहारको मधवापुर प्रखण्ड अन्तर्गत पर्ने रामपुर गाउका इस्लामटोल घर भएका मोहम्मद हैदर राईनको छोरीद्वय वर्ष १८ कि इसरत खातुन र १३ वर्षिया नसीमा खातुन ,सोहि ठाउँका हनिफ राईनको छोरीद्वय १३ वर्षिया गुलनाज खातुन र ११ वर्षिया सहनाज खातुन र जनिफ राईनको ९ वर्षिया छोरी हसिना खातुन रहेका छन ।
शुक्रबार दिउँसो मधवापुर स्थित सशस्त्र प्रहरी वेश क्याम्पको नजिकै रहेको पोखरीमा नुहाइ रहेको बखत ति बालिकाहरुको डुवेर मृत्यु भएको स्थानियवासीहरुले बताएका छन ।
पौडी खेल्न नजान्ने ती बालिकाहरु पोखरीमा रहेको पानिको गहिराई थाहा नपाई नुहाउन खोजे पछि डुवेर उनीहरुको ज्यान गएको हुन सक्ने प्रहरीको अनुमान रहेको छ । बढदो गर्मीसंगै व्याकुल भएका बालिकाहरु नुहाउनका लागि पोखरीमा पसेका थिए ।
उनीहरुको शव पोष्टमार्टमाका लागि मधवापुर स्थित अस्पतालमा राखिएको भारतीय प्रहरीले जनाएको छ ।
एक साथै ५ जना बालिकाको मृत्यु भए पश्चात सो इस्लामटोल मात्रै होइन नेपाली मटिहानीका स्थानीय पनि शोकाकुल बनेका छन् । मृतकका वुवा आमा र आफन्तहरु रुदाँरुदैं मुर्छा पर्ने गरेको स्थानियहरुले बताए ।
Friday, April 15, 2011
कतै सफल कतै असफल सुपथ मूल्यका पसल tnepal.net
(दीपक खनाल)
काठमाडाँ १६ भदौ । गोरखा जिल्ला मिरकोट गाविस–८ की अमृता थापा घरमा चिनी, चियापत्ती, साबुन, टुथपेस्टजस्ता दैनिक आवश्यकताका सामान सकिनासाथ पुगिहाल्छिन् घरदेखि १५ मिनेट टाढा रहेको ‘सहिद दिदी सुपथ मूल्य सहकारी पसल’मा ।
यो पसल खुल्नु पहिले उनी सधँ हरेक सामान निजी पसलबाट किन्ने गर्थिन् । अहिले भने उनी अरू पसल जान्नन् । किनभने उनी आफूलाई चाहिने सामान सुपथ मूल्य पसलबाट सुपथ मूल्यमै पाउँछिन् ।
मूल्यमा अनावश्यक बहस गरिरहन नपर्ने र आफूलाई ठगिएको महसुस नहुने भएकाले सुपथ मूल्य पसलमा नै सामान किन्दा आफूलाई ढुक्क हुने उनको अनुभव छ ।
अमृता मात्र होइन, यो गाविसका धेरैजसो उपभोक्ता यही पसलबाट उपभोग्य सामग्री किन्ने गर्दछन् । उनीहरू यी पसलमै जानुको कारण पनि अमृताकै जस्तो छ ।
सरकारले आर्थिक वर्ष २०६५÷०६६ मा उपलब्ध गराएको रु. एक लाखमा सो गाविसका ९५ घरपरिवारले रु. पाँच–पाँचसय थपेर एकवर्ष पहिले खोलेको सो सुपथ मूल्य पसल अहिले सबैको प्रिय बनेको छ । यद्यपि एकीकृत नेकपा माओवादीको सरकारकापालामा आएको कार्यक्रम भएकाले र एकीकृत माओवादीका स्थानीय कार्यकर्ताको बढी सक्रियतामा खोलिएकाले कसै–कसैले यो पसललाई ‘माओवादी पसल’ पनि भन्ने गरेको सो क्षेत्रका उपभोक्ता बताउँछन् ।
तत्कालीन अर्थमन्त्री डा.बाबुराम भट्टराइले देशभरका तीन हजार ९१५ गाविस र प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्रमा ३० हजार जनसङ्ख्यामा एक– एकवटा गरी सुपथ मूल्य सहकारी पसल खोल्न रु. एक–एक लाखका दरले रकम दिने कार्यक्रम ल्याएका थिए ।
यसका लागि रु. ४० करोड विनियोजन गरिएको थियो । यसमा आर्थिक वर्ष २०६५÷०६६ मा तीन हजार २१९ वटा सुपथ मूल्यका सहकारी पसल सञ्चालन गर्ने गरी रु. ३२ करोड ६३ लाख रकम खर्च भएको थियो ।
सोही रकमका आधारमा आर्थिक वर्ष २०६६÷०६७ मा रु. आठ करोड ४० लाख विनियोजन गरिएकोमा ३१२ वटा संस्थालाई रु. एक लाखको दरले रु. तीन करोड १२ लाख निकासा गरिएको र बाँकी रु. पाँच करोड २८ लाख रकम अझै निकासा हुन नसकेको कृषि तथा सहकारी मन्त्रालय सहकारी विभागले हालै सार्वजनिक गरेको वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन–२०६६ मा उल्लेख छ ।
सुपथ मूल्य सहकारी पसल नियमावली, २०६५ मा सहकारी पसल सञ्चालन गर्न केन्द्रमा कृषि तथा सहकारीमन्त्रीको अध्यक्षतामा उच्चस्तरीय समन्वय समिति र जिल्लास्तरमा जिल्ला विकास समितिको सभापतिको अध्यक्षतामा जिल्ला पसल सञ्चालन तथा अनुगमन समिति गठन गर्ने व्यवस्था गरिएको थियो ।
स्थानीयस्तरमा यस्ता पसल सञ्चालन गर्न चाहने सहकारी संस्था दर्ता गर्ने अधिकार अस्थायीरूपमा तीन महिनाका लागि सम्बन्धित जिल्लाको प्रमुख जिल्ला अधिकारीलाई प्रदान गरिएको थियो ।
सोही कार्यक्रमअनुसार मनाङ जिल्लामाबाहेक बाँकी सबै ७४ जिल्लामा गरी चार हजारमध्ये तीन हजार २६३ वटा सुपथ मूल्य पसल खोलिएका छन् । यी पसल देशका धेरैजसो जिल्लामा प्रभावकारी बनेको र केही जिल्लामा प्रभावकारी बन्न नसकेको सहकारी विभागले जनाएको छ ।
सहकारी विभागका रजिष्ट्रार सुदर्शनप्रसाद ढकाल तराई र हिमालीभन्दा पहाडी जिल्लामा खोलिएका सुपथ पसलहरू बढी राम्ररी चलेको बताए ।
उनका अनुसार तराईका कतिपय जिल्लामा केही आपराधिक समूहले समेत यी पसल खोल्न सरकारले उपलब्ध गराएको बजेट दुरूपयोग गरेको पाइएको छ ।
यद्यपि सरकारले उपलब्ध गराएको रु. एक लाख रकममा रु. १० लाख थपेर जुम्ला जिल्लाका जनताले सदरमुकाम खलङ्गामा आफ्नै भवन समेत निर्माण गरेर पसल चलाएको उदाहरण दिँंदै रजिष्ट्रार ढकाल थप्छन ‘सबै ठाउँमा राम्रो सबै ठाउँमा नराम्रो नभनौं, आधा राम्रो, आधा नराम्रो भनौं ।’
डिभिजन सहकारी कार्यालय, धनकुटाका प्रमुख बेनी केसी आफ्नो जिल्लाका ३५ गाविस र एउटा नगरपालिकामा रहेका एक एकवटा गरी ३६ वटा सुपथ मूल्य सहकारी पसलहरू निकै प्रभावकारी बनेको जिकिर गरे । उनका अनुसार पूर्वाञ्चलका तेह्रथुम, सङ्खुवासभा र भोजपुरमा खोलिएका सबै पसलहरू निकै प्रभावकारी बनेका छन् ।
देशका ३८ वटा जिल्लाका डिभिजन सहकारी जिल्ला कार्यालयका प्रमुखमध्ये धेरैजसोले यी पसल प्रभावकारी बनेको बताउँदै सरकारले थप रकम विनियोजन गर्नुपर्नेमा जोड दिएका थिए ।
यता डिभिजन सहकारी कार्यालय बाग्लुङका प्रमुख विष्णु सुवेदी धौलागिरि अञ्चलमा रहेका यस्ता पसल खासै प्रभावकारी बन्न नसकेको अनुभव सुनाउछन ।
उनका अनुसार कतिपयले ‘माओवादी पसल’ भनिदिँंदा, एकीकृत माओवादीका कार्यकर्ताले आफ्नै पार्टीको पसलजस्तो ठानिदिँंदा, सहकारीको भावनाअनुसार पसल व्यवस्थापन नहुँदा र अरू पसल जस्तो उधारोमा नचल्ने हुँदा यी पसल सोचेजस्तो प्रभावकारी बन्न नसकेका हुन् ।
नियन्त्रण र निर्धारित मूल्य हुने भएकाले यी पसल निम्नस्तरका जनताका लागि भने नभै नहुने सुवेदीको भनाइ छ ।
उनको विचारमा सरकारले विगतमा खोलेका ८३० जति पुराना सहकारी पसललाई समेत महत्व दिएमा यस्ता पसल निकै प्रभावकारी बन्न सक्ने छन् । रजिष्ट्रार ढकाल विभागको आफ्नै कार्यालय भएको जिल्लाका सहकारी पसल राम्ररी चलेको र कार्यालय नभएका ठाउँमा भने सोचे अनुसार चल्न नसकेको पाइएको अनुभव सुनाउछन । कार्यालय नभएका ठाउँमा अनुगमनको अभावले पनि समस्या आएको पाइन्छ ।
अर्काेतिर निजी क्षेत्रका व्यापारीसँग प्रतिस्पर्धा गर्नुपर्ने भएकाले यी पसल चल्न गाह्रो भएको केहीको गुनासो छ । निजी व्यापारीले एकैचोटी सामान किनी ‘स्टक’ राखेर पछि महँगोमा बेच्दछन् तर सुपथ पसललाई भने सामान किन्नै धौधौै भएकाले गरिब जनताको पक्षमा काम गर्न नपाएको गुनासो गर्छन यसैक्षेत्रमा संलग्न गोरखाका कृष्णप्रसाद द्यौराली ।
एकीकृत नेकपा माओवादीको कृषि तथा सहकारी विभागका केन्द्रीय सदस्य केशवप्रसाद नेपाल पनि सरकारले थप अनुदान नछुट्ट्याएकाले यी पसलहरू ‘मर्नु न बाँच्नु’को स्थितिमा पुगेको देख्छन ।
एकीकृत नेकपा माओवादीको सरकारका पालामा सहकारीलाई वित्तीय, उपभोक्ता र उत्पादनसँग जोडेर सुपथ पसलमार्फत जनतालाई राहत दिने कार्यक्रम ल्याउने योजना हुँदाहुँदै पूरा हुन नपाएको बताउँदै उनले भने ‘यो सरकारले पूर्वाग्रही नभई यी पसलहरूलाई व्यवस्थित बनाउन ठोस नीति ल्याउनुपर्छ ।’
सहकारी विभागका रजिष्ट्रार ढकालको विचारमा पनि प्रमुख जिल्ला अधिकारीको नेतृत्वमा स्थानीय विकास अधिकारी र प्रहरी प्रमुखसहितको अनुगमन संयन्त्र बनाइएमा, जिल्ला सहकारी संघहरूबाट थोकमूल्यमा सस्तो मूल्यका सामान उपलव्ध, सहकारीले नै वस्तु उत्पादन, सरकारले थप बजेट निकासा र सरल कर्जा (सस्तो ब्याजदर) मा ऋण उपलव्ध गराएमा यी पसलहरू अझ प्रभावकारी बन्न सक्नेछन् ।
उनिहरुजस्तै यस क्षेत्रमा क्रियाशील व्यक्तिहरू र न्यून आर्थिक स्तर भएका लाखौं उपभोक्ताहरू केन्द्रीय भण्डारणमार्पmत वस्तु आपूर्ति सहज भएमा, यी पसलको उचित नियमन र अनुगमन गरिएमा, सामानको गुणस्तर, शुद्धता र तौलको नियमित नापजाँच भएमा, मूल्यमा एकरूपता ल्याइएमा र थप बजेट निकासा गरिएमा सुपथ मूल्यका पसलहरू प्रभावकारी बन्नेमा ढुक्क छन् ।
काठमाडाँ १६ भदौ । गोरखा जिल्ला मिरकोट गाविस–८ की अमृता थापा घरमा चिनी, चियापत्ती, साबुन, टुथपेस्टजस्ता दैनिक आवश्यकताका सामान सकिनासाथ पुगिहाल्छिन् घरदेखि १५ मिनेट टाढा रहेको ‘सहिद दिदी सुपथ मूल्य सहकारी पसल’मा ।
यो पसल खुल्नु पहिले उनी सधँ हरेक सामान निजी पसलबाट किन्ने गर्थिन् । अहिले भने उनी अरू पसल जान्नन् । किनभने उनी आफूलाई चाहिने सामान सुपथ मूल्य पसलबाट सुपथ मूल्यमै पाउँछिन् ।
मूल्यमा अनावश्यक बहस गरिरहन नपर्ने र आफूलाई ठगिएको महसुस नहुने भएकाले सुपथ मूल्य पसलमा नै सामान किन्दा आफूलाई ढुक्क हुने उनको अनुभव छ ।
अमृता मात्र होइन, यो गाविसका धेरैजसो उपभोक्ता यही पसलबाट उपभोग्य सामग्री किन्ने गर्दछन् । उनीहरू यी पसलमै जानुको कारण पनि अमृताकै जस्तो छ ।
सरकारले आर्थिक वर्ष २०६५÷०६६ मा उपलब्ध गराएको रु. एक लाखमा सो गाविसका ९५ घरपरिवारले रु. पाँच–पाँचसय थपेर एकवर्ष पहिले खोलेको सो सुपथ मूल्य पसल अहिले सबैको प्रिय बनेको छ । यद्यपि एकीकृत नेकपा माओवादीको सरकारकापालामा आएको कार्यक्रम भएकाले र एकीकृत माओवादीका स्थानीय कार्यकर्ताको बढी सक्रियतामा खोलिएकाले कसै–कसैले यो पसललाई ‘माओवादी पसल’ पनि भन्ने गरेको सो क्षेत्रका उपभोक्ता बताउँछन् ।
तत्कालीन अर्थमन्त्री डा.बाबुराम भट्टराइले देशभरका तीन हजार ९१५ गाविस र प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्रमा ३० हजार जनसङ्ख्यामा एक– एकवटा गरी सुपथ मूल्य सहकारी पसल खोल्न रु. एक–एक लाखका दरले रकम दिने कार्यक्रम ल्याएका थिए ।
यसका लागि रु. ४० करोड विनियोजन गरिएको थियो । यसमा आर्थिक वर्ष २०६५÷०६६ मा तीन हजार २१९ वटा सुपथ मूल्यका सहकारी पसल सञ्चालन गर्ने गरी रु. ३२ करोड ६३ लाख रकम खर्च भएको थियो ।
सोही रकमका आधारमा आर्थिक वर्ष २०६६÷०६७ मा रु. आठ करोड ४० लाख विनियोजन गरिएकोमा ३१२ वटा संस्थालाई रु. एक लाखको दरले रु. तीन करोड १२ लाख निकासा गरिएको र बाँकी रु. पाँच करोड २८ लाख रकम अझै निकासा हुन नसकेको कृषि तथा सहकारी मन्त्रालय सहकारी विभागले हालै सार्वजनिक गरेको वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन–२०६६ मा उल्लेख छ ।
सुपथ मूल्य सहकारी पसल नियमावली, २०६५ मा सहकारी पसल सञ्चालन गर्न केन्द्रमा कृषि तथा सहकारीमन्त्रीको अध्यक्षतामा उच्चस्तरीय समन्वय समिति र जिल्लास्तरमा जिल्ला विकास समितिको सभापतिको अध्यक्षतामा जिल्ला पसल सञ्चालन तथा अनुगमन समिति गठन गर्ने व्यवस्था गरिएको थियो ।
स्थानीयस्तरमा यस्ता पसल सञ्चालन गर्न चाहने सहकारी संस्था दर्ता गर्ने अधिकार अस्थायीरूपमा तीन महिनाका लागि सम्बन्धित जिल्लाको प्रमुख जिल्ला अधिकारीलाई प्रदान गरिएको थियो ।
सोही कार्यक्रमअनुसार मनाङ जिल्लामाबाहेक बाँकी सबै ७४ जिल्लामा गरी चार हजारमध्ये तीन हजार २६३ वटा सुपथ मूल्य पसल खोलिएका छन् । यी पसल देशका धेरैजसो जिल्लामा प्रभावकारी बनेको र केही जिल्लामा प्रभावकारी बन्न नसकेको सहकारी विभागले जनाएको छ ।
सहकारी विभागका रजिष्ट्रार सुदर्शनप्रसाद ढकाल तराई र हिमालीभन्दा पहाडी जिल्लामा खोलिएका सुपथ पसलहरू बढी राम्ररी चलेको बताए ।
उनका अनुसार तराईका कतिपय जिल्लामा केही आपराधिक समूहले समेत यी पसल खोल्न सरकारले उपलब्ध गराएको बजेट दुरूपयोग गरेको पाइएको छ ।
यद्यपि सरकारले उपलब्ध गराएको रु. एक लाख रकममा रु. १० लाख थपेर जुम्ला जिल्लाका जनताले सदरमुकाम खलङ्गामा आफ्नै भवन समेत निर्माण गरेर पसल चलाएको उदाहरण दिँंदै रजिष्ट्रार ढकाल थप्छन ‘सबै ठाउँमा राम्रो सबै ठाउँमा नराम्रो नभनौं, आधा राम्रो, आधा नराम्रो भनौं ।’
डिभिजन सहकारी कार्यालय, धनकुटाका प्रमुख बेनी केसी आफ्नो जिल्लाका ३५ गाविस र एउटा नगरपालिकामा रहेका एक एकवटा गरी ३६ वटा सुपथ मूल्य सहकारी पसलहरू निकै प्रभावकारी बनेको जिकिर गरे । उनका अनुसार पूर्वाञ्चलका तेह्रथुम, सङ्खुवासभा र भोजपुरमा खोलिएका सबै पसलहरू निकै प्रभावकारी बनेका छन् ।
देशका ३८ वटा जिल्लाका डिभिजन सहकारी जिल्ला कार्यालयका प्रमुखमध्ये धेरैजसोले यी पसल प्रभावकारी बनेको बताउँदै सरकारले थप रकम विनियोजन गर्नुपर्नेमा जोड दिएका थिए ।
यता डिभिजन सहकारी कार्यालय बाग्लुङका प्रमुख विष्णु सुवेदी धौलागिरि अञ्चलमा रहेका यस्ता पसल खासै प्रभावकारी बन्न नसकेको अनुभव सुनाउछन ।
उनका अनुसार कतिपयले ‘माओवादी पसल’ भनिदिँंदा, एकीकृत माओवादीका कार्यकर्ताले आफ्नै पार्टीको पसलजस्तो ठानिदिँंदा, सहकारीको भावनाअनुसार पसल व्यवस्थापन नहुँदा र अरू पसल जस्तो उधारोमा नचल्ने हुँदा यी पसल सोचेजस्तो प्रभावकारी बन्न नसकेका हुन् ।
नियन्त्रण र निर्धारित मूल्य हुने भएकाले यी पसल निम्नस्तरका जनताका लागि भने नभै नहुने सुवेदीको भनाइ छ ।
उनको विचारमा सरकारले विगतमा खोलेका ८३० जति पुराना सहकारी पसललाई समेत महत्व दिएमा यस्ता पसल निकै प्रभावकारी बन्न सक्ने छन् । रजिष्ट्रार ढकाल विभागको आफ्नै कार्यालय भएको जिल्लाका सहकारी पसल राम्ररी चलेको र कार्यालय नभएका ठाउँमा भने सोचे अनुसार चल्न नसकेको पाइएको अनुभव सुनाउछन । कार्यालय नभएका ठाउँमा अनुगमनको अभावले पनि समस्या आएको पाइन्छ ।
अर्काेतिर निजी क्षेत्रका व्यापारीसँग प्रतिस्पर्धा गर्नुपर्ने भएकाले यी पसल चल्न गाह्रो भएको केहीको गुनासो छ । निजी व्यापारीले एकैचोटी सामान किनी ‘स्टक’ राखेर पछि महँगोमा बेच्दछन् तर सुपथ पसललाई भने सामान किन्नै धौधौै भएकाले गरिब जनताको पक्षमा काम गर्न नपाएको गुनासो गर्छन यसैक्षेत्रमा संलग्न गोरखाका कृष्णप्रसाद द्यौराली ।
एकीकृत नेकपा माओवादीको कृषि तथा सहकारी विभागका केन्द्रीय सदस्य केशवप्रसाद नेपाल पनि सरकारले थप अनुदान नछुट्ट्याएकाले यी पसलहरू ‘मर्नु न बाँच्नु’को स्थितिमा पुगेको देख्छन ।
एकीकृत नेकपा माओवादीको सरकारका पालामा सहकारीलाई वित्तीय, उपभोक्ता र उत्पादनसँग जोडेर सुपथ पसलमार्फत जनतालाई राहत दिने कार्यक्रम ल्याउने योजना हुँदाहुँदै पूरा हुन नपाएको बताउँदै उनले भने ‘यो सरकारले पूर्वाग्रही नभई यी पसलहरूलाई व्यवस्थित बनाउन ठोस नीति ल्याउनुपर्छ ।’
सहकारी विभागका रजिष्ट्रार ढकालको विचारमा पनि प्रमुख जिल्ला अधिकारीको नेतृत्वमा स्थानीय विकास अधिकारी र प्रहरी प्रमुखसहितको अनुगमन संयन्त्र बनाइएमा, जिल्ला सहकारी संघहरूबाट थोकमूल्यमा सस्तो मूल्यका सामान उपलव्ध, सहकारीले नै वस्तु उत्पादन, सरकारले थप बजेट निकासा र सरल कर्जा (सस्तो ब्याजदर) मा ऋण उपलव्ध गराएमा यी पसलहरू अझ प्रभावकारी बन्न सक्नेछन् ।
उनिहरुजस्तै यस क्षेत्रमा क्रियाशील व्यक्तिहरू र न्यून आर्थिक स्तर भएका लाखौं उपभोक्ताहरू केन्द्रीय भण्डारणमार्पmत वस्तु आपूर्ति सहज भएमा, यी पसलको उचित नियमन र अनुगमन गरिएमा, सामानको गुणस्तर, शुद्धता र तौलको नियमित नापजाँच भएमा, मूल्यमा एकरूपता ल्याइएमा र थप बजेट निकासा गरिएमा सुपथ मूल्यका पसलहरू प्रभावकारी बन्नेमा ढुक्क छन् ।
दाईजो कै कारण श्रीमानबाट अलग saptari 23 Aug.10
Written by तराई नेपाल
शुभ नारायण यादव
सप्तरी,०६ भादौ ।
छोरीलाई बिबाहपछि राम्ररी पालन पोषण गर्ने आशाले छोरीका हात आफ्ना ज्र्वाको हातमा राखेर एक लाख रुपैया आठ आना सुन र बिभिन्न सरसामान दहेज सहित अन्जुका आमा बुबाले छारीको बिबाह गरेर पठाएका थिए । सुखको आशा गरेकी मन्जुले बिबाह पछि आशु नझारी खान पाईनन तयो पनि आधा पेट । अन्जुकी कान्छी छोरी सातबर्षकी छन ।
तर दाईजो नल्याएको भन्दै अन्जुले श्रीमानबाट आँखामा भुस खादीदिने खानामा गिटी बालुवा खन्याई दिने खाना बनाउदा चुल्लो भत्काएको कुरा सम्झदै मन्जु बोल्दा बोल्दै भक्कानो फुटाएर रुदै भन्छिन मन्जु सुखको दिन कहिल्यै आएन ।
उनी अगाडी भनिछन जहिले देखि मेरो बिबाह भयो तहिले देखि मलाई कहिल्यै राम्ररी राखेन दाईजो लिएर आईज अनि बस्न दिन्छु भनदै सधै दारु भाङ खाएर मलाई पिट्थ्यो । नत नागरिकता बनाई दिन्छ न त केही गरि दिन्छ कुट्छ पिट्छ जा पैसा लिएर आईज माईतीबाट अनि मात्र राख्छ भन्छ । बिबाह गरेर नै जीबन गुजारा गरिरहेकी छु तीन जन छोरा छारी भईसके तर अझै पनि साडीमा ब्लेड ले काटी दिनछ ।।खाना पकाउदा चुद्यहो फुटाई दिन्छ खानामा गिटी पथ्थर हालि दिन्छ । आँखामा भुस हाली दिन्छ । नागरिकता बनाई माँग्दा कुट्छ पिट्छ बस्न दिन्द तलाई मैले बिबाह गरेको छैन भन्छ । मैले तँ संग बच्चा जन्माएको छैन । पैसालिएर आईज अनि राख्छु भन्छ । कति पैसा लिएर आउन भन्नु हुन्छ ।
एक लाख रुपैया गनेर मेरो बिबाह भएको छ । मेरो बुबा पनि मरिसक्नु भयो अब फेरी एक लाख रुपैया कहाबाट ल्याएर दिनु अनि म त्यस घरमा बस्नु तीन वटा बच्चा भईसके अब म कहा जाँउ फेरी माईतीबाट एक लाख दहेज ल्याएपछि बस्न दिन्छु भन्टछक्। तरो बुबाले बिबाहमा दिएको पैसा त मेरो बुबालाई दिएको छ मलाई दिएको छैन अब मलाई दिनु पर्छ यस्तै मन मनसन्की कुरा गर्छ बिबाह भएको प्रमाण देखा बच्चा जन्माएको प्रमाण देखा भन्छ । म तलाई राख्दिन भन्छ । र म धेरै बर्ष देखि माईतीमा छु ।
बिबाह भएको चार बर्ष भयो तर सुकुमार कुमारी शाह हहिले पनि माईतीमा नै बस्न बाध्य छन ् । दाईजो माँग गर्दै सुकुमार कुमारी लाई ससुरा पक्षले बच्चा पेटमा भएको समयमा नै घरबाट निकालिदियो । कारण हो दाईजो बिबाहमा एक लाख रुपैया र तीन तोला सुन सरसमान दिए पनि जग्गा माँग गर्दै ससुरा पक्षले घरमा बस्न दिएनन् । बिबाह भएको तीन महिना देखि यातना शुरु भयो अनि नौ महिना भएपछि पेटमा भएको बच्चा समेत मार्छु भनेर यातना दिन थाले पछि सुकुमार कुमारी चारबर्षदेखि माईतीमा नै बसेको बताउछीन सुमार कुमारी शाह सुकुमार कुमार कुमारी शाहको आवाज
शाह क्बिलाषा गाबिस वडा नंबर तीन बस्ने शैलेन्द्र शाहसंग मेरो बिबाह भएको दाईजोमा मेरो बुबाले एक कठा जग्गा सुन तीन तोला र सामान थ्यो अनि बिहे पछि फेरी तीन तोला सुन एक लाखरुपैया र एक कठा जग्गा मागेको थ्यो बिबाह पछि तैले दाईजो ल्याईनस भने के गर्छु भननु हुन्थ्यो दाईजो ल्याईनस भने तेरो पेटको बच्चा राजबिराज लगेर मारिदिन्छु अपरेसनन गरेर झिकी दिन्छु मारि दिन्छु त्यसैले बाबुसंग छिटो गएर पैसाा माँगेर लिएर आईज भन्थ्यो धम्की दिन्थ्यो बच्चा हुने टाईममा मलाई मेरो श्रीमानले आदिबाटोमा लगर छोडी दियो अनि म माईती गएर बसे दाईजो कारणले म मात्र होईन म ेरो देउरानी संग बिबाह गरेको मेरो देवरले पनि देउरानीसंग छोडपत्र गरेको छ ईन्डियाको सुपौलबाट प्रेम बिबाह गरीन सन्जनले सप्तरीको इनर्वामा तर माँगेर बिबाह गरेको भए पाँच सात लाख दाईजो आउने थियो भन्दै ससु ा सासु नन्दले सन्जनलाई यातदिन थालेै । पटक पटक अपहरण गर्न मान्छे लगाएबिबाह भएको सात दिनदेखि नै सन्जनको श्रीमानलाई ससुरा पक्षले गायब गराएका छन ्। श्रीमान कहाँछ थाहा छैन बिहे गरेको पाँच बर्ष बिति सक्दा पनि सात लाख दाईजो ल्याए मात्र बस्न दिने भन्छन दाइजोका कारण सन्जनले धेरै यातना भोगेकी छन ।
उनी आखाभरी आसु पार्दै रुदै भन्छिन –मैले लब म्यारिज बिबाह गरेकाले दहेज पाएनन् । त्यसैले मलाई धरै दुख दिन्छन् । मलाई अपहरण गर्न मान्छे पठाए धेरै पिट्छन ् । एक पटक धेरै पिटे अनि म अस्पतालमा भर्ना भए अनि उनीहरुलाई पनि ठानामा थुने । अनि उसको लागी केही गर्छे ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छु भन्यो तर केही गर्दैन न त ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छ नत खान खर्च केही दिदैन न त घरमा बस्न दिन्छन ् । न त नागरिकता बनाई दिन्छछ बिबाह लब म्यारिज गरेकाले एिनौ बिबाह पछि मेरी एउटी ननद छन ् । क् उनलाई हामीले फोन गरेर आउदै छौ भन्योैत्उसपछि ननद रुन थालिन सासु ससुरा सब रुन थाले किन दाईजो नलिई बिबाह गरेको भनन थाले तैले यसलाई राखिस भने बिष खाएर मर्छु तैले दाइजाबिना बिबाह गरि भनदै सबै रुन थाले उसैको र्बनीको कारणले मेरो श्रीमान अहिले सम्म बेपता छ मलाई पनि केही हेर्दैन ।
हाल सप्तरीका २० महिला मध्ये एक महिला दाईजोबाट पिडित छन ् ।सप्रीको बिष्हरियाकी रेखा चौधरीको पिडा पनि उस्तै छ । छ रेखाको पनि सात बर्ष अघि बिबाह भयो सुनसरीको पच्मि कुसाहामा मागे जति दाईजो नल्याएको भन्लै रेखालाई सासु ससुरा र श्रीमानले यातना दिन थाले पेटमा बच्चा हुदा सुत्केरी गराउने पैसा माईतीबाट लिएर आईज नत्र तेरो बच्चा मारि दिन्छै भन्थे रेखाको सासु ससुराले माईती जाँदै पिच्छे बिबाहमा कम दाईजो ल्याएको भन्दै पाँच हजार दश हजार दाइजो माँग गरे अन्त्यमा पेटमा भएको बचलाई नै मारिदिने भने पछि रेखाले ससुरको घर छोडिन र सात बर्ष दखि माईतीमा नै छन ।
उनी अगाडि भन्छिन् ः–मलाई दहेज ४५ हजार माँगेको थियो त्यसमा बुबाको भनाई अनुसार २५ हजार दिनु भएको उनीहरुको भनाई अनुसार १५ हजार मात्र दिएको छ भन्छ । तेरो बुबाले दाईजो दिएन भन्दै कुटपीट गर्छन् ।गाली गलौज गर्छन ् । बुबासंग पैसा मागेर लिएर आईज भन्छ । बुबा पनि किड्नीको बिरामी हुनुहुन्थ्यो । पैसाा पनि दिन सक्नु भएन कुनै पटक दश हजार कुनै पटक पाँच हजार लिएर लिएर आईज भन्थ्यो । बच्चा पेटमा हुदा जा पैसा लिएर आईज तलाई बिना अपरेन बच्चा हुदैन जा पैसा लिएर आईज अनि हुद मात्र घरमा बस्नु भन्थ्यो । यस्तै यातना दिन थाल्यो अनि म पेटमा बच्चा ै माईत आएर बस्न थाले माईतीमा नै छोरा भयो बचलाई मारिदिन्छु भन्न थालो र म ६ बर्ष देखि माईतीमा नै बस्छु तर मेरोभाईले भन्यो म कमाउने भएपछि मेरो बुबाले ४५ हजार रुपैया दिन्छु भन्नु भएको भएको छ भने म एकान्न हजार रुपैया दिन्छु भनो । तर उनीहरुले मानेनन् ।
यता आफु संग पैसा र पहुच नभएकोले कतै आफुलाई परेको अन्यायका बिरुद्ध केश नदिएको बताउन रेखाले प्रहरीलाई जाहेरी दिनु भएन ? मेरो कुनै प्रमाणै छैन । न बिबाह दर्ता छ । प्रमाणै नभएकाले मैले कही पनि केश दिएको छैन । गाँउलेहरुले मलाई भर गएको बेला केश दे म पनि सहयोग गर्छु भने तर म संग त्यति पैसा पनि छैन केश दिनको लागी नजिक भएको भए त म हिडेर पनि जान सक्थे । तर त्यहा त जान आउन दुई सय रुपैया लाग्छ फेरी मेरा े बुबा भाई पनि हुनु हुन्न । नकसैलाई मैले चिनेकी छु एउटा बिधुवा आमा हुनु हुन्छ । फेरी सानो छोरालाई छोडेर कहा जाने एक्लै ।संस्थाको पहलमा दाईजो घटनामा कमी आएको बताउनु हुन्छ महिला हिंसा सम्बन्धी काम गर्ने संथा हुेक सप्तरीकी उपाध्यक्ष उमा पोख्रेल संस्थाले संचालन गरेको पारालिगल प्रोग्रामले ३३ गाबिस र एक नगरपालिकाका महिलामा लुकेर बसेका महिला माथि भएका घटना बाहिर ल्याउन थालेको बताउनु हुन्छ ।यस्ता घटनामा बोल्नसक्ने कुरा उठाउने हिम्मत आएको बताउनु हुन्छ उमा पोखरेल ।
तराईमा भनौ न झा बाहुन देब जी यसमा चाहि दहेज प्रथा भनेको भयङ्कर ठूलो रोग हो जसको ईलाज हुदैन जो अन्तिममा मर्छ नै । त्यस्तो किसिमको रोग हो यो एउटा दहेजलाई जतिसुकै चाहेर पनि उन्मुलन गर्न खोज्यौ होईन बिभिन्न संघ संस्था हामी पनि त्यसै बिरुद्ध लागी परेका छै । केही कमी आएको छ तर यो चाहिने यसलाई सम्पूर्ण रुपले निकनलेर फ्याक्न अझै २५ , ३० बर्ष लाग्छ । सप्तरी जिल्लामा महिलाको उपरमा भने कुनै एनजीओ थिएन पारा लिगल पोग्राम जब आयो अनि महिला र बालबालिकाको क्षेत्रमा नै काम गर्ने भनेर संस्था भनेर महिला दिदि बहिनी थाहा पाए पछि यस्ता कुरा जो दाइजो कुटपीट रेप केश धेरै यस्ता बिबाद थिए ती कुरा पहिला लुकेको अबस्थामा थिए यी केश हरु अब सुन्ने ठाँउ छ पोख्ने ठाँउ छ भन्ने थाहा पाएपछि वहाहरुले उठाउन थाल्नु भएको छ ती गाबिसका महिलाहरुले धेरै नजानेका मबझेका महिलाको मुखमा आवाज आएको छ । हामीले न्याय पाउछौ भन्ने कुरामा बिश्वास भएका छौ ।
तराईमा झा बाहुन र देबजी समुदायमा दाईजो लेनदेन धेरै हुन्छ भन्नु हुन्छ कानुन ब्यबसायी उमाशंकर देब एसएलसी पास गरेको केटालाई पाँच लाख रुपैया रेट नै जस्तो भएको छ जति पढाई बढ्दै जान्छ त्यति नै रेट पनि बढ्दै जाने बताउनु हुन्छ उमा शंकर देब ।
देबले अहिले समाजमा सबभन्दा ठूलो बिक्रिती दहेज छ यहाँ दहेजले जरा गाडी सकेको छ । यो मधेशी समुदायमा यहा एस एल सी पास गर्ने केटा भयो भने त्यसको रेट पाँच लाख रुपैया फिक्स भई सकेको हुनछ । गोरु ज्स्तै यहा मान्छे खरिद बिक्री हुन्छ ।एउटाले पाँच लाख दिउो भने देखि अर्कोले ६ लाख दिन खोज्छ । यहा दाईजो कै कारण महिलाहरु ीहंसामा परेका छन ् । देबजी समुदायमा सबभन्दा बढी दहेज लेनदेन हुन्छ । कसैले दहेजमा कार दिन्छ कार दियो भने मेरो छोरा पनि ईन्जीनियर हो मलाई पनि कार चाहियो भनेर डिमान्ड हुन्छ । डाक्टर इन्जीनियर भयो भने १६ देखि २० लाख रुपैया सम्म रेट छ ।
एम बी बिएस केटाले त नपढेकी केटी बिबाह गर्दैन पढेकी केटी भए पनि दाम त्यही हो । रेट त्यही हो पढे लेखेकी केटी भए पनि त्यसको बुबाले केटालाई दहेज दिनै पर्छ ।
दाईजोबाट जति पिडित भए पनि उजुरी गर्न प्रशासनमा कोही जाने गरेकाले चलनकै रुपमा सबैले स्वीकारेकाले पनि यो सम्स्या बढ्दै गएको बताउनु हुन्छ उमा शंकर जसले जे गरे पनि हुने र कानुनी राज्य नभएकाले यस्ता घटनामा बृद्धि भएको बताउनु हुन्छ देब ।
हुन त दाईजो कम गर्नका लागी राज्यले नै कडा कानुन बनाएर कडाईका लागु गर्ने हो भने मात्र दहेज लेनदेनको अन्त्य अनि महिला हिंसामा कमी आउने देखिन्छ ।
शुभ नारायण यादव
सप्तरी,०६ भादौ ।
छोरीलाई बिबाहपछि राम्ररी पालन पोषण गर्ने आशाले छोरीका हात आफ्ना ज्र्वाको हातमा राखेर एक लाख रुपैया आठ आना सुन र बिभिन्न सरसामान दहेज सहित अन्जुका आमा बुबाले छारीको बिबाह गरेर पठाएका थिए । सुखको आशा गरेकी मन्जुले बिबाह पछि आशु नझारी खान पाईनन तयो पनि आधा पेट । अन्जुकी कान्छी छोरी सातबर्षकी छन ।
तर दाईजो नल्याएको भन्दै अन्जुले श्रीमानबाट आँखामा भुस खादीदिने खानामा गिटी बालुवा खन्याई दिने खाना बनाउदा चुल्लो भत्काएको कुरा सम्झदै मन्जु बोल्दा बोल्दै भक्कानो फुटाएर रुदै भन्छिन मन्जु सुखको दिन कहिल्यै आएन ।
उनी अगाडी भनिछन जहिले देखि मेरो बिबाह भयो तहिले देखि मलाई कहिल्यै राम्ररी राखेन दाईजो लिएर आईज अनि बस्न दिन्छु भनदै सधै दारु भाङ खाएर मलाई पिट्थ्यो । नत नागरिकता बनाई दिन्छ न त केही गरि दिन्छ कुट्छ पिट्छ जा पैसा लिएर आईज माईतीबाट अनि मात्र राख्छ भन्छ । बिबाह गरेर नै जीबन गुजारा गरिरहेकी छु तीन जन छोरा छारी भईसके तर अझै पनि साडीमा ब्लेड ले काटी दिनछ ।।खाना पकाउदा चुद्यहो फुटाई दिन्छ खानामा गिटी पथ्थर हालि दिन्छ । आँखामा भुस हाली दिन्छ । नागरिकता बनाई माँग्दा कुट्छ पिट्छ बस्न दिन्द तलाई मैले बिबाह गरेको छैन भन्छ । मैले तँ संग बच्चा जन्माएको छैन । पैसालिएर आईज अनि राख्छु भन्छ । कति पैसा लिएर आउन भन्नु हुन्छ ।
एक लाख रुपैया गनेर मेरो बिबाह भएको छ । मेरो बुबा पनि मरिसक्नु भयो अब फेरी एक लाख रुपैया कहाबाट ल्याएर दिनु अनि म त्यस घरमा बस्नु तीन वटा बच्चा भईसके अब म कहा जाँउ फेरी माईतीबाट एक लाख दहेज ल्याएपछि बस्न दिन्छु भन्टछक्। तरो बुबाले बिबाहमा दिएको पैसा त मेरो बुबालाई दिएको छ मलाई दिएको छैन अब मलाई दिनु पर्छ यस्तै मन मनसन्की कुरा गर्छ बिबाह भएको प्रमाण देखा बच्चा जन्माएको प्रमाण देखा भन्छ । म तलाई राख्दिन भन्छ । र म धेरै बर्ष देखि माईतीमा छु ।
बिबाह भएको चार बर्ष भयो तर सुकुमार कुमारी शाह हहिले पनि माईतीमा नै बस्न बाध्य छन ् । दाईजो माँग गर्दै सुकुमार कुमारी लाई ससुरा पक्षले बच्चा पेटमा भएको समयमा नै घरबाट निकालिदियो । कारण हो दाईजो बिबाहमा एक लाख रुपैया र तीन तोला सुन सरसमान दिए पनि जग्गा माँग गर्दै ससुरा पक्षले घरमा बस्न दिएनन् । बिबाह भएको तीन महिना देखि यातना शुरु भयो अनि नौ महिना भएपछि पेटमा भएको बच्चा समेत मार्छु भनेर यातना दिन थाले पछि सुकुमार कुमारी चारबर्षदेखि माईतीमा नै बसेको बताउछीन सुमार कुमारी शाह सुकुमार कुमार कुमारी शाहको आवाज
शाह क्बिलाषा गाबिस वडा नंबर तीन बस्ने शैलेन्द्र शाहसंग मेरो बिबाह भएको दाईजोमा मेरो बुबाले एक कठा जग्गा सुन तीन तोला र सामान थ्यो अनि बिहे पछि फेरी तीन तोला सुन एक लाखरुपैया र एक कठा जग्गा मागेको थ्यो बिबाह पछि तैले दाईजो ल्याईनस भने के गर्छु भननु हुन्थ्यो दाईजो ल्याईनस भने तेरो पेटको बच्चा राजबिराज लगेर मारिदिन्छु अपरेसनन गरेर झिकी दिन्छु मारि दिन्छु त्यसैले बाबुसंग छिटो गएर पैसाा माँगेर लिएर आईज भन्थ्यो धम्की दिन्थ्यो बच्चा हुने टाईममा मलाई मेरो श्रीमानले आदिबाटोमा लगर छोडी दियो अनि म माईती गएर बसे दाईजो कारणले म मात्र होईन म ेरो देउरानी संग बिबाह गरेको मेरो देवरले पनि देउरानीसंग छोडपत्र गरेको छ ईन्डियाको सुपौलबाट प्रेम बिबाह गरीन सन्जनले सप्तरीको इनर्वामा तर माँगेर बिबाह गरेको भए पाँच सात लाख दाईजो आउने थियो भन्दै ससु ा सासु नन्दले सन्जनलाई यातदिन थालेै । पटक पटक अपहरण गर्न मान्छे लगाएबिबाह भएको सात दिनदेखि नै सन्जनको श्रीमानलाई ससुरा पक्षले गायब गराएका छन ्। श्रीमान कहाँछ थाहा छैन बिहे गरेको पाँच बर्ष बिति सक्दा पनि सात लाख दाईजो ल्याए मात्र बस्न दिने भन्छन दाइजोका कारण सन्जनले धेरै यातना भोगेकी छन ।
उनी आखाभरी आसु पार्दै रुदै भन्छिन –मैले लब म्यारिज बिबाह गरेकाले दहेज पाएनन् । त्यसैले मलाई धरै दुख दिन्छन् । मलाई अपहरण गर्न मान्छे पठाए धेरै पिट्छन ् । एक पटक धेरै पिटे अनि म अस्पतालमा भर्ना भए अनि उनीहरुलाई पनि ठानामा थुने । अनि उसको लागी केही गर्छे ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छु भन्यो तर केही गर्दैन न त ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छ नत खान खर्च केही दिदैन न त घरमा बस्न दिन्छन ् । न त नागरिकता बनाई दिन्छछ बिबाह लब म्यारिज गरेकाले एिनौ बिबाह पछि मेरी एउटी ननद छन ् । क् उनलाई हामीले फोन गरेर आउदै छौ भन्योैत्उसपछि ननद रुन थालिन सासु ससुरा सब रुन थाले किन दाईजो नलिई बिबाह गरेको भनन थाले तैले यसलाई राखिस भने बिष खाएर मर्छु तैले दाइजाबिना बिबाह गरि भनदै सबै रुन थाले उसैको र्बनीको कारणले मेरो श्रीमान अहिले सम्म बेपता छ मलाई पनि केही हेर्दैन ।
हाल सप्तरीका २० महिला मध्ये एक महिला दाईजोबाट पिडित छन ् ।सप्रीको बिष्हरियाकी रेखा चौधरीको पिडा पनि उस्तै छ । छ रेखाको पनि सात बर्ष अघि बिबाह भयो सुनसरीको पच्मि कुसाहामा मागे जति दाईजो नल्याएको भन्लै रेखालाई सासु ससुरा र श्रीमानले यातना दिन थाले पेटमा बच्चा हुदा सुत्केरी गराउने पैसा माईतीबाट लिएर आईज नत्र तेरो बच्चा मारि दिन्छै भन्थे रेखाको सासु ससुराले माईती जाँदै पिच्छे बिबाहमा कम दाईजो ल्याएको भन्दै पाँच हजार दश हजार दाइजो माँग गरे अन्त्यमा पेटमा भएको बचलाई नै मारिदिने भने पछि रेखाले ससुरको घर छोडिन र सात बर्ष दखि माईतीमा नै छन ।
उनी अगाडि भन्छिन् ः–मलाई दहेज ४५ हजार माँगेको थियो त्यसमा बुबाको भनाई अनुसार २५ हजार दिनु भएको उनीहरुको भनाई अनुसार १५ हजार मात्र दिएको छ भन्छ । तेरो बुबाले दाईजो दिएन भन्दै कुटपीट गर्छन् ।गाली गलौज गर्छन ् । बुबासंग पैसा मागेर लिएर आईज भन्छ । बुबा पनि किड्नीको बिरामी हुनुहुन्थ्यो । पैसाा पनि दिन सक्नु भएन कुनै पटक दश हजार कुनै पटक पाँच हजार लिएर लिएर आईज भन्थ्यो । बच्चा पेटमा हुदा जा पैसा लिएर आईज तलाई बिना अपरेन बच्चा हुदैन जा पैसा लिएर आईज अनि हुद मात्र घरमा बस्नु भन्थ्यो । यस्तै यातना दिन थाल्यो अनि म पेटमा बच्चा ै माईत आएर बस्न थाले माईतीमा नै छोरा भयो बचलाई मारिदिन्छु भन्न थालो र म ६ बर्ष देखि माईतीमा नै बस्छु तर मेरोभाईले भन्यो म कमाउने भएपछि मेरो बुबाले ४५ हजार रुपैया दिन्छु भन्नु भएको भएको छ भने म एकान्न हजार रुपैया दिन्छु भनो । तर उनीहरुले मानेनन् ।
यता आफु संग पैसा र पहुच नभएकोले कतै आफुलाई परेको अन्यायका बिरुद्ध केश नदिएको बताउन रेखाले प्रहरीलाई जाहेरी दिनु भएन ? मेरो कुनै प्रमाणै छैन । न बिबाह दर्ता छ । प्रमाणै नभएकाले मैले कही पनि केश दिएको छैन । गाँउलेहरुले मलाई भर गएको बेला केश दे म पनि सहयोग गर्छु भने तर म संग त्यति पैसा पनि छैन केश दिनको लागी नजिक भएको भए त म हिडेर पनि जान सक्थे । तर त्यहा त जान आउन दुई सय रुपैया लाग्छ फेरी मेरा े बुबा भाई पनि हुनु हुन्न । नकसैलाई मैले चिनेकी छु एउटा बिधुवा आमा हुनु हुन्छ । फेरी सानो छोरालाई छोडेर कहा जाने एक्लै ।संस्थाको पहलमा दाईजो घटनामा कमी आएको बताउनु हुन्छ महिला हिंसा सम्बन्धी काम गर्ने संथा हुेक सप्तरीकी उपाध्यक्ष उमा पोख्रेल संस्थाले संचालन गरेको पारालिगल प्रोग्रामले ३३ गाबिस र एक नगरपालिकाका महिलामा लुकेर बसेका महिला माथि भएका घटना बाहिर ल्याउन थालेको बताउनु हुन्छ ।यस्ता घटनामा बोल्नसक्ने कुरा उठाउने हिम्मत आएको बताउनु हुन्छ उमा पोखरेल ।
तराईमा भनौ न झा बाहुन देब जी यसमा चाहि दहेज प्रथा भनेको भयङ्कर ठूलो रोग हो जसको ईलाज हुदैन जो अन्तिममा मर्छ नै । त्यस्तो किसिमको रोग हो यो एउटा दहेजलाई जतिसुकै चाहेर पनि उन्मुलन गर्न खोज्यौ होईन बिभिन्न संघ संस्था हामी पनि त्यसै बिरुद्ध लागी परेका छै । केही कमी आएको छ तर यो चाहिने यसलाई सम्पूर्ण रुपले निकनलेर फ्याक्न अझै २५ , ३० बर्ष लाग्छ । सप्तरी जिल्लामा महिलाको उपरमा भने कुनै एनजीओ थिएन पारा लिगल पोग्राम जब आयो अनि महिला र बालबालिकाको क्षेत्रमा नै काम गर्ने भनेर संस्था भनेर महिला दिदि बहिनी थाहा पाए पछि यस्ता कुरा जो दाइजो कुटपीट रेप केश धेरै यस्ता बिबाद थिए ती कुरा पहिला लुकेको अबस्थामा थिए यी केश हरु अब सुन्ने ठाँउ छ पोख्ने ठाँउ छ भन्ने थाहा पाएपछि वहाहरुले उठाउन थाल्नु भएको छ ती गाबिसका महिलाहरुले धेरै नजानेका मबझेका महिलाको मुखमा आवाज आएको छ । हामीले न्याय पाउछौ भन्ने कुरामा बिश्वास भएका छौ ।
तराईमा झा बाहुन र देबजी समुदायमा दाईजो लेनदेन धेरै हुन्छ भन्नु हुन्छ कानुन ब्यबसायी उमाशंकर देब एसएलसी पास गरेको केटालाई पाँच लाख रुपैया रेट नै जस्तो भएको छ जति पढाई बढ्दै जान्छ त्यति नै रेट पनि बढ्दै जाने बताउनु हुन्छ उमा शंकर देब ।
देबले अहिले समाजमा सबभन्दा ठूलो बिक्रिती दहेज छ यहाँ दहेजले जरा गाडी सकेको छ । यो मधेशी समुदायमा यहा एस एल सी पास गर्ने केटा भयो भने त्यसको रेट पाँच लाख रुपैया फिक्स भई सकेको हुनछ । गोरु ज्स्तै यहा मान्छे खरिद बिक्री हुन्छ ।एउटाले पाँच लाख दिउो भने देखि अर्कोले ६ लाख दिन खोज्छ । यहा दाईजो कै कारण महिलाहरु ीहंसामा परेका छन ् । देबजी समुदायमा सबभन्दा बढी दहेज लेनदेन हुन्छ । कसैले दहेजमा कार दिन्छ कार दियो भने मेरो छोरा पनि ईन्जीनियर हो मलाई पनि कार चाहियो भनेर डिमान्ड हुन्छ । डाक्टर इन्जीनियर भयो भने १६ देखि २० लाख रुपैया सम्म रेट छ ।
एम बी बिएस केटाले त नपढेकी केटी बिबाह गर्दैन पढेकी केटी भए पनि दाम त्यही हो । रेट त्यही हो पढे लेखेकी केटी भए पनि त्यसको बुबाले केटालाई दहेज दिनै पर्छ ।
दाईजोबाट जति पिडित भए पनि उजुरी गर्न प्रशासनमा कोही जाने गरेकाले चलनकै रुपमा सबैले स्वीकारेकाले पनि यो सम्स्या बढ्दै गएको बताउनु हुन्छ उमा शंकर जसले जे गरे पनि हुने र कानुनी राज्य नभएकाले यस्ता घटनामा बृद्धि भएको बताउनु हुन्छ देब ।
हुन त दाईजो कम गर्नका लागी राज्यले नै कडा कानुन बनाएर कडाईका लागु गर्ने हो भने मात्र दहेज लेनदेनको अन्त्य अनि महिला हिंसामा कमी आउने देखिन्छ ।
दाईजो कै कारण श्रीमानबाट अलग saptari 23 Aug.10
Written by तराई नेपाल
शुभ नारायण यादव
सप्तरी,०६ भादौ ।
छोरीलाई बिबाहपछि राम्ररी पालन पोषण गर्ने आशाले छोरीका हात आफ्ना ज्र्वाको हातमा राखेर एक लाख रुपैया आठ आना सुन र बिभिन्न सरसामान दहेज सहित अन्जुका आमा बुबाले छारीको बिबाह गरेर पठाएका थिए । सुखको आशा गरेकी मन्जुले बिबाह पछि आशु नझारी खान पाईनन तयो पनि आधा पेट । अन्जुकी कान्छी छोरी सातबर्षकी छन ।
तर दाईजो नल्याएको भन्दै अन्जुले श्रीमानबाट आँखामा भुस खादीदिने खानामा गिटी बालुवा खन्याई दिने खाना बनाउदा चुल्लो भत्काएको कुरा सम्झदै मन्जु बोल्दा बोल्दै भक्कानो फुटाएर रुदै भन्छिन मन्जु सुखको दिन कहिल्यै आएन ।
उनी अगाडी भनिछन जहिले देखि मेरो बिबाह भयो तहिले देखि मलाई कहिल्यै राम्ररी राखेन दाईजो लिएर आईज अनि बस्न दिन्छु भनदै सधै दारु भाङ खाएर मलाई पिट्थ्यो । नत नागरिकता बनाई दिन्छ न त केही गरि दिन्छ कुट्छ पिट्छ जा पैसा लिएर आईज माईतीबाट अनि मात्र राख्छ भन्छ । बिबाह गरेर नै जीबन गुजारा गरिरहेकी छु तीन जन छोरा छारी भईसके तर अझै पनि साडीमा ब्लेड ले काटी दिनछ ।।खाना पकाउदा चुद्यहो फुटाई दिन्छ खानामा गिटी पथ्थर हालि दिन्छ । आँखामा भुस हाली दिन्छ । नागरिकता बनाई माँग्दा कुट्छ पिट्छ बस्न दिन्द तलाई मैले बिबाह गरेको छैन भन्छ । मैले तँ संग बच्चा जन्माएको छैन । पैसालिएर आईज अनि राख्छु भन्छ । कति पैसा लिएर आउन भन्नु हुन्छ ।
एक लाख रुपैया गनेर मेरो बिबाह भएको छ । मेरो बुबा पनि मरिसक्नु भयो अब फेरी एक लाख रुपैया कहाबाट ल्याएर दिनु अनि म त्यस घरमा बस्नु तीन वटा बच्चा भईसके अब म कहा जाँउ फेरी माईतीबाट एक लाख दहेज ल्याएपछि बस्न दिन्छु भन्टछक्। तरो बुबाले बिबाहमा दिएको पैसा त मेरो बुबालाई दिएको छ मलाई दिएको छैन अब मलाई दिनु पर्छ यस्तै मन मनसन्की कुरा गर्छ बिबाह भएको प्रमाण देखा बच्चा जन्माएको प्रमाण देखा भन्छ । म तलाई राख्दिन भन्छ । र म धेरै बर्ष देखि माईतीमा छु ।
बिबाह भएको चार बर्ष भयो तर सुकुमार कुमारी शाह हहिले पनि माईतीमा नै बस्न बाध्य छन ् । दाईजो माँग गर्दै सुकुमार कुमारी लाई ससुरा पक्षले बच्चा पेटमा भएको समयमा नै घरबाट निकालिदियो । कारण हो दाईजो बिबाहमा एक लाख रुपैया र तीन तोला सुन सरसमान दिए पनि जग्गा माँग गर्दै ससुरा पक्षले घरमा बस्न दिएनन् । बिबाह भएको तीन महिना देखि यातना शुरु भयो अनि नौ महिना भएपछि पेटमा भएको बच्चा समेत मार्छु भनेर यातना दिन थाले पछि सुकुमार कुमारी चारबर्षदेखि माईतीमा नै बसेको बताउछीन सुमार कुमारी शाह सुकुमार कुमार कुमारी शाहको आवाज
शाह क्बिलाषा गाबिस वडा नंबर तीन बस्ने शैलेन्द्र शाहसंग मेरो बिबाह भएको दाईजोमा मेरो बुबाले एक कठा जग्गा सुन तीन तोला र सामान थ्यो अनि बिहे पछि फेरी तीन तोला सुन एक लाखरुपैया र एक कठा जग्गा मागेको थ्यो बिबाह पछि तैले दाईजो ल्याईनस भने के गर्छु भननु हुन्थ्यो दाईजो ल्याईनस भने तेरो पेटको बच्चा राजबिराज लगेर मारिदिन्छु अपरेसनन गरेर झिकी दिन्छु मारि दिन्छु त्यसैले बाबुसंग छिटो गएर पैसाा माँगेर लिएर आईज भन्थ्यो धम्की दिन्थ्यो बच्चा हुने टाईममा मलाई मेरो श्रीमानले आदिबाटोमा लगर छोडी दियो अनि म माईती गएर बसे दाईजो कारणले म मात्र होईन म ेरो देउरानी संग बिबाह गरेको मेरो देवरले पनि देउरानीसंग छोडपत्र गरेको छ ईन्डियाको सुपौलबाट प्रेम बिबाह गरीन सन्जनले सप्तरीको इनर्वामा तर माँगेर बिबाह गरेको भए पाँच सात लाख दाईजो आउने थियो भन्दै ससु ा सासु नन्दले सन्जनलाई यातदिन थालेै । पटक पटक अपहरण गर्न मान्छे लगाएबिबाह भएको सात दिनदेखि नै सन्जनको श्रीमानलाई ससुरा पक्षले गायब गराएका छन ्। श्रीमान कहाँछ थाहा छैन बिहे गरेको पाँच बर्ष बिति सक्दा पनि सात लाख दाईजो ल्याए मात्र बस्न दिने भन्छन दाइजोका कारण सन्जनले धेरै यातना भोगेकी छन ।
उनी आखाभरी आसु पार्दै रुदै भन्छिन –मैले लब म्यारिज बिबाह गरेकाले दहेज पाएनन् । त्यसैले मलाई धरै दुख दिन्छन् । मलाई अपहरण गर्न मान्छे पठाए धेरै पिट्छन ् । एक पटक धेरै पिटे अनि म अस्पतालमा भर्ना भए अनि उनीहरुलाई पनि ठानामा थुने । अनि उसको लागी केही गर्छे ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छु भन्यो तर केही गर्दैन न त ज्यानको जिम्मेवारी लिन्छ नत खान खर्च केही दिदैन न त घरमा बस्न दिन्छन ् । न त नागरिकता बनाई दिन्छछ बिबाह लब म्यारिज गरेकाले एिनौ बिबाह पछि मेरी एउटी ननद छन ् । क् उनलाई हामीले फोन गरेर आउदै छौ भन्योैत्उसपछि ननद रुन थालिन सासु ससुरा सब रुन थाले किन दाईजो नलिई बिबाह गरेको भनन थाले तैले यसलाई राखिस भने बिष खाएर मर्छु तैले दाइजाबिना बिबाह गरि भनदै सबै रुन थाले उसैको र्बनीको कारणले मेरो श्रीमान अहिले सम्म बेपता छ मलाई पनि केही हेर्दैन ।
हाल सप्तरीका २० महिला मध्ये एक महिला दाईजोबाट पिडित छन ् ।सप्रीको बिष्हरियाकी रेखा चौधरीको पिडा पनि उस्तै छ । छ रेखाको पनि सात बर्ष अघि बिबाह भयो सुनसरीको पच्मि कुसाहामा मागे जति दाईजो नल्याएको भन्लै रेखालाई सासु ससुरा र श्रीमानले यातना दिन थाले पेटमा बच्चा हुदा सुत्केरी गराउने पैसा माईतीबाट लिएर आईज नत्र तेरो बच्चा मारि दिन्छै भन्थे रेखाको सासु ससुराले माईती जाँदै पिच्छे बिबाहमा कम दाईजो ल्याएको भन्दै पाँच हजार दश हजार दाइजो माँग गरे अन्त्यमा पेटमा भएको बचलाई नै मारिदिने भने पछि रेखाले ससुरको घर छोडिन र सात बर्ष दखि माईतीमा नै छन ।
उनी अगाडि भन्छिन् ः–मलाई दहेज ४५ हजार माँगेको थियो त्यसमा बुबाको भनाई अनुसार २५ हजार दिनु भएको उनीहरुको भनाई अनुसार १५ हजार मात्र दिएको छ भन्छ । तेरो बुबाले दाईजो दिएन भन्दै कुटपीट गर्छन् ।गाली गलौज गर्छन ् । बुबासंग पैसा मागेर लिएर आईज भन्छ । बुबा पनि किड्नीको बिरामी हुनुहुन्थ्यो । पैसाा पनि दिन सक्नु भएन कुनै पटक दश हजार कुनै पटक पाँच हजार लिएर लिएर आईज भन्थ्यो । बच्चा पेटमा हुदा जा पैसा लिएर आईज तलाई बिना अपरेन बच्चा हुदैन जा पैसा लिएर आईज अनि हुद मात्र घरमा बस्नु भन्थ्यो । यस्तै यातना दिन थाल्यो अनि म पेटमा बच्चा ै माईत आएर बस्न थाले माईतीमा नै छोरा भयो बचलाई मारिदिन्छु भन्न थालो र म ६ बर्ष देखि माईतीमा नै बस्छु तर मेरोभाईले भन्यो म कमाउने भएपछि मेरो बुबाले ४५ हजार रुपैया दिन्छु भन्नु भएको भएको छ भने म एकान्न हजार रुपैया दिन्छु भनो । तर उनीहरुले मानेनन् ।
यता आफु संग पैसा र पहुच नभएकोले कतै आफुलाई परेको अन्यायका बिरुद्ध केश नदिएको बताउन रेखाले प्रहरीलाई जाहेरी दिनु भएन ? मेरो कुनै प्रमाणै छैन । न बिबाह दर्ता छ । प्रमाणै नभएकाले मैले कही पनि केश दिएको छैन । गाँउलेहरुले मलाई भर गएको बेला केश दे म पनि सहयोग गर्छु भने तर म संग त्यति पैसा पनि छैन केश दिनको लागी नजिक भएको भए त म हिडेर पनि जान सक्थे । तर त्यहा त जान आउन दुई सय रुपैया लाग्छ फेरी मेरा े बुबा भाई पनि हुनु हुन्न । नकसैलाई मैले चिनेकी छु एउटा बिधुवा आमा हुनु हुन्छ । फेरी सानो छोरालाई छोडेर कहा जाने एक्लै ।संस्थाको पहलमा दाईजो घटनामा कमी आएको बताउनु हुन्छ महिला हिंसा सम्बन्धी काम गर्ने संथा हुेक सप्तरीकी उपाध्यक्ष उमा पोख्रेल संस्थाले संचालन गरेको पारालिगल प्रोग्रामले ३३ गाबिस र एक नगरपालिकाका महिलामा लुकेर बसेका महिला माथि भएका घटना बाहिर ल्याउन थालेको बताउनु हुन्छ ।यस्ता घटनामा बोल्नसक्ने कुरा उठाउने हिम्मत आएको बताउनु हुन्छ उमा पोखरेल ।
तराईमा भनौ न झा बाहुन देब जी यसमा चाहि दहेज प्रथा भनेको भयङ्कर ठूलो रोग हो जसको ईलाज हुदैन जो अन्तिममा मर्छ नै । त्यस्तो किसिमको रोग हो यो एउटा दहेजलाई जतिसुकै चाहेर पनि उन्मुलन गर्न खोज्यौ होईन बिभिन्न संघ संस्था हामी पनि त्यसै बिरुद्ध लागी परेका छै । केही कमी आएको छ तर यो चाहिने यसलाई सम्पूर्ण रुपले निकनलेर फ्याक्न अझै २५ , ३० बर्ष लाग्छ । सप्तरी जिल्लामा महिलाको उपरमा भने कुनै एनजीओ थिएन पारा लिगल पोग्राम जब आयो अनि महिला र बालबालिकाको क्षेत्रमा नै काम गर्ने भनेर संस्था भनेर महिला दिदि बहिनी थाहा पाए पछि यस्ता कुरा जो दाइजो कुटपीट रेप केश धेरै यस्ता बिबाद थिए ती कुरा पहिला लुकेको अबस्थामा थिए यी केश हरु अब सुन्ने ठाँउ छ पोख्ने ठाँउ छ भन्ने थाहा पाएपछि वहाहरुले उठाउन थाल्नु भएको छ ती गाबिसका महिलाहरुले धेरै नजानेका मबझेका महिलाको मुखमा आवाज आएको छ । हामीले न्याय पाउछौ भन्ने कुरामा बिश्वास भएका छौ ।
तराईमा झा बाहुन र देबजी समुदायमा दाईजो लेनदेन धेरै हुन्छ भन्नु हुन्छ कानुन ब्यबसायी उमाशंकर देब एसएलसी पास गरेको केटालाई पाँच लाख रुपैया रेट नै जस्तो भएको छ जति पढाई बढ्दै जान्छ त्यति नै रेट पनि बढ्दै जाने बताउनु हुन्छ उमा शंकर देब ।
देबले अहिले समाजमा सबभन्दा ठूलो बिक्रिती दहेज छ यहाँ दहेजले जरा गाडी सकेको छ । यो मधेशी समुदायमा यहा एस एल सी पास गर्ने केटा भयो भने त्यसको रेट पाँच लाख रुपैया फिक्स भई सकेको हुनछ । गोरु ज्स्तै यहा मान्छे खरिद बिक्री हुन्छ ।एउटाले पाँच लाख दिउो भने देखि अर्कोले ६ लाख दिन खोज्छ । यहा दाईजो कै कारण महिलाहरु ीहंसामा परेका छन ् । देबजी समुदायमा सबभन्दा बढी दहेज लेनदेन हुन्छ । कसैले दहेजमा कार दिन्छ कार दियो भने मेरो छोरा पनि ईन्जीनियर हो मलाई पनि कार चाहियो भनेर डिमान्ड हुन्छ । डाक्टर इन्जीनियर भयो भने १६ देखि २० लाख रुपैया सम्म रेट छ ।
एम बी बिएस केटाले त नपढेकी केटी बिबाह गर्दैन पढेकी केटी भए पनि दाम त्यही हो । रेट त्यही हो पढे लेखेकी केटी भए पनि त्यसको बुबाले केटालाई दहेज दिनै पर्छ ।
दाईजोबाट जति पिडित भए पनि उजुरी गर्न प्रशासनमा कोही जाने गरेकाले चलनकै रुपमा सबैले स्वीकारेकाले पनि यो सम्स्या बढ्दै गएको बताउनु हुन्छ उमा शंकर जसले जे गरे पनि हुने र कानुनी राज्य नभएकाले यस्ता घटनामा बृद्धि भएको बताउनु हुन्छ देब ।
हुन त दाईजो कम गर्नका लागी राज्यले नै कडा कानुन बनाएर कडाईका लागु गर्ने हो भने मात्र दहेज लेनदेनको अन्त्य अनि महिला हिंसामा कमी आउने देखिन्छ ।
Thursday, April 14, 2011
पुरानो र मौलिक पर्व जुडशितल

पुरानो र मौलिक पर्व जुडशितल
नागेन्द्र कुमार कर्ण
हरेक दिनको बिहानीले पर्वैे पर्व निमत्याउने जगतजननी माँ जानकीको पवित्रभुमि मिथिलाञ्चलमा हरेक दिन कुनै न कुनै पर्व रहने गरेको छ । नववर्षको आरम्भ संगै मिथिलाञ्चलमा पर्वको शुरुवात हुन्छ र सो पर्व सालभरि चलि नै रहन्छ । मिथिलाञ्चलमा मनाईने हरेक पर्व त्योहारले कुनै न कुनै रुपमा गहन सन्देश दिने गरेको पाईन्छ । यस्तै गहन सन्देश दिने पर्वको रुपमा नयाँ वर्ष आरम्भमै मिथिलाञ्चलबासीले सतुवाईन पर्व मनाउने गर्छन भने सो को भोलीपल्ट अर्थात वैशाख २ गते जुडशितल पर्व मनाउने गर्छन । परापूर्वकालदेखि नै मनाईदै आएको यो पर्व मिथिलाञ्चलको मौलिक र पुरानो पर्व मानिन्छ । जुडशितललाई शाब्दिक अर्थमा हेर्ने हो भने “ शितल जलले जुडाउनु” हुन जान्छ । तर यसको लाक्षणिक अर्थ त्यत्तिकैमा मात्रै सिमित छैन । नववर्षको प्रारम्भमा एक अर्काको उत्तरोत्तर प्रगतीको कामना गदै ग्रिटिंग्स बाँडने अत्याधुनिक पश्चिमी सभ्यतालाई मुँहतोड जवाफ दिने शक्ति राखेको छ हाम्रो यो मौलिक एवै प्राचिनतम पर्वले । आरम्भ राम्रो भएको कामको अन्त्य पनि राम्रो हुने मान्यता रहेको हाम्रो समाजमा नववर्षको आरम्भमै मिठो—मिठो खानेकुरा खाने, खुवाउने, राम्रो लुगा लगाउने अनि खराब बानी सुधार्ने संयोगको रुपमा यो पर्व रहेको पाईन्छ । यी सबै कुराको पूनरावृत्ति दर्शाउने संयोग भएको यो पर्वको आफ्नै मौलिक पहिचान र विशिष्टता रहेको छ ।
जुडशितल पर्वका दिन अर्थात वैशाख २ गते सुर्योदय भन्दा धेरै अगावै घरका मान्यजनहरुले आफु भन्दा सानालाई टाउकोमा पानी हाली (जुडाईं) दिर्घायु एवं स्वस्थ्य रहने आर्शिवाद दिने गर्छन । टाउकोमा पानी जुडाउनुको अर्थ टाउको शितल रही राम्रो राम्रो काम गर्नु हो । अर्थात टाउको शितल भएपछि मान्छेको कम्प्युटर रहेको दिमाग पनि शितल हुन्छ र शितल दिमागले गराएको काम जहिले पनि राम्रो र विकाशसिल काम हुन्छ । के गरम दिमागले झै—झगडा र विनाश मात्रै निम्त्याउदैनन् र ? अति क्षति हुने एवं मानव सभ्यता नै सखाप पार्न तम्तयार हुने युद्ध गरम दिमागकै उपज होईन र ? त्यसैकारणले मान्यजनले त्यस्तो विनाश नमित्याउन भन्ने हेतुले टाउकोमा शितल जल जुडाउने गरेको पाईन्छ । त्यो पनि सुर्योदय भन्दा धेरै अगाडी भन्नुको तात्पर्य विहानको हावा निर्मल र स्वच्छ हुने गर्छ जसका कारण मानिस स्वस्थ र निरोगी रहने गर्दछ । त्यसैले होला चिकित्सकहरुले विरामीहरुलाई विहान केही क्षण हिडडुल गर्नै सल्लाह दिने गर्छन । यो स्वस्थय, दिर्घजीवि र निरोगी रहने सन्देश समेत यो पर्वले दिने गरेको पाईन्छ । त्यसपश्चात घरका सदस्यहरुले पानी लिई आफुले लगाएको वा आफ्नो स्वामित्वमा भएको वोटविरुवाको जरामा पनि पानी हाली वोटविरुवालाई स्वस्थ्य राख्ने गर्छन । जसका कारण वोटले फल संगै शुद्ध अक्सिजन समेत दिने गर्छन भन्ने मान्यता रहेको छ । त्यसैगरी दिवंगत भएका आफ्ना कुटुम्ब र आफन्तजनहरुको समाधिस्थलमा समेत पुगी आर्शिवाद लिने चलन रहेको छ । यसैदिन पिउने कुवाको पानी र हिलोलाई समेत सफा गरी शुद्ध बनाईने गरिन्छ । यसदिन मिथिलाञ्चलबासीले दाल,भात,वरी,कठी,आँपको चटनी लगायतका परिकारहरु खाई रमाईलो गर्ने गर्छन । यसैदिन सल्हेश मन्दिर भएको ठाउँमा भव्य मेलाको आयोजना तथा पुजापाठ गरिने गरिन्छ ।
विगतको तुलनामा यो पर्व अहिले संकुचित हुदै गएका छन । जथाभावी हिलो लछारपछार गर्ने गर्छन भने आफ्नो मौलिकता भन्दा भिन्नरुपमा यो पर्व मनाउने गर्छन तर अहिले पनि मिथिलाञ्चलका गाउँहरुमा यो पर्वको रौनकता हेर्न सकिन्छ । नयाँवर्षको आरम्भमै मनाईने ई पर्वहरु वास्तवमा मिथिलाञ्चलको गहनाको रुपमा मानिने गरिन्छ ।
सवारी दुर्घटनामा २० घाइते , छ को अवस्था गम्भिर
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, चैत २९ गते । पूर्वपश्चिम राजमार्ग अन्र्तगत महोत्तरीको माइस्थानमा मंगलवार भएको सवारी दुर्घटनामा २६ जना घाइते भएका छन् । घाइतेमध्ये छ जनाको अवस्था गम्भिर रहेको छ ।
काठमाण्डौंबाट काकडभिट्टा जाँदै गरेको मुनाल यातायातको ना ४ ख ४८२४ नम्बरको बस अनियन्त्रित भई माइस्थान – ३ मा पल्टिदाँ सो दुर्घटनामा परेको हो ।
दुर्घटनामा परी गम्भिर घाइते हुनेहरुमा काठमाण्डु बौद्ध–६ बस्ने बबिता लामा, तेह््रथुम हाइकु –१ अमृता लिम्बु, सप्तरी पोर्ताहा –८ का सुन्दरदेवि सदा, इलाम बाघु –९ बस्ने धनकुमारी लिम्बु, ललितपुर –१४ बस्ने बटाल लिम्बु, बाँके कोहलपुर –८ बस्ने शंकर ओली,रहेका छन् । यीमध्ये बबिताको उपचार विराटनगर, शंकरको उपचार काठमाडौ अन्य चारको उपचार वीपी कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान धरानमा भईरहेको प्रहरीले जनाएको छ । उनीहरुको अवस्था चिन्ताजनक रहेको वताइएको छ । अन्य घाइते २० जनाको बर्दिबासमा रहेको होप बर्दिबास अस्पतालमा उपचार भैरहेको छ । दुर्घटनापछि चालक फरार रहेकोले चालकको खोजी भैरहेको जिल्ला ट्राफिक प्रहरी कार्यालय महोत्तरी जनाएको छ ।
जलेश्वर, चैत २९ गते । पूर्वपश्चिम राजमार्ग अन्र्तगत महोत्तरीको माइस्थानमा मंगलवार भएको सवारी दुर्घटनामा २६ जना घाइते भएका छन् । घाइतेमध्ये छ जनाको अवस्था गम्भिर रहेको छ ।
काठमाण्डौंबाट काकडभिट्टा जाँदै गरेको मुनाल यातायातको ना ४ ख ४८२४ नम्बरको बस अनियन्त्रित भई माइस्थान – ३ मा पल्टिदाँ सो दुर्घटनामा परेको हो ।
दुर्घटनामा परी गम्भिर घाइते हुनेहरुमा काठमाण्डु बौद्ध–६ बस्ने बबिता लामा, तेह््रथुम हाइकु –१ अमृता लिम्बु, सप्तरी पोर्ताहा –८ का सुन्दरदेवि सदा, इलाम बाघु –९ बस्ने धनकुमारी लिम्बु, ललितपुर –१४ बस्ने बटाल लिम्बु, बाँके कोहलपुर –८ बस्ने शंकर ओली,रहेका छन् । यीमध्ये बबिताको उपचार विराटनगर, शंकरको उपचार काठमाडौ अन्य चारको उपचार वीपी कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान धरानमा भईरहेको प्रहरीले जनाएको छ । उनीहरुको अवस्था चिन्ताजनक रहेको वताइएको छ । अन्य घाइते २० जनाको बर्दिबासमा रहेको होप बर्दिबास अस्पतालमा उपचार भैरहेको छ । दुर्घटनापछि चालक फरार रहेकोले चालकको खोजी भैरहेको जिल्ला ट्राफिक प्रहरी कार्यालय महोत्तरी जनाएको छ ।
न्यायका लागि एक महिला भौतारिदै
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, चैत २८ गते । रक्षक नै रक्षा गर्न नसकेपछि कहाँ जाने ? अहिले यस्तै प्रश्न गुनगुनाउँदै महोत्तरीकी एक महिला न्यायका लागि भौतारि रहेकी छिन् ।
महोत्तरी जिल्लाको भारतीय सीमावर्ती भिठ्ठामोरस्थित प्रहरी चौकी मैं पिटिएर थिलथिलो भएकी जलेश्वर–१२ की रेणु साह अहिले न्यायका लागि एक हप्तादेखि सदरमुकाम जलेश्वरमा चाहारी रहे पनि अहिले सम्म उनलाई न्याय भेटन सकेको छैन. । अहिले उनी आफुलाई न्याय भेटला भन्ने आशा समेत मारीसकेकी छिन् ।
आफ्नै पति रामनन्दन साहसंग घरायसी कुरामा भनाभन हुँदा सिमा नाका भिठामोड स्थित अस्थायी प्रहरी चौकी झिकाइएकी रेणुलाई प्रहरीकै सामुन्ने त्यहीका केही मानिसले मरनासन्न हुने कुटपिट गरेका थिए । उनले उनीहरुको विरद्ध जिल्ला प्रहरी कार्यालयमा उजुरी गरेपनि एक हप्ता भै सक्दा पनि उजुरी दर्ता हुन सकेको छैन् । प्रहरीले सो घटनामा संलग्न कसैलाई पक्राउ समेत गर्न सकेको छैन् । पिडित रेणुले कुटपिट गर्ने क्रममा प्रहरीले रक्षा गर्नुपर्नेमा उल्टै मुकदर्शक बनेको बताइन ।
आफुलाई सार्वजनिकस्थलमै प्रहरीका सामु लछारपछार पारेर कुटपिट गरे विरुद्घ जिल्ला प्रहरी कार्यालयमा उजुरी दिदा दत्र्ता सम्म नगरेर प्रहरी अधिकृतहरुले फर्काइदिएका पिडित रेणुले आफ्ना शरीर भरीका निलडाम देखाउदै बताइन् । उनले भक्कानिदै भनिन् रक्षक नै भक्षक भएपछि न्याय भेट्छु भन्ने आशा नै छैन्’ ।
दिउँसो नै जलेश्वर–१२ भिठ्ठामोरका सञ्जय पाण्डे, रवि पाण्डे, अशोक पाण्डे, दिलिप पाण्डे, बीरेन्द्र पाण्डे र नागेन्द्र पाण्डे सहितकाले चौकी मैं उनलाई कुटपिट गर्दे गाउँ समेत निकाला गरेको रेणुले बताइन । सात छोराछोरीकी आमा रेणुले आफुलाई न्याय दिलाई दिन विभिन्न मानवअधिकारकर्मीहरुलाई गुहारेकी छिन् । यसै घटनाको विषयमा आफुहरुले छानविन गरिरहेकी महिला मानवअधिकारकर्मी रेखा झाले वताईन । उनले गल्ती गर्नेहरुलाई सजाय हुुनुपर्ने माँग समेत गरिन् । यता मानवअधिकार संरक्षण केन्द्र महोत्तरीका अध्यक्ष मदनकुमार झाले आफुहरुले जिल्ला प्रहरी कार्यालयका प्रहरी उपरिक्षक संजयराज शर्मासंग यस सम्बन्धित कुरा गरेको र छानविन गरेपछि आफुहरुले प्रशासनलाई दवाव दिने वताउनुभयो । उहाँले प्रहरी परिसर भित्र यदि कुटेको हो भने प्रशासनले यसमा गल्ती स्विकार गरी महिलालाई न्याय दिनुपर्ने माँग गर्नुभयो ।
जलेश्वर, चैत २८ गते । रक्षक नै रक्षा गर्न नसकेपछि कहाँ जाने ? अहिले यस्तै प्रश्न गुनगुनाउँदै महोत्तरीकी एक महिला न्यायका लागि भौतारि रहेकी छिन् ।
महोत्तरी जिल्लाको भारतीय सीमावर्ती भिठ्ठामोरस्थित प्रहरी चौकी मैं पिटिएर थिलथिलो भएकी जलेश्वर–१२ की रेणु साह अहिले न्यायका लागि एक हप्तादेखि सदरमुकाम जलेश्वरमा चाहारी रहे पनि अहिले सम्म उनलाई न्याय भेटन सकेको छैन. । अहिले उनी आफुलाई न्याय भेटला भन्ने आशा समेत मारीसकेकी छिन् ।
आफ्नै पति रामनन्दन साहसंग घरायसी कुरामा भनाभन हुँदा सिमा नाका भिठामोड स्थित अस्थायी प्रहरी चौकी झिकाइएकी रेणुलाई प्रहरीकै सामुन्ने त्यहीका केही मानिसले मरनासन्न हुने कुटपिट गरेका थिए । उनले उनीहरुको विरद्ध जिल्ला प्रहरी कार्यालयमा उजुरी गरेपनि एक हप्ता भै सक्दा पनि उजुरी दर्ता हुन सकेको छैन् । प्रहरीले सो घटनामा संलग्न कसैलाई पक्राउ समेत गर्न सकेको छैन् । पिडित रेणुले कुटपिट गर्ने क्रममा प्रहरीले रक्षा गर्नुपर्नेमा उल्टै मुकदर्शक बनेको बताइन ।
आफुलाई सार्वजनिकस्थलमै प्रहरीका सामु लछारपछार पारेर कुटपिट गरे विरुद्घ जिल्ला प्रहरी कार्यालयमा उजुरी दिदा दत्र्ता सम्म नगरेर प्रहरी अधिकृतहरुले फर्काइदिएका पिडित रेणुले आफ्ना शरीर भरीका निलडाम देखाउदै बताइन् । उनले भक्कानिदै भनिन् रक्षक नै भक्षक भएपछि न्याय भेट्छु भन्ने आशा नै छैन्’ ।
दिउँसो नै जलेश्वर–१२ भिठ्ठामोरका सञ्जय पाण्डे, रवि पाण्डे, अशोक पाण्डे, दिलिप पाण्डे, बीरेन्द्र पाण्डे र नागेन्द्र पाण्डे सहितकाले चौकी मैं उनलाई कुटपिट गर्दे गाउँ समेत निकाला गरेको रेणुले बताइन । सात छोराछोरीकी आमा रेणुले आफुलाई न्याय दिलाई दिन विभिन्न मानवअधिकारकर्मीहरुलाई गुहारेकी छिन् । यसै घटनाको विषयमा आफुहरुले छानविन गरिरहेकी महिला मानवअधिकारकर्मी रेखा झाले वताईन । उनले गल्ती गर्नेहरुलाई सजाय हुुनुपर्ने माँग समेत गरिन् । यता मानवअधिकार संरक्षण केन्द्र महोत्तरीका अध्यक्ष मदनकुमार झाले आफुहरुले जिल्ला प्रहरी कार्यालयका प्रहरी उपरिक्षक संजयराज शर्मासंग यस सम्बन्धित कुरा गरेको र छानविन गरेपछि आफुहरुले प्रशासनलाई दवाव दिने वताउनुभयो । उहाँले प्रहरी परिसर भित्र यदि कुटेको हो भने प्रशासनले यसमा गल्ती स्विकार गरी महिलालाई न्याय दिनुपर्ने माँग गर्नुभयो ।
गाउँ वस्तीविहिन
महोत्तरी समाचारदाता
जलेश्वर, चैत २७ गते । घरमा पालिएका चौपायाहरु अहिले छाडा भई भोकप्यासले मर्न आँटेका छन् । घरमा पालिएका घरपालुवा कुकुरहरु पनि भुस्याहा भैसकेका छन् । कुनै मानिसलाई देख्ने वित्तिकै खान पाउने लोभमा चौपायाहरुको लर्को मानिस भएतिर लाग्छ । आफुलाई बचाउ नगर्ने हो भने कुकुरहरु नौलो मानिसलाई झम्टिन समेत थाल्छ । वस्तीका हरेक घरमा ताला लागेको छ । वस्ती भएपनि एउटा मानिसलाई खोज्न पनि पुरै वस्ती नै चहार्नुपर्छ । तर पनि स्थानीय मन्दिरमा रहेका एकवृद्धवृद्धा बाहेक अरु कोही पनि त्यहाँ भेटदैनन्् । अहिले महोत्तरी जिल्लाको सिंग्याही वडानं. ४ को अवस्था यस्तै रहेको छ । अहिले सो वडा मानव विहिन भई वस्ती खाली भएपछि चौपायाहरु र टोलको यस्तो अवस्था आएको हो ।
सामुहिक कुटपिट र लुटपाट हुन थालेपछि सो वडाका करिब ६० घर परिवार अहिले विस्थापित भई अन्यत्र वस्न बाध्य भएका छन् । सो वस्तीका करिब अढाई सय भन्दा बढी जना अहिले गाउँ भन्दा अन्यत्र आफन्त कहाँ शरण लिन वाध्य भएका हुन् । दिनभरी ३–४ जना महिलाहरु आएर बसे पनि साँझ परेपछि केही चौपाया, ३ वटा कुकुर र एकजोडी वृद्धवृद्धा बाहेक सो गाउँ नै सुनसान हुन्छ । स्थानीय गणेश मन्दिरमा बसोबास गर्दे आउनुभएका वृद्ध पुजारी वुद्धु दास बाँतरले राती पुरै गाउँ नै सुनसान हुने वताउनुहुदै आफुहरु जे पर्ला पर्ला भनेर बसेको वताए । मन्दिरमा उनीसंगै उनकी वृद्ध श्रीमती हुन्छिन् । पुजारी दासले यस मन्दिरमा पुजारीको रुपमा आफ्नो चारपुस्त नै वितेको जानकारी दिनुहुदै जे हुन्छ हुन्छ भनेर बसेको जानकारी दिनुभयो । उहाँले एक हप्ता देखि सो गाउँ सुनसान रहेको जानकारी दिनुहुदै प्रहरीले समेत गाउँलेलाई दुःख दिने भएपछि बस्ती खाली भएको दावी गर्नुभयो ।
शनिबार दिउँसो केही मानवअधिकारकर्मी र संचारकर्मीहरुको टोली सो गाउँमा पुग्दा तीन जना महिला र पुजारीद्धय मात्रै रहेका थिए । गाउँमा भेटिएका पानो देवीले शनिबार आफुलाई स्थानीय चौकीमा तारिखको लागि बोलाएकोले गाउँमा आएको जानकारी दिइन । उनले रातीमा एक परिवार पनि यहाँ नबस्ने वताउँदै आफु पनि राति आफन्त कहाँ जाने जानकारी दिइन । उनीसंग सोध्दा राति बसे इज्जत लुट्छ भन्ने सुनेकोले गाउँमा नबस्ने बताइन ।
चैत १३ गते राति स्थानीय सिंग्याही वडानं.६ बस्ने धर्मनाथ साहलाई वडानं. ४ का बाँतर समुदायले कुटपिट गरी हत्या गरेको भन्दै स्थानीय वडानं. ६ का केही व्यक्तिहरुले वडानं. ४मा सामुहिक कुटपिट र लुटपाट मच्चाएपछि सो बस्ती अहिले डरले विस्थापित भएका हुन् । वडानं. ४ बस्ने सुन्दरकलादेवी वाँतरसंग धर्मनाथको अवैध सम्बन्ध रहेको थियो । स्थानीयबासिहरुले सो कुरा वारम्वार थाहा पाएका थिए कसैले उनलाई समात्न सकेको थिएन तर चैत १३ गते राति साह सुन्दरकलाको घरमा आएपछि सो वडाका केही स्थानीयले साहलाई समातेर कुटपिट गर्दे हत्या गरेर फालेका थिए । त्यो हत्या भएको शव त्यसको भोलीपल्ट फेला परेपछि वडानं. ६ का स्थानीयबासीहरुले सो वाँतर वस्तीमा गएर लुटपाट मच्चाएका थिए । वाँतर बस्तीमा अहिले हरेक घरमा तालावन्दी गरिएको छ । उनीहरुको चौपायाहरु अहिले त्यसै छाडा बनेका हुन् । स्थानीय वडानं. ५ का पार्वती देवीले कतिपय गाईवस्तुहरु त्यसै मरिरहेको जानकारी दिइन्् । उनले अहिले दिनमा पनि यो टोलमा आउन डर लाग्ने जानकारी दिदै भनिन् ‘ पानी लेवऽ बालाके आ नहाईबालाके धारा सभपर भिड रहैछई, लेकिन अखैन सभ खाली छै’ । (धारामा पानी लिने, नुहाउनेहरुको भिड हुन्छ तर अहिले सबै खाली छ ।) उनले वडानं. ६का केही स्थानीयहरुले वडानं. ४ को वाँतरवस्तीको हरेक घरमा छापामारी गरी रेडियो, टिभी सेट, सिडी, धनसम्पत्ति, गरगहना लगायतका सामग्रीहरु समेत लुटिलगीसकेको जानकारी दिइन ।
सदरमुकाम जलेश्वरदेखि करिब ३० किलोमिटरको दुरीमा रहेको सो ठाउँको नजिकै लोहारपट्टी चौकी समेत रहे पनि प्रहरीकै डरले समेत कतिपय विस्थापित भएको पुजारीले वताए । उनले वडानं. ६ का स्थानीय यादव समुदाय तथा साह समुदायका मान्छेहरु धनिमानि भएकोले उनीसंगै प्रहरी मिलेको कारणले यस्तो भएको दावी समेत गरे ।
तिनदिन देखि प्रहरीले दुई जनालाई पक्राउ गरी सो गाउँमा सुरक्षा दिइरहे पनि डरका कारण स्थानीयबासिहरु अहिले गाउँमा फर्कन्न नमान्ने गरेको छ ।
अनुगमनमा जानुभएका मानवअधिकार संरक्षण केन्द्र महोत्तरीका अध्यक्ष मदनकुमार झाले प्रशासनले चाँडै नै गाउँमा राजनीतिक सहमति गरि विस्थापितहरुलाई पुर्नस्थापित गर्नुपर्ने माँग गर्नुभयो । उहाँले अहिले सो गाउँमा पशुहरुको अवस्था समेत चिनताजनक भएकोले प्रशासनले चाँडै नै समस्या समाधान गर्नुपर्नेमा जोड दिनुभयो ।
Subscribe to:
Posts (Atom)